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पर्यावरण बचाओ: गन्ने का रस निकालने के बाद बचे रेशे से बनी प्लेटों को इस्तेमाल कर रहा रेलवे

इंडियन रेलवे की नई पहल...

7th Jun 2018
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विश्व पर्यावरण दिवस-2018 के अवसर पर रेल मंत्रालय के पीएसयू आईआरसीटीसी ने नई दिल्ली से संचालित होने वाली 8 चुनिंदा शताब्दी और राजधानी ट्रेनों में पर्यावरण के अनुकूल खोई आधारित डिब्बाबंद भोजन की शुरूआत की है।

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


रेलवे के हरित कार्यक्रम के तहत इन ट्रेनों में यात्रियों को रेलवे द्वारा प्रदान किया जाने वाला भोजन अब पॉलिमर के बजाय पर्यावरण के अनुकूल डिस्पोजेबल प्लेट (कंपोस्टेबल कंटेनर) में परोसा जाएगा।

पर्यावरण बचाने की दिशा में इन दिनों प्लास्टिक के उपयोग पर स्वैच्छिक पाबंदी लगाने की बात हो रही है। अब प्लास्टिक का विकल्प भी खोजा जा रहा है। गन्ने के जूस के बाद जो रेशेदार अवशेष रह जाता है उससे डिस्पोजेबल प्लेटें तैयार की जा सकती हैं। इंडियन रेलवे ने अपनी ट्रेनों में अब इन प्लेटों को इस्तेमाल की शुरुआत भी कर दी है। विश्व पर्यावरण दिवस-2018 के अवसर पर रेल मंत्रालय के पीएसयू आईआरसीटीसी ने नई दिल्ली से संचालित होने वाली 8 चुनिंदा शताब्दी और राजधानी ट्रेनों में पर्यावरण के अनुकूल खोई आधारित डिब्बाबंद भोजन की शुरूआत की है।

रेलवे के हरित कार्यक्रम के तहत इन ट्रेनों में यात्रियों को रेलवे द्वारा प्रदान किया जाने वाला भोजन अब पॉलिमर के बजाय पर्यावरण के अनुकूल डिस्पोजेबल प्लेट (कंपोस्टेबल कंटेनर) में परोसा जाएगा। इस नई पहल के साथ आईआरसीटीसी ने स्वच्छ और हरित भारत के प्रति अपनी वचनबद्धता की पुष्टि की है और इसे हासिल करने के लिए इस दिशा में एक छोटा सा कदम उठाया है। गन्ने का रस निकालने के बाद जो रेशेदार अवशेष रह जाता है उसका उपयोग डिस्पोजेबल कटलरी और कंटेनर बनाने के लिए किया जा रहा है, जिसमें भोजन परोसा जाएगा।

प्रयुक्त पैकेजिंग को एकत्र करने का प्रावधान किया जाएगा जिसका बाद में पर्यावरण स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए कंपोस्टिंग के माध्यम से निपटान किया जाएगा। शुरुआती चरण के बाद, गैर-जैव-अपरिवर्तनीय सामग्री के व्यवहारिक विकल्प के रूप में खोई आधारित डिब्बाबंद भोजन का प्रयोग आने वाले महीनों में आईआरसीटीसी द्वारा संचालित होने वाली सभी राजधानी, शताब्दी और दुरंतों रेलागाड़ियों में किया जाएगा। इससे भारी मात्रा में प्लास्टिक का उपयोग कम हो सकेगा। रेल की पटरियों और स्टेशन पर गंदगी का एक बड़ा कारण प्लास्टिक भी है। अगर इसे पूरे देश में लागू किया गया तो स्टेशनों की तकदीक जल्द ही बदल सकती है।

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