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आवारा मसीहा के लिए दर-दर भटके विष्णु प्रभाकर

उपन्यासकार शरतचन्द्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' लिखने के लिए विष्णु प्रभाकर ने सीखी थी बांग्ला...

21st Jun 2017
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'कहा है महाजनों ने कि मौन ही मुखर है, कि वामन ही विराट है।' हिंदी साहित्य की विविध विधाओं के साथ 'आवारा मसीहा' के यशस्वी लेखक स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर की रचना यात्रा कविता से शुरू हुई थी। विष्णु प्रभाकर कहते थे- एक साहित्यकार को सिर्फ यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे क्या लिखना है, बल्कि इस पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या नहीं लिखना है। आज उनकी यादगार तिथि है। जयंती पर उनके शब्दों के साथ- 'शब्द में अर्थ नहीं समाता, समाया नहीं, समाएगा नहीं, काम आया है वह सदा, आता है, आता रहेगा, उछालने को कुछ उपलब्धियाँ, छिछली अधपकी....।'

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उपन्यासकार शरतचन्द्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' लिखने के लिए विष्णु प्रभाकर ने बांग्ला सीखी। यह पुस्तक प्रकाशित होते ही उनकी ख्याति की दुंदभी बज उठी। ऐसा हो भी क्यों नहीं, इसे रचने में उन्होंने वनवास जो काटा था।

'अर्द्धनारीश्वर' पर विष्णु प्रभाकर को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। वह अपनी वसीयत में संपूर्ण अंगदान की इच्छा व्यक्त कर गए थे। वर्ष 2005 में वह एक बार फिर उस वक्त सुर्खियां बने, जब राष्ट्रपति भवन में अपने साथ दुर्व्यवहार का विरोध करते हुए उन्होंने पद्म भूषण की उपाधि लौटाने की घोषणा कर दी। 

देश के जाने-माने साहित्यकार विष्णु प्रभाकर का घर का नाम विष्णु दयाल था। एक संपादक के सुझाव पर उन्होंने 'प्रभाकर' उपनाम रख लिया। उनका छात्र जीवन अनवरत अभावग्रस्त रहा था। स्कूली पढ़ाई ठीक से नहीं कर पाए। घर-गृहस्थी चलाने के लिए चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की नौकरी करनी पड़ी। इस दौरान भी पाठ्यक्रम में व्यस्त रहे। हिन्दी में प्रभाकर, हिन्दी भूषण, संस्कृत में प्रज्ञा की डिग्री प्राप्त की। हिसार में नाटक मंडली में काम किया और बाद के दिनों में उन्होंने लेखन को ही अपनी जीविका का आधार बना लिया। उनके जीवन पर गाँधीवाद की गहरी छाप रही। लेखनी के साथ स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। प्रेमचंद, यशपाल, जैनेंद्र, अज्ञेय जैसे शीर्ष साहित्यकारों के सहयात्री बने।

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उपन्यासकार शरतचन्द्र की जीवनी 'आवारा मसीहा' लिखने के लिए विष्णु प्रभाकर ने बांग्ला सीखी। यह पुस्तक प्रकाशित होते ही उनकी ख्याति की दुंदभी बज उठी। ऐसा हो भी क्यों नहीं, इसे रचने में उन्होंने मानो वनवास काटा, जीवन के चौदह वर्ष बिता दिए। अपने साहित्य में भारतीय वाग्मिता और अस्मिता को व्यंजित करने के लिये प्रसिद्ध रहे विष्णु प्रभाकर ने अपनी लेखनी से हिन्दी साहित्य की सभी विधाओं को समृद्ध किया- कहानी, उपन्यास, नाटक, एकांकी, संस्मरण, बाल साहित्य। 'अर्द्धनारीश्वर' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। वह अपनी वसीयत में संपूर्ण अंगदान की इच्छा व्यक्त कर गए थे। वर्ष 2005 में वह एक बार फिर उस वक्त सुर्खियां बने, जब राष्ट्रपति भवन में अपने साथ दुर्व्यवहार का विरोध करते हुए उन्होंने पद्मभूषण की उपाधि लौटाने की घोषणा कर दी। इसलिए अंतिम संस्कार न कर पार्थिव शरीर अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान को सौंप दिया गया।

कालजयी कृति ‘आवारा मसीहा’ के साथ कई पठनीय आख्यान जुड़े हैं। यह कृति ज्ञानपीठ के लिए स्वीकृत हो गई थी। इससे पूर्व ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में इसका क्रमशः प्रकाशन होता रहा था। एक प्रश्न पर विष्णु प्रभाकर ने बताया था कि "तीन लेखक हुए, जिन्हें जनता दिलोजान से प्यार करती है- तुलसीदास, प्रेमचंद और शरतचंद्रअमृत लाल नागर ने ‘मानस का हंस’ लिखकर तुलसी की छवि को निखार दिया। अमृत राय ने कलम का सिपाही लिखा। प्रेमचंद को हम नजदीक से देख सके। पर शरत के साथ तो कोई न्याय न हुआ। उनके ऊपर लिखनेवाला कोई न हुआ। न कुल-परिवार में। न कोई साहित्यप्रेमी। यह बात मुझे 24 घंटे बेचैन किए रहती थी इसीलिए मुझे लगा कि मुझे ही यह काम करना होगा।" 

बताया जाता है कि इसके सृजन से पहले उन्होंने शरतचंद्र की कृतियों के पात्रों का भी थाह-पता लगाया था। बिहार, बंगाल, बांग्लादेश, बर्मा गए थे। उसी दौरान उन्हें ज्ञात हुआ था, कि 'देवदास' की चंद्रमुखी भागलपुर की रहने वाली तवायफ कालिदासी थी।

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विष्णु प्रभाकर कहते थे- 'एक साहित्यकार को सिर्फ यह नहीं सोचना चाहिए कि उसे क्या लिखना है, बल्कि इस पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए कि क्या नहीं लिखना है। हर आदमी दूसरे के प्रति उत्तरदायी होता है। यही सबसे बड़ा प्रेम का बंधन है। मेरे साहित्य की प्रेरक शक्ति मनुष्य है। अपनी समस्त महानता और हीनता के साथ, अनेक कारणों से मेरा जीवन मनुष्य के विविध रूपों से एकाकार होता रहा है और उसका प्रभाव मेरे चिंतन पर पड़ता है। कालांतर में वही भावना मेरे साहित्य की शक्ति बनी। मेरे साहित्य का जन्म मेरे जीवन की त्रासदियों से हुआ है।'

गांधी जी की अहिंसा में विष्णु प्रभाकर की पूरी आस्था थी। वे मूलत: मानवतावादी थे। मानवता की खोज ही उनका लक्ष्य था। वे मानते थे, कि अहिंसा की स्थापना के बिना मानवता का कल्याण नहीं।

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