समाज के तंज़ की परवाह किये बिना साधना शर्मा बनीं हज़ारों बच्चों की कंप्युटर ट्रेनर

By Geeta Bisht
May 15, 2016, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:17:15 GMT+0000
समाज के तंज़ की परवाह किये बिना साधना शर्मा बनीं हज़ारों बच्चों की कंप्युटर ट्रेनर
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कहते हैं कि सपनों को पूरा करने की कोशिश करते रहो, तो वो जरूर पूरे होते हैं। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में रहने वाली साधना शर्मा ने भी ऊंचे-ऊंचे सपने देखे थे, लेकिन जल्द शादी होने और सामाजिक बंधनों के बावजूद उन्होने अपने सपनों को देखना नहीं छोड़ा और आखिरकार उन्होने वो मंजिल पा ही ली, जिसकी उनकी तलाश थी। आज वो सैकड़ों ऐसे बच्चों को कम्प्यूटर ट्रेनिंग दे चुकी हैं, जो ना सिर्फ अपने पैरों पर खड़े हो चुके हैं, बल्कि कई मल्टीनेशनल कंपनियों में काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं कम्प्यूटर सीखने में अंग्रेजी के दखल को कम करने के लिए वो अब तक दो किताबें भी लिख चुकी हैं।

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साधना शर्मा जब 20 साल की थी तो उनकी शादी हो गई। उस समय उन्होने बीएससी की पढ़ाई पूरी की थी। उनकी शुरू से ही इच्छा थी कि वो कुछ काम करें। अक्सर वो अपने पति से कहती थीं कि वो अपनी जिदंगी में कुछ करना चाहती हैं। साल 1985 में जब उनका बेटा 1 साल का था तब उन्होंने 1 महीने तक एक स्कूल में पढ़ाने का काम किया, लेकिन घर की जिम्मेदारियों के कारण कुछ ही समय में उनको ये नौकरी छोड़नी पड़ी। 

साल 1992 में एक बार फिर साधना ने पढ़ने का मन बनाया। उस समय कम्प्यूटर की पहुंच काफी कम थी, लेकिन साधना ने कम्प्यूटर सीखने का फैसला किया और 1 साल तक एक प्राइवेट इंस्टिट्यूट से इसकी पढ़ाई की। एक दिन उनको पता चला कि कोई कम्प्यूटर एजेंसी ऐसे लोगों को ढूंढ रही थी जो बच्चों को स्कूल में कम्प्यूटर की ट्रेनिंग दे सके। साधना को जैसे ही इसकी जानकारी मिली वो इसके लिए तुरंत तैयार हो गई। इस तरह साधना शर्मा कम्प्यूटर को रिक्शे में रखकर दो स्कूलों में कम्प्यूटर सिखाने का काम करने लगीं। इनमें से एक स्कूल लड़कियों का था और दूसरा लड़कों का।
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करीब साल भर तक बच्चों को पढ़ाने के बाद साधना ने साल 1994 में छत्तीसगढ़ के कोरबा में ‘एमएलसी कम्प्यूटर कॉलेज’ की स्थापना की इसके लिए उन्होने 60 हजार रुपये लोन लेकर एक कम्प्यूटर खरीदा और किराये के एक कमरे में 12 बच्चों के साथ अपने काम की शुरूआत की। जल्द ही उनके यहाँ कम्प्यूटर सीखने वालों की संख्या बढ़ने लगी। बच्चों की बढ़ती संख्या को देखते हुए साधना ने एक और जगह किराये पर लेकर उसमें 10 कम्प्यूटर की एक लैब बनाई। इसका सारा काम वो खुद ही देखती थीं। साधना एक ओर बच्चों के बीच कंम्प्यूटर की जानकारी बढ़ाती जा रही थीं, वहीं उनके इस काम से प्रभावित होकर कई कंपनियां भी उनसे सम्पर्क करने लगीं। इसी सिलसिले में भारत एल्युमिनियम कंपनी बाल्को ने उनसे अपने यहाँ काम कर रहे 450 लोगों को कम्प्यूटर ट्रेनिंग देने को कहा। 

साधना कम्प्यूटर ट्रेनिंग के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहीं थीं, वहीं दूसरी ओर उन्होने अपनी पढ़ाई पर भी ध्यान देना शुरू किया। इस तरह उन्होंने पहले आईटी से एमएससी किया और उसके बाद उन्होंने एमफिल की डिग्री हासिल की। साधना आगे पढ़ना चाहती थीं वो पीएचडी करना चाहती थीं, लेकिन तब तक बच्चे इतने बड़े हो गये थे कि उनकी शादी का वक्त आ गया था इस वजह से वो अपनी पढ़ाई की ओर ध्यान नहीं दे पाई, लेकिन साधना ने हार नहीं मानी। वो कहती हैं कि “एक दिन मैं अपनी पीएचडी जरूर पूरा करूंगी और अपने नाम के आगे डॉक्टर लगाउंगी।” कम्प्यूटर ट्रेनिंग और पढ़ाई के साथ साधना घर की जिम्मेदारियों को पूरी ईमानदारी के साथ पूरा करती थी। इसलिए उन्होने अपने घर और काम के बीच तालमेल बैठाने के लिए स्कूटर चलाना भी सीखा, ताकि समय की बचत हो सके। उनकी इस कोशिश पर तंज कसने शुरू कर दिये, लेकिन बुलंद हौसलों वाली साधना उनकी परवाह किये बगैर आगे बढ़ती गयी और उन्होंने इस तरह की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। वो बताती हैं कि

 “अपने बच्चों के पढ़ाने से लेकर उनका टिफिन तैयार करने और उन्हें स्कूल भेजने तक का सारा काम मैं खुद ही किया करती थी। मुझे डर था कि कहीं लोग ये ना कहें कि अपना तो पढ़ रही हैं, लेकिन बच्चों का कोई ध्यान नहीं दे रही है।” 

आज उनके दो बच्चों में से उनकी एक बेटी डॉक्टर है और उनका बेटा बीई, एमबीए की पढ़ाई पूरी कर इस समय बैंगलुरू में नौकरी कर रहा है। साधना का दावा है कि ‘एमएलसी कम्प्यूटर कॉलेज’ से अब तक करीब 12 हजार छात्र कम्प्यूटर कोर्स कर चुके हैं और वे देश विदेश की कई बड़ी कंपनियों के लिये काम कर रहे हैं। इन कंपनियों में आईबीएम जैसी मल्टीनेशनल कंपनियां भी शामिल हैं। इस समय उनक कॉलेज में 600 छात्र पढाई कर रहें हैं और उनके लैब में 70 कम्प्यूटर और 4 लैपटॉप हैं। इतना ही नहीं कई आईआईटी के छात्र भी उनके यहां कोर्स करने के लिए आते हैं। छत्तीसगढ़ एक हिंदी भाषी राज्य है इस कारण यहां के लोगों को अंग्रेजी भाषा की कम जानकारी है। इन्ही परेशानियों को देखते हुए साधना ने कम्प्यूटर सीखने के लिए हिन्दी भाषा में दो किताबें लिखी हैं, जबकि और किताबों पर वो काम कर रही हैं।

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 साधना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के डिजिटल इंडिया कैंपेन से बहुत प्रभावित हैं। इसे पूरा करने के लिए वो निरंतर प्रयासरत हैं। साथ ही उनकी कोशिश है कि वो कम से कम अपने कोरबा जिले को पूरी तरह से कम्प्यूटर शिक्षित बना सकें। इसके अलावा वो छत्तीसगढ़ के अंदरूनी इलाकों को कम्प्यूटर से जोड़ने के लिए कम्प्यूटर दान भी करती हैं। अपनी भविष्य की योजनाओं के बारे में उनका कहना है कि उनकी योजना है कि डिजिटल इंडिया के माध्यम से वो पूरे भारत में जितना हो सके उतना कम्प्यूटर का प्रचार करना चाहती हैं। उनके इस काम को देखते हुए भारत सरकार ने इस साल 22 जनवरी को ‘100 वुमेन एचिवर्स अवार्ड’ से भी सम्मानित किया है।