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जब पुलिस भी पीछे भाग गई तब रामरहीम के गुंडों के सामने अकेली डटी रहीं गौरी पराशर जोशी

29th Aug 2017
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आगजनी और तोड़फोड़ में जुटे डेरा समर्थकों के सामने गौरी अकेली रह गईं। हाथों में पत्थर और डंडे लेकर डेरा समर्थक दौड़े तो पुलिसकर्मी मौके से भाग निकले, लेकिन 2009 बैच की आईएएस अधिकारी आक्रोशित भीड़ को शांत करने की कोशिश करती रहीं।

फोटो साभार: सोशल मीडिया

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गौरी का कहना है कि उन्होंने अपने करियर में इससे भी नाजुक हालातों का सामना किया है। पहले वह ओडिशा के नक्सल प्रभावित इलाके कालाहांडी में सेवा दे चुकी हैं।

गौरी ने राम रहीम पर फैसले से पहले जिला में कानून एवं शांति व्यवस्था बनाए रखने के दृष्टिगत सभी सरकारी व गैर सरकारी गेस्ट और रेस्ट हाउसेज के प्रबंधकों को यह आदेश भी जारी किया था कि कोई भी नई बुकिंग बिना पुलिस वैरीफिकेशन और अतिरिक्त उपायुक्त पंचकूला की पूर्वानुमति के न करें।

एक जिम्मेदार अफसर विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी अपना धैर्य नहीं खोता है, उसके दिमाग में लोगों की सुरक्षा ही पहली प्राथमिकता होती है। वो माहौल को काबू करने की हर संभव कोशिश करता है और अपनी सूझबूझ से उस चक्रवात से सबको निकालकर बाहर ले आता है। ऐसा ही एक बेमिसाल उदाहरण पेश किया है, पंचकूला की उपायुक्त गौरी पराशर जोशी ने। पंचकूला की सी.बी.आई. अदालत द्वारा राम रहीम को दोषी करार देने के बाद उनके समर्थकों ने बहुत बवाल किया। हर तरफ तोड़फोड़ अौर आगजनी की। कई मीडिया कर्मियों पर भी हमला किया किया।

राम रहीम की सजा के बाद हरियाणा जल उठा, हालात ऐसे बेकाबू हुए कि पुलिस भी कुछ न कर सकी। राम रहीम को रेप का दोषी करार दिए जाने के बाद डेरा समर्थकों ने जिस तरह बेखौफ होकर हिंसा फैलाई उससे हरियाणा पुलिस की छवि बहुत खराब हुई है। आगजनी कर रही भीड़ को सबसे पहले उन्हीं लोगों ने ही पीठ दिखाई, जिनपर शहर की सुरक्षा का जिम्मा था। बड़े-बड़े अफसर भाग खड़े हुए, तब जिले की उपायुक्त गौरी पराशर जोशी डटी रहीं।

फोटो साभार: सोशल मीडिया

फोटो साभार: सोशल मीडिया


उनके कपड़े तक फट गए लेकिन वो डटी रहीं

आगजनी और तोड़फोड़ में जुटे डेरा समर्थकों के सामने गौरी अकेली रह गईं। हाथों में पत्थर और डंडे लेकर डेरा समर्थक दौड़े तो पुलिसकर्मी मौके से भाग निकले, लेकिन 2009 बैच की आईएएस अधिकारी आक्रोशित भीड़ को शांत करने की कोशिश करती रहीं। राम रहीम के गुंडों के पथराव से गौरी को काफी चोटें आईं। उनके कपड़े तक फट गए, लेकिन उन्होंने मैदान नहीं छोड़ा। वे डटी रहीं। हालात पर नजर रखती रहीं। एकमात्र पीएसओ के साथ वह किसी तरह ऑफिस तक पहुंचीं और हालात संभालने के लिए सेना को मोर्चा संभालने का आदेश जारी किया, जिससे स्थिति को और अधिक बिगड़ने से रोका जा सका।उनके कहने पर ही फिर सेना बुलाई गई थी। गौरी की 11 साल की एक बेटी भी है। गौरी का कहना है कि उन्होंने अपने करियर में इससे भी नाजुक हालातों का सामना किया है। पहले वह ओडिशा के नक्सल प्रभावित इलाके कालाहांडी में सेवा दे चुकी हैं।

गौरी की सूझबूझ से कई हादसे टल गए

गौरी ने राम रहीम पर फैसले से पहले जिला में कानून एवं शांति व्यवस्था बनाए रखने के दृष्टिगत सभी सरकारी व गैर सरकारी गेस्ट और रेस्ट हाउसेज के प्रबंधकों को यह आदेश भी जारी किया था कि कोई भी नई बुकिंग बिना पुलिस वैरीफिकेशन और अतिरिक्त उपायुक्त पंचकूला की पूर्वानुमति के न करें। घर जाने से पहले उन्होंने पूरी रात शहर के हर कोने में जाकर स्थिति का जायजा लिया। घायल होने पर भी गौरी ऑफ‍िस पहुंचीं और सेना को एक आदेश की कॉपी थमाई। इस आदेश की मदद से सेना ने पंचकूला में माहौल को और बिगड़ने से रोका। पंचकूला के स्थानीय व्यक्ति सतिंदर नांगिया ने मीडिया को बताया, 'यदि सेना नहीं आई होती तो रिहायशी इलाकों में अभूतपूर्व तबाही का दृश्य होता। हम स्थानीय पुलिस को पिछले कई दिनों से चाय और बिस्किट दे रहे थे, लेकिन जब डेरा समर्थक बेकाबू हुए तो पुलिसकर्मी सबसे पहले भाग गए।'

शहर को सेना के हवाले कर पहुंचीं घर

घायल होने के बाद भी गौरी ने मोर्चा नहीं छोड़ा और सुबह 3 बजे हालात सामान्य होने पर ही घर वापस लौटीं। उनके घर लौटने से पहले उन्होंने बिगड़े माहौल को अंडर कंट्रोल कर लिया था। समर्थकों के हमले की प्रत्यक्षदर्शी एक स्थानीय निलासी के मुताबिक, पुरुषवादी समाज को इन होनहार वीर लड़कियों से सबक लेने की जरूरत है। खासकर हरियाणा जैसे कम सेक्स रेश‍ियो वाले राज्य में इसकी काफी जरूरत है। 

पढ़ें: वो इनका चेहरा ही नहीं इनकी आत्मा भी जला देना चाहते थे लेकिन हार गए

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