बिहार: जब वन काट रहे हैं तो कैसे बढ़ेगी हरियाली?

9722 वर्ग किलोमीटर में वन व पेड़ हैं, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 10.3 प्रतिशत है. बिहार आर्थिक सर्वे 2021-2022 के अनुसार पिछले पांच सालों में 1603.8 हेक्टेयर में फैले वन क्षेत्र को विभिन्न परियोजनाओं के लिए गैर वन क्षेत्र में तब्दील कर दिया गया.
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पिछले साल बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लोगों से पर्यावरण की रक्षा की अपील की थी और इसके लिए हरियाली बचाने और जल संरक्षण पर जोर दिया था.

उन्होंने कहा था, “आने वाली पीढ़ियों की रक्षा के लिए हम सभी का बुनियादी दायित्व है कि पर्यावरण की रक्षा करें. जल और हरियाली के बीच जीवन, जल और हरियाली है तभी जीवन है. हम सब अगर मिलकर चलेंगे तो पर्यावरण संकट में कमी आएगी.” “झारखंड के बंटवारे के बाद बिहार का हरित आवरण 9 प्रतिशत रह गया था. साल 2012 में बिहार में हरियाली मिशन की शुरुआत की गई और 24 करोड़ वृक्षारोपण का लक्ष्य रखा गया, जिसमें 22 करोड़ वृक्षारोपण किया गया,” आगे उन्होंने कहा था.

लेकिन, हरियाली बचाने को लेकर नीतीश कुमार की प्रतिबद्धता जमीन पर बहुत प्रभावी नजर नहीं आ रही है. बल्कि उल्टे विकास के नाम पर वन क्षेत्रों को तेजी से गैर वन क्षेत्र में तब्दील किया जा रहा है और वन क्षेत्र बढ़ाने को लेकर जो प्रयास हो रहे हैं, वे भी संदेह के घेरे में हैं.

बिहार में 9722 वर्ग किलोमीटर में वन व पेड़ हैं, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का 10.3 प्रतिशत है. बिहार के कैमूर में सबसे अधिक 1051.6 वर्ग किलोमीटर में वन क्षेत्र है. वहीं, पश्चिमी चम्पारण में 903.3 वर्ग किलोमीटर और रोहतास जिले में 669.9 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में वन का फैलाव है.

वन तीन प्रकार के होते हैं – बेहद सघन वन, संतुलित सघन वन और खुला वन.

बेहद सघन वन उस भूखंड को कहा जाता है जिसका 70 प्रतिशत और उससे अधिक हिस्सा पेड़ों से ढका हुआ हो. वहीं, संतुलित सघन वन वह भूखंड होता है, जिसका 40 से 70 प्रतिशत हिस्सा पेड़ों से आच्छादित होता है, जबकि खुला वन में वे क्षेत्र आते हैं, जिनका 10 से 40 प्रतिशत हिस्सा पेड़ों से आच्छादित होता है.

इन परिभाषाओं की रोशनी में देखें, तो राज्य में बेहद सघन वन बहुत कम है. कुल वन क्षेत्र में सबसे ज्यादा भागीदारी खुले वन और संतुलित सघन वन की है.

साल 2021 के आंकड़े बताते हैं कि कुल वन क्षेत्र में बेहद सघन वन केवल 4.5 प्रतिशत है. खुला वन 51 प्रतिशत और संतुलित सघन वन 44.5 प्रतिशत है. साल 2019 और साल 2021 के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन से पता चलता है कि बेहद सघन वन और संतुलित सघन वन का क्षेत्र घटा है. साल 2019 में सघन वन 4.6 प्रतिशत था, जिसमें साल 2021 में 0.1 प्रतिशत की गिरावट आई. इसी तरह संतुलित वन साल 2019 में 44.9 प्रतिशत था यानी कि साल 2021 में इसमें 0.4 प्रतिशत की कमी आई. हालांकि दोनों तरह के वनों में जितनी गिरावट (बेहद सघन वन और संतुलित सघन वन को मिलाकर 0.5 प्रतिशत) आई है, ठीक उतना ही विस्तार खुले वन में हुआ है.

गैर वन क्षेत्र में तब्दील हुए 1604 हेक्टेयर वन क्षेत्र

दिलचस्प बात यह है कि एक तरफ बिहार सरकार व क्षेत्र को बढ़ाने की बात कह रही है, तो दूसरी तरफ वन क्षेत्र को गैर वन क्षेत्र में भी तब्दील किया जा रहा है.

बिहार आर्थिक सर्वे 2021-2022 के अनुसार पिछले पांच सालों में 1603.8 हेक्टेयर में फैले वनक्षेत्र को विभिन्न परियोजनाओं के लिए गैर वन क्षेत्र में तब्दील कर दिया गया.

इन पांच वर्षों के आंकड़ों को देखें, तो पता चलता है कि वन क्षेत्र को गैर वन क्षेत्र में तब्दील करने की रफ्तार बढ़ रही है.

साल 2016-2017 में 20 प्रोजेक्ट के लिए 51.53 हेक्टेयर वन क्षेत्र को गैर वन क्षेत्र में तब्दील किया गया था. साल 2017-2018 में पिछले साल के मुकाबले तीन गुना वन क्षेत्र को गैर वन क्षेत्र में बदल दिया गया. साल 2020-2021 में 47 प्रोजेक्ट के लिए 432.78 हेक्टेयर वन क्षेत्र को गैर वन क्षेत्र में तब्दील किया गया.

बिहार आर्थिक सर्वे में बताया गया है कि वन क्षेत्र में यह तब्दीली पाइपलाइन बिछाने, सड़क निर्माण, सिंचाई परियोजना, रेल नेटवर्क आदि के लिए की गई है.

गया जिले के फतेहपुर ब्लॉक के बगलडीहा गांव बीहड़ में बसा हुआ है. जंगल में इस कच्ची सड़क को आदिवासियों ने अपने आने-जाने के लिए बनाया है. तस्वीर - उमेश कुमार राय

पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन विभाग के चीफ फॉरेस्ट कंजर्वेटर अभय कुमार दिवेदी ने 1600 हेक्टयर वन क्षेत्र को गैर वन क्षेत्र में तब्दील करने के मोंगाबे–हिन्दी के सवाल पर कहा, “इनमें से लगभग 50 प्रतिशत वन क्षेत्रों में सघन वन थे. बाकी वन क्षेत्र रैखिक थे, जिन्हें सड़क चौड़ीकरण के चलते गैर वन क्षेत्र में तब्दील किया गया.”

जिन प्रोजेक्ट में सघन वनों का गैर वन क्षेत्र में तब्दील किया गया, उनमें गया जिले एनएच-2 चौड़ीकरण और बांका जिले में रेलवे प्रोजेक्ट शामिल हैं.

केंद्रीय पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि साल साल 2019 के मई महीने से अब तक बिहार के वन क्षेत्रों को गैर क्षेत्र में तब्दील करने वाली 122 परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी के लिए केंद्र सरकार के पास भेजा गया है. इनमें से लगभग आधे दर्जन प्रोजेक्ट को छोड़ दिया जाए, तो अधिकतर मामलों में केंद्र सरकार ने कहा है कि प्रोजेक्ट के लिए पर्यावरण मंजूरी की जरूरत नहीं है. जिनमें जरूरत है भी, तो उन्हें मंजूरी देने की प्रक्रिया चल रही है.

ऐसी ही एक परियोजना नवादा जिले के रजौली के चटकरी गांव में अभ्रक खनन से जुड़ी हुई है. इसके लिए 181.191 हेक्टेयर सघन व प्राकृतिक वन क्षेत्र को गैर वन क्षेत्र में तब्दील किया जाना है. यह वन क्षेत्र रजौली वाइल्डलाइफ सेंचुरी में स्थित है. झारखंड की कंपनी की ओर से अभ्रक खनने के लिए साल 2016 में दिये गये प्रस्ताव के मुताबिक, चटकरी में 1535.6 करोड़ टन अभ्रक होने का अनुमान है. हालांकि, इस क्षेत्र में कुछ साल पहले तक एक कंपनी ने अभ्रक खनन किया था और स्थानीय लोगों का कहना है कि इस खनन के चलते आधा किलोमीटर क्षेत्र में जंगल पूरी तरह बर्बाद हो गया.

चटकरी गांव के स्थानीय निवासी व वार्ड मेंबर सनोज कुमार ने मोंगाबे–हिन्दी से कहा, “करीब 7 साल पहले एक कंपनी खनन किया करती थी. खनन के चलते जंगल का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद हो गया.”

इसी तरह साल 2019 में बिहार पर्यटन विभाग ने सघन वन को गैर वन क्षेत्र में तब्दील करने के लिए केंद्र सकार के पास पर्यावरण मंजूरी के लिए एक प्रस्ताव भेजा है. इस प्रस्ताव के मुताबिक, वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के भीतर इंटरनेशनल कनवेंशन सेंटर बनाने के लिए सरकार 10.121 हेक्टेयर वन क्षेत्र को गैर वन क्षेत्र में तब्दील किया जाएगा. प्रोजेक्ट के तहत 500 सीटों वाले कन्वेंशन सेंटर के साथ ही 102 कमरों का एक गेस्ट हाउस भी बनेगा. इसके लिए 121 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे.

वनों को नुकसान न केवल परियोजनाओं से हो रहा है बल्कि राज्य में दावानल की घटनाएं भी हाल के वर्षों में बढ़ी हैं, जिससे वन स्वाहा हो रहे हैं.

बिहार में साल 2016-2017 से 2020-2021 तक दावानल की 2335 घटनाएं हुईं जिनमें 3043.6 हेक्टेयर वनक्षेत्र को नुकसान हुआ.

सघन वनों का यह नुकसान तब पहुंचाया जा रहा है जब बिहार उन राज्यों में शुमार है, जिस पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव सबसे ज्यादा पड़ने वाला है.

बिहार में वनों पर काम करने वाले एक्टिविस्ट नागेश आनंद मोंगाबे–हिन्दी को बताते हैं, “इससे पता चलता है कि सरकार बिहार में हरियाली बढ़ाने के लिए कितना गंभीर है. सरकार भले ही हरियाली बढ़ाने के लाख दावे कर ले, लेकिन सच्चाई यही है कि वन को सबसे ज्यादा नुकसान राज्य सरकार ने ही किया है.”

वह वनों को पूरी तरह नुकसान पहुंचा कर विकास योजनाएं लाने के खिलाफ हैं. वह कहते हैं, “अगर सघन वन क्षेत्र में कोई विकास योजना शुरू करना है, तो पहले सरकार को यह देखने की जरूरत है कि वन को बिना नुकसान पहुंचाये उसे लागू की जाए. साथ ही सरकार को चाहिए वनों को उस विकास योजना के साथ जोड़े न कि पूरी तरह बर्बाद कर दे. बिहार में सघन वन क्षेत्र बेहद कम है, इसलिए हमें इसे नुकसान पहुंचाने की जगह संरक्षित करने की जरूरत है.”

हरियाली बढ़ाने के सरकार के दावे

बिहार सरकार ने इकोनॉमिक सर्वे में बिहार में हरियाली बढ़ाने के लिए करीब आधा दर्जन परियोजनाओं को जमीन पर उतारने का जिक्र किया है.

इनमें जल जीवन हरियाली मिशन, राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम, नमामी गंगे, बम्बू मिशन व कैम्पा सेक्शन आदि शामिल हैं.

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, जल जीवन हरियाली मिशन के तहत सरकार ने 47 लाख पौधे लगाये. वहीं, राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम के तहत साल 2019-2020 में 1000 हेक्टेयर में 6.95 लाख पौधे और साल 2020-2021 में 1935 हेक्टेयर में 13.06 लाख पौधे लगाये गये.

नालंदा जिले के अकबरपुर गांव में एक किलोमीटर सड़क के किनारे 1600 पौधे लगाये गये थे. लोगों का कहना है कि इन पौधों की देखभाल के लिए सरकार ने कोई इंतजाम नहीं किया. तस्वीर - उमेश कुमार राय

इसी तरह नमामी गंगे परियोजना के तहत साल 2021-2022 में गंगा नदी के किनारे के 18 फॉरेस्ट डिविजन में 2.50 लाख पौधारोपण किये गये.

हालांकि, पौधारोपण कार्यक्रम से जुड़े वर्करों का कहना है कि पौधे तो लगाये जाते हैं, लेकिन वे सुरक्षित रहें, इसके लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाये जाते हैं.

राज्य के नालंदा जिले के हिल्सा प्रखंड के अकबरपुर गांव में एक किलोमीटर सड़क के किनारे 1600 पौधे साल 2020 में लगाये गये थे. लेकिन इनमें से 30 प्रतिशत से ज्यादा पौधे सूख चुके हैं, लेकिन जो बचे भी हैं, उन्हें बचाने में सरकारी पहल नहीं हुई बल्कि जिन्होंने पौधे लगाये थे, उन्होंने अपने खर्च पर इन्हें जिंदा रखा.

मनरेगा के तहत ये पौधे लगाने वाले कामगारों में से एक ब्रह्मदेव बिंद ने मोंगाबे–हिन्दी को बताया, “हमलोग 16 मजदूरों ने दो महीने में ये पौधे लगाये थे. लेकिन हमारी मजदूरी नहीं मिली थी. हमने सोचा कि अगर पौधे सूख गये, तो बाद में सरकार मजदूरी देने में आनाकानी करेगी क्योंकि पौधे सूख जाएंगे, तो हम यह दावा नहीं कर सकेंगे कि हमने पौधे लगाये थे. इसलिए 10 हजार रुपए खर्च हमलोगों ने पम्प सेट खरीदा और पौधों में नियमित पानी दिया और देखभाल की. सरकार की तरफ से देखभाल के लिए न तो पम्प दिया गया और न ही खाद.”

वनों को लेकर काम करने वाले एक्टिविस्टों का कहना है कि पौधारोपण कार्यक्रमों से प्राकृतिक वनों को हुए नुकसान की भरपाई नहीं की जा सकती है. साथ ही वे पौधारोपण कार्यक्रमों को संदेह की नजर से भी देखते हैं.

नागेश कहते हैं, “प्राकृतिक वन को तैयार होने में सैकड़ों साल लग जाते हैं. ऐसे में बने–बनाये वनों को बर्बाद कर पेड़ लगाना कहीं से भी सही नहीं लगता है. कागजों में यह अच्छा लगता है कि पौधे लगाकर ग्रीन कवर बढ़ा रहे हैं, लेकिन व्यावहारिक बात यह है कि जो पौधे अभी लग रहे हैं, उन्हें वन के रूप में विकसित होने में कम से कम 300 साल लगेंगे. ऐसे में प्राकृतिक वनों से छेड़छाड़ करने से जो नुकसान वर्षों तक होगा, उसकी भरपाई कैसे होगी.”

वनों पर काम करने वाले गैर-सरकारी संगठन तरुमित्र के को-ऑर्डिनेटर एस. दर्शन ने मोंगाबे–हिन्दी को बताया, “ग्रीन कवर बढ़ाने से वन नहीं बनता है. वन एक नेटवर्क है, जहां हजारों जीवन एक दूसरे पर निर्भर होते हैं. हम एक तरफ वन बर्बाद कर दें और उसकी जगह सड़क किनारे चार पेड़ लगा दें, तो वह वन को हुए नुकसान की भरपाई कतई नहीं कर पायेंगे.”

पौधारोपण कार्यक्रमों को लेकर वह कहते हैं, “सरकार भले ही कागजों पर कितना भी दावा कर ले, लेकिन मेरा आकलन यह है कि सरकार जितने पौधे लगाने के दावे करती है, जमीन पर उसके मुकाबले 20-25 प्रतिशत ही पेड़ लगे होंगे.”

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग में चीफ फॉरेस्ट कंजर्वेटर अभय कुमार दिवेदी ने कहा, “राज्य में विकास कार्यों में वनों को कम से कम नुकसान पहुंचे इसके लिए केंद्र सरकार ने वन संरक्षण नियमों में बदलाव किया है और हमलोग बिहार में भी उसे कड़ाई से पालन कर रहे हैं. कई ऐसे प्रोजेक्ट जिनसे सघन वन को नुकसान हो सकता था, इस संशोधित एक्ट के चलते उन्हें मंजूरी नहीं मिली है.”

“इसके अलावा हमलोग पेड़ों को काटने की जगह उन्हें उखाड़ कर दूसरी जगह लगाने पर जोर दे रहे हैं. इसके लिए हमलोगों ने पेड़ संरक्षण प्लान भी बनाया है. अगर कोई प्रोजेक्ट आता है, जिसमें पेड़ काटने की जरूरत है, तो हम सबसे पहले उस प्रोजेक्ट के लिए संरक्षण प्लान मांगते हैं. इसके बाद हमलोग अपने स्तर पर सर्वे करते हैं और यह देखते हैं कि कैसे कम से कम पेड़ों का नुकसान कर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी जाए,” उन्होंने कहा.

(यह लेख मुलत: Mongabay पर प्रकाशित हुआ है.)

बैनर तस्वीर: अररिया जिले की वृक्षवाटिका का जंगल. बिहार सरकार ने इस जंगल को खुला चिड़ियाघर के रूप में विकसित करने का निर्णय लिया है. तस्वीर - उमेश कुमार राय

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