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भारत का वो बहादुर रॉ एजेंट जिसने पाकिस्तानी सेना में मेजर बनकर दी थी खुफिया जानकारी

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10th May 2018
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 हमारे देश की सुरक्षा में खुफिया एजेंट बनकर अपनी जान पर खेलने वाले न जाने कितने सिपाही अपनी जान गंवा देते हैं और अफसोस की बात है कि उन्हें पहचाना भी नहीं जाता और उनका परिवार हमेशा बदहाल जिंदगी जीता रहता है। ऐसे ही एक बहादुर सिपाही थे रविंदर कौशिक। वे एक प्रसिद्ध पंजाबी थिएटर आर्टिस्ट थे। उन्होंने स्टेज पर अपनी शानदार परफॉर्मेंस से न जाने कितने दर्शकों का दिल जीता था। एक बार उनके नाटक को देखने भारतीय खूफिया एजेंसी के अधिकारी भी गए। वे रविंदर की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए। 

रविंदर कौशिक (फाइल फोटो)

रविंदर कौशिक (फाइल फोटो)


उन्होंने पाकिस्तान में नबी अहमद शाकिर बनकर प्रवेश किया। रविंदर को पाकिस्तान में सर्वाइव करने के लिए कड़ी ट्रेनिंग दी गई थी। हालांकि उन्हें उर्दू की अच्छी जानकारी थी, शायद यही वजह थी कि उन्हें पाकिस्तान जाने में खास दिक्कत नहीं हुई।

हमारे देश की सुरक्षा में खुफिया एजेंट बनकर अपनी जान पर खेलने वाले न जाने कितने सिपाही अपनी जान गंवा देते हैं और अफसोस की बात है कि उन्हें पहचाना भी नहीं जाता और उनका परिवार हमेशा बदहाल जिंदगी जीता रहता है। ऐसे ही एक बहादुर सिपाही थे रविंदर कौशिक। रविंदर कौशिक का जन्म राजस्थान के गंगानगर में 1952 को हुआ था। वे एक प्रसिद्ध पंजाबी थिएटर आर्टिस्ट थे। उन्होंने स्टेज पर अपनी शानदार परफॉर्मेंस से न जाने कितने दर्शकों का दिल जीता था। एक बार उनके नाटक को देखने भारतीय खूफिया एजेंसी के अधिकारी भी गए। वे रविंदर की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए। 

रविंदर के छोटे भाई राजेश्वर ने हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था, 'उन्होंने इस नाटक का अकेले मंचन किया था, जिसमें वे सेना के अधिकारी के रोल में थे। नाटक का अधिकारी चीन को भारत की खुफिया जानकारी दे देता है। इस वजह से नाटक देख रहे इंटेलिजेंस अधिकारियों ने उन्हें रॉ में शामिल करने के बारे में सोचा था।'

रविंदर को पाकिस्तान में रॉ का अंडरकवर एजेंट बनकर भारत के लिए काम करने का ऑफर मिला। देश की सेवा के लिए उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। दो साल की कड़ी ट्रेनिंग के बाद 1975 में उन्हें पाकिस्तान भेजा गया। उन्होंने पाकिस्तान में नबी अहमद शाकिर बनकर प्रवेश किया। रविंदर को पाकिस्तान में सर्वाइव करने के लिए कड़ी ट्रेनिंग दी गई थी। हालांकि उन्हें उर्दू की अच्छी जानकारी थी, शायद यही वजह थी कि उन्हें पाकिस्तान जाने में खास दिक्कत नहीं हुई।

रविंदर ने कराची विश्वविद्यालय में एलएलबी के प्रवेश में दाखिला लिया। इसके बाद उन्होंने पोस्ट ग्रैजुएशन भी कंप्लीट किया और पाकिस्तान सेना में कमीशन्ड ऑफिसर के तौर पर नौकरी जॉइन की। बाद में उन्हें मेजर के रैंक पर प्रमोट कर दिया गया। इतना ही नहीं उन्होंने पाकिस्तान की एक लड़की से शादी भी की थी और एक बेटी के पिता भी बने। 1979 से लेकर 1983 के बीच रविंदर ने पाकिस्तानी सेना में मेजर की हैसियत से भारतीय खुफिया एजेंसी को काफी महत्वपूर्ण जानकारियां दीं। इससे भारत के खुफिया विभाग को अपने कई ऑपरेशन में काफी मजबूती मिली।

इसी बीच 1983 में इनायत मसीहा नाम के एक भारतीय एजेंट को पाकिस्तान की सीमा पार कराने के चक्कर में रविंदर को पकड़ लिया गया। इसके बाद उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया गया और जांच की गई तो सारी सच्चाई का खुलासा हो गया। रविंदर को दो साल तक कड़ी निगरानी में सियालकोट में रखा गया और उन्हें कठोर प्रताड़नाएं दी गईं। 1985 में उन्हें मौत की सजा सुना दी गई। लेकिन बाद में पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मौत की सजा को उम्र कैद में तब्दील कर दिया। कौशिक को इसके बाद सियालकोट, कोट लखपत समेत कई जेलों में 16 साल तक रखा गया। लेकिन इस दौरान भी वे गुपचुप तरीके से अपने परिवार को पत्र लिखते रहे और अपनी खराब हालत के बारे में बताते रहे।

रविंदर की हालत जेल में और खराब होती जा रही थी। उन्हें टीबी भी हो गई थी। इलाज न मिलने के कारण 21 नवंबर 2001 में उनकी मौत हो गई। उस वक्त वे मुल्तान जेल में कैद थे। जेल में ही उनके शव को दफना दिया गया। उनके छोटे भाई राजेश्वर को इस बात का मलाल रहा कि उनके भाई के बलिदान को देश भूल गया। सरकार ने भी उनकी कोई मदद नहीं की। उनके माता-पिता की मौत के बाद मिलने वाली पेंशन भी बंद कर दी गई। एक अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि एक पत्र में रविंदर ने लिखा था, 'क्या भारत जैसे बड़े देश के लिए कुर्बानी देने वालों को यही मिलता है?'

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