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इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ एक युवा तैयार कर रहा है अंडर-19 फुटबॉल टीम

Geeta Bisht
2nd Apr 2016
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कभी बड़े बुजुर्ग कहते थे कि ‘खेलोगे कूदोगे तो होगे खराब, पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब’ लेकिन आज हालात बदल गये हैं। यही वजह है कि जिस बच्चे के माता पिता चाहते थे कि उनका बेटा इंजीनियर बने, उस लड़के ने फुटबॉल से गहरा लगाव होने के कारण अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ दिया। इतना ही नहीं जब उसने अपने आदर्श बाईचुंग भूटिया की टीम को एक मैच में हारते हुए देखा, तो उसने तय किया कि वो अंडर-19 एक ऐसी टीम बनायेगा जो देश का प्रतिनिधित्व कर सके। इसके लिए वो उन बच्चों की तलाश में जुट गया जो अनाथ हैं, एचआईवी से पीड़ित हैं या फिर सड़कों, गलियों में खाली घूमा करते हैं।


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बेंगलुरु के रहने वाले तेजस पिछले तीन सालों से लगातार इस खेल के विकास में लगे हुए हैं। वो जब 10 साल के थे तभी से ना सिर्फ उनका झुकाव फुटबाल की ओर हो गया था बल्कि उन्होने इसे खेलना भी शुरू कर दिया था। स्कूली पढ़ाई के दौरान तेजस ने फुटबॉल खेलते हुए स्टेट और नेशनल लेवल पर कई टूर्नामेंट में भाग लिया और कई पुरस्कार और मेडल हासिल किये। तेजस ने स्कूल पढ़ाई पूरी करने के बाद इलेक्ट्रिकल से इंजीनियरिंग करने के लिए बीटेक में दाखिला लिया। जिस कॉलेज में उन्होने दाखिला लिया वहां पर भी फुटबाल की बहुत अच्छी सुविधा थी। इस कारण उनका मन पढ़ाई की जगह फुटबाल में ज्यादा लगता था और अपने फुटबांल के प्रति इसी जुनून के कारण उन्होंने अपनी इंजीनियरिंग की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ दिया।


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तेजस की जिंदगी में बदलाव तब आया जब दिल्ली में साल 2012 में भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान बाईचुंग भूटिया की टीम जर्मनी की टीम से नहीं बल्कि वहां के एक क्लब से कर रही थी। इस मैच को भारत हार गया था। तेजस भी उस मैच को देख रहे थे। तेजस बताते हैं कि “ये देखकर मुझे गहरा सदमा और बुरा लगा कि भारतीय टीम एक छोटे से क्लब से हार गई है। तब मैंने सोचा कि देश में फुटबॉल का परिदृश्य बदलने की जरूरत है। इसलिये क्यों ना मैं ही इसके लिये कोशिश करूं और ऐसे लोगों को अपने साथ जोडूं जो युवा हों और समाज के सबसे नीचले तबके से आते हों।”


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इसके बाद तेजस ने एकेडमी बनाने के लिए सबसे इंटरनेट पर खोजबीन कर ये जानने की कोशिश की कि यूरोप के लोग कैसे फुटबाल खेलते हैं और इसके लिए क्या जरूरी चीजें हैं। उसके बाद वे कोयम्बटूर और दूसरी छोटी जगहों पर गये। वहां पर उन्होंने देखा की जो बच्चे फुटबॉल खेलते हैं उन्हें ठीक से जूते के फीते तक बांधना भी नहीं आता। इसके बाद उन्होने फुटबॉल से जुड़ा एक पाठ्यक्रम तैयार किया जिसमें फुटबाल मैदान के बारे में, फुटबॉल के जूते, ड्रैस और किस तरह की फुटबॉल होनी चाहिए ये बताया। इस पाठ्यक्रम को लेकर जब वे स्कूल, कॉलेज और दूसरी एकेडमी में गये तो उन्हें किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया। जब हर तरफ से उनके हाथ निराशा ही लगी तो तेजस ने खुद अपनी एक एकेडमी बनाई और उसका नाम रखा “स्पार्की फुटबॉल”। तब वो सिर्फ 19 साल के थे।


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तेजस ने अपनी इस एकेडमी में फ्री स्टाइल फुटबॉल सिखाने के बारे में सोचा। तब वो अपने माता पिता का घर छोड़ एक छोटे अपार्टमेंट में रहने लगे। वे रात में कॉल सेंटर में काम करते और सुबह-शाम बच्चों को जगलिंग, रनिंग, सिखाने लगे। इसके लिए उन्होने एक वीडियो भी तैयार किया और उसे यू-ट्यूब में अपलोड किया। धीरे धीरे लोग उनके काम को गंभीरता से लेने लगे और कई स्कूल, कॉलेज और एकेडमी से उन्हें फ्री-स्टाइल फुटबॉल सिखाने का काम मिलने लगा, लेकिन तेजस का लक्ष्य फुटबॉल का व्यवसायिक करण करना नहीं था। वे तो फुटबॉल को लोकप्रिय बनाना चाहते थे। साथ ही वे एक ऐसी टीम बनाना चाहते थे जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मैच खेल सके।


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तब तेजस ने एक एनजीओ बनाई जो ऐसे बच्चों को फुटबाल सिखाने का काम करती है जिनके पास इस खेल को सिखने के लिए संसाधन नहीं हैं। इसके लिये वो कई अनाथ आश्रम और झुग्गी बस्तियों में गये और वहां पर ऐसे बच्चों को चुना जिनकी रूचि फुटबॉल में थी। तेजस बताते हैं कि शुरूआत में जब उन्होने ऐसे बच्चों को फुटबॉल सिखाना शुरू किया तब इन बच्चों को जूतों की फीते बांधना भी नहीं आता था। लेकिन आज ये दूसरे फुटबॉल खिलाड़ियों को चकमा देना सीख गये हैं।


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तेजस बताते हैं कि “ये बच्चे बहुत गरीब परिवारों से आते हैं इसलिए इनके पास कपड़े, जूते और दूसरा सामान नहीं होता। इन सब सामानों के लिए स्थानीय स्तर पर लोग हमें मदद करते हैं।” कुछ साल की ट्रेनिंग के बाद इन्होंने एक ऐसी अंडर 19 टीम बनाई जिसका मुकाबला उसी जर्मनी की फुटबॉल क्लब की टीम से हुआ जिससे भारतीय टीम हार गयी थी। लेकिन इस बार तेजस की टीम ने जर्मनी के उस फुटबॉल क्लब की टीम को हरा दिया।


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आज तेजस के “स्पार्की फुटबॉल” एकेडमी में 18 अनाथ बच्चे फुटबॉल सीख रहे हैं और इनकी उम्र 4 से 18 साल के बीच है। इनके अलावा ये 10 एचआईवी पीड़ित बच्चों को भी ट्रेनिंग दे रहे हैं। इनमें से कई बच्चे आज कोच बनकर उन बच्चों को फुटबॉल की ट्रेनिंग दे रहे हैं जो संपन्न घरों से आते हैं। अपनी फंडिग के बारे में तेजस का कहना है कि उनको सपोर्ट करने के लिए कोई संस्था नहीं हैं। तेजस कहते हैं कि “हमारे खर्चे बहुत कम हैं और मैं खुद दूसरों को फ्री-स्टाइल फुटबॉल सिखाकर और कॉल सेंटर में काम कर पैसे कमाता हूं। ताकि दूसरे गरीब बच्चे फुटबॉल सीख सकें।” 

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