संस्करणों
विविध

निज़ाम के ख़ज़ाने के लिए दिल्ली कुछ और दूर...

YS TEAM
22nd Jun 2016
Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share

ब्रिटेन की एक अदालत ने हैदराबाद कोष मामले के तहत करीब 350 करोड़ रूपये के पाकिस्तान के दावे को खारिज करने की भारत की अर्जी आज नामंजूर कर दी। इस तरह अब इस मामले पर अदालत में पूरी सुनवाई होगी। एक विज्ञप्ति में पाकिस्तान विदेश कार्यालय ने कहा है कि ब्रिटिश उच्च न्यायालय ने हैदराबाद कोष पर पाकिस्तान के दावे को खारिज करने की भारत की कोशिश 21 जून 2016 को नामंजूर कर दी..भारत अदालत को यह समझा पाने में नाकाम रहा कि पाकिस्तान का रूख अनुचित है और इस तरह यह इस चीज को जाहिर नहीं कर सका कि 20 सितंबर 1948 से पाक उच्चायुक्त के नाम से एक बैंक खाते में पड़े करीब 350 करोड़ रूपये पर वह कानूनन हक नहीं रखता है।

न्यायाधीश ने स्वीकार किया कि पाकिस्तान के दावे के पक्ष में ठीकठाक सबूत हैं जिन पर सुनवाई के दौरान पूरी तरह से विचार किए जाने की जरूरत है।

image


हालांकि, नयी दिल्ली में विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘‘मुकदमे के लंबित रहने या मामले के सुलझने तक धन के मालिकाना हक के बारे में किसी निष्कर्ष तक पहुंचना जल्दबाजी होगी, खासतौर पर तब, जब मौजूदा फैसला स्वीकार करता है कि पाकिस्तान के दावे को काटने के लिए भारत की कई दलीलों में काफी दम है।’’ भारत ने इस मामले में पिछले फैसलों का भी जिक्र किया जब मामले को बंद करने की पाकिस्तान की अर्जी इसी अदालत ने 2015 में खारिज कर दी थी और उस मौके पर पाकिस्तान के खिलाफ भारत को मुकदमे का खर्च भी दिया गया था।

हैदराबाद कोष मामला :हैदराबाद फंड केस: नाम का यह विषय 1948 में तत्कालीन नवनिर्मित राष्ट्र पाकिस्तान के लिए ब्रिटेन में उच्चायुक्त हबीब इब्राहिम रहीमतुल्ला के नाम पर लंदन के बैंक खाते में 1,007,940 पाउंड और नौ शिलिंग हस्तांतरित किए जाने का है। यह धन एक एजेंट ने हस्तांतरित किया था। समझा जाता है कि उसने सबसे बड़ी और सबसे धनी भारतीय रियासत, हैदराबाद के सातवें निज़ाम की ओर से यह काम किया था। 18 सितंबर 1948 को हैदराबाद को भारत में मिला लिया गया। 20 सितंबर 1948 को एजेंट ने यह धन रहमतुल्ला को हस्तांतरित कर दिया। वहीं, 27 सितंबर 1948 को निज़ाम ने यह दावा करते हुए इस धन को वापस करने की मांग की कि यह हस्तांतरण उनकी इजाज़त के बगैर किया गया था।

बैंक ने खाताधारक की सहमति के बिना निज़ाम की मांग को मानने से इंकार कर दिया और खाता धारक से इस तरह की सहमति कभी मिली नहीं इसलिए यह मामला अनसुलझा ही रह गया। (पीटीआई)

Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags