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सोशल मीडिया पर रचा जा रहा है स्त्री का अंतर्मन: नीलिमा चौहान

सोशल मीडिया को आज की औरत अपने निजी सुख-दुख, असमंजस, गुस्सा, प्रतिरोध को कहने के लिए एक आसान, महफूज़ और त्वरित ज़रिये के तौर पर देख पा रही है।

8th Mar 2017
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"सोशल मीडिया पर स्त्री की लगातार बढ़ती हुई हिस्सेदारी एक मर्दाना स्पेस में ज़नाना घुसपैठ से कम नहीं है। यह प्लेटफॉर्म तंग दायरों में गुज़र-बसर कर रही औरतों को यकायक पूरी दुनिया से जोड़ने का काम कर रहा है।" 

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"सोशल मीडिया को आज की औरत अपने निजी सुख-दुख, असमंजस, गुस्सा, प्रतिरोध को कहने के लिए एक आसान, महफूज़ और त्वरित ज़रिये के तौर पर देख पा रही है।"

सोशल मीडिया पर आज की औरत अपनी तस्वीरों, परिचय और पोस्टों के ज़रिये अपनी वैसी ब्रांडिंग कर रही हैं, जैसी हक़ीकी दुनिया में करना चाहकर भी उसके लिए साहस नहीं जुटा पा रही थीं। बेहद निज का साझा करने वाली स्त्रियों से लेकर अनेक सोशल इश्यूज़ पर अपनी दखलंदाज़ी करने वाली औरतों को यह स्पेस बेहद सुविधाजनक-सा ज़रूर लगा करता होगा।

वर्चुअल दुनिया में हकीकी दुनिया से ज़्यादा बराबरीपूर्ण स्पेस मालूम होता है, सो यह स्पेस स्त्रियों को हकीकत से बढ़कर बिंदास, बेफिक्र और यहां तक कि खिलंदड़ा होने तक का मौका देता है। अपनी मनमाफिक तस्वीरों पर उन्मुक्त श्लाघा को बढ़ावा देने से लेकर से बेखौफ इनबॉक्स चैंटिंग करना या फिर देश दुनिया के मसलों पर बहसों में कूदकर अपनी मौजूदगी और रायशुमारी का लुत्फ उठाना- और वह भी अपनी सुविधा और शर्तों के मुताबिक।

"इस वर्चुअल दुनिया में भी बाहर की दुनिया के फ्यूडल रवैये मौजूद होते हैं। यहां भी औरतों के बिंदास, बेबाक होकर दिखने लिखने को काबू करने वाली प्रवृत्तियां हुआ करती हैं, पर सुकून यह कि यहां औरतें खुद को लाचार, बेबस मानकर उनके असर में आने के बजाय मुखर और मजबूत व्यवहार करती दिखती है।"

पर नहीं जनाब, कितनी भी उन्नत तकनीकी स्पेसिज़ क्यों न हों, आख़िरकार इस्तेमाल तो उन्हें वही लोग करते हैं जो इस हकीकी दुनिया में अपनी तमाम ख़ामियों के साथ जीते होते हैं। सो इस वर्चुअल दुनिया में भी बाहर की दुनिया के फ्यूडल रवैये मौजूद होते हैं। यहां भी औरतों के बिंदास, बेबाक होकर दिखने लिखने को काबू करने वाली प्रवृत्तियां हुआ करती हैं, पर सुकून यह कि यहां औरतें खुद को लाचार, बेबस मानकर उनके असर में आने के बजाय मुखर और मजबूत व्यवहार करती दिखती है।

सोशल मीडिया औरतों को बराबरी से उलझने बहसने और रचने के लिए आसान रास्ता मुहैया करा पाता है। घर और नैतिकता के दायरे यहां इतने लचीले हैं, कि स्त्री की रचनात्मकता को आज़ाद होकर विचरने के मौके यहां बखूबी हैं । यही इफरात और सुकून का स्पेस क्लेम करती औरतें लगातार सुघढ-अनगढ़ इबारतों को रच रही हैं । यह हर इबारत अपने आप में औरत की दिमागी आज़ादी का रास्ता तैयार कर रही है।तो यूं सोशल मीडिया पर रचा जा रहा है औरत का अंतर्मन।

-नीलिमा चौहान, स्वतंत्र लेखिका

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