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बिना धुंए के चूल्हों के जरिये महिलाओं को स्वस्थ और स्वावलंबी बनाने की कोशिश

Geeta Bisht
15th May 2016
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पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद दीक्षा चाहतीं तो किसी बड़े संगठन में काम कर सकती थीं, लेकिन वो ये सब छोड़ गुजरात के एक ऐसे आदिवासी इलाके में पहुंच गई जो काफी पिछड़ा हुआ था और जहां पर महिलाओं की हालत काफी बुरी थी। दीक्षा ने अपने मजबूत इरादों की बदलौत बिना धुंए वाले चूल्हे के जरिये इन महिलाओं के जीवन में ऐसा बदलाव किया कि ना केवल इससे उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ बल्कि इन चूल्हों के जरिये उनमें से कई महिलाएं आमदनी भी कर रह हैं।


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दीक्षा महिलाओं के अधिकारों को लेकर कुछ करना चाहती थीं, इसलिए उन्होने सामाजिक क्षेत्र में अपना करियर बनाने के बारे में सोचा। तभी उनको मौका मिला एसबीआई यूथ फॉर इंडिया फैलोशिप से जुड़ने का। इसके लिए उनको गुजरात के वलसाड जिले के आदीवासी इलाके डांग में जाने का मौका मिला। जहां पर उन्होने देखा की नब्बे प्रतिशत से ज्यादा लोग अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर थे। आदिवासी इलाका होने के कारण उनके पास रोजगार का दूसरा कोई साधन नहीं था लेकिन वो इलाका काफी हराभरा था। यहां पर रहने वाले लोगों के घर बांस की लकड़ियों के बने हुए थे। इतना ही नहीं घर की महिलाओं को अपने घर में चूल्हा जलाने के लिए लकड़ी के लिए रोज 6-7 किलोमीटर दूर पैदल चलकर जाना पड़ता था। दीक्षा के मुताबिक “उन महिलाओं की ये हालत देखकर मैं इस बात को सोचने के लिए मजबूर हो गई की कैसे इन महिलाओं की इस दिक्कत को दूर किया जा सकता है। क्योंकि इन महिलाओं को ना सिर्फ रोज इतनी मेहनत करनी होती थी बल्कि चूल्हा जलाने के लिये वो जिस लकड़ी का इस्तेमाल करती थी वो टीक की लकड़ी थी, जो फर्नीचर बनाने के काम में आती है।” इसके अलावा दीक्षा जब पास के अस्पताल में गई तो उन्होने देखा कि वहां पर करीब 200 महिलाओं को सांस से जुड़ी बीमारी है। जब उन्होने इसकी पड़ताल की तो पता चला की इसकी असली वजह चूल्हे से निकलने वाला धुंआ है। तब उन्होने चूल्हे के क्षेत्र में कुछ काम करने का फैसला लिया ताकि इन महिलाओं की परेशानियों को कुछ कम किया जा सके।


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दीक्षा ने देखा कि जिन घरों में एलपीजी या बॉयोगैस की सुविधा थी वो लोग भी इनका ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते थे, क्योंकि एक तो इन सुविधाओं को हासिल करने के लिये गांव वालों को पैसे चुकाने होते थे वहीं दूसरी ओर एलपीजी को दूर दराज से लेकर आना काफी मुश्किल काम था। इसलिए यहां की महिलाएं ज्यादातर लड़की जलाकर ही चूल्हे का इस्तेमाल करती थीं। भले ही इसके इस्तेमाल में तमाम दिक्कतें थीं, बावजूद खाना बनाने का उनका काम मुफ्त में ही हो जाता था। तब दीक्षा ने ऐसे चूल्हे पर काम किया जिसमें दो स्टोव थे। इनमें से एक में एलपीजी या दूसरे ईंधन से खाना पकाया जा सकता था, जबकि दूसरे स्टोव में लकड़ी के जरिये खाना पकाने की सुविधा भी थी। इसमें एक पाइप लगा होता था जो घर के बाहर निकलता था ताकि चूल्हे से पैदा होने वाला धुंआ घर से बाहर चला जाये। इसके अलावा खाना पकाने के लिये चूल्हे में पहले जितनी लकड़ियों का इस्तेमाल होता था वो अब घटकर आधा रह गया था। इतना ही नहीं चूल्हे से निकलने वाले धुंए के कारण बर्तन भी कम काले होने लगे, इससे पानी के इस्तेमाल में बचत होने लगी। इतना ही नहीं इन चूल्हों के इस्तेमाल से वनों की कटाई पर भी असर पड़ा। सबसे बड़ी बात ये थी कि बिना धुँए के चूल्हा होने से महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी असर पड़ने लगा और उनको सांस संबंधी बिमारियों से भी छुटकारा मिलने लगा।


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एक ओर दीक्षा ने महिलाओं को इन चूल्हों के जरिये धुंए से निजात दिलाई वहीं इन चूल्हों को उन्होने रोजगार का साधन भी बनाया। दीक्षा ने अपने इस आइडिये को सफल बनाने के लिए डांग इलाके में रहने वाली 20 महिलाओं को चूल्हा बनाने की ट्रेनिंग दी, ताकि वो दूसरों के लिए भी चूल्हा बनाने का काम कर सकें। इस तरह इन आदिवासी महिलाओं की एक चूल्हा बनाने पर सौ रुपये की आमदनी होने लगी। दीक्षा का कहना है कि “आसानी से बनने वाले इन चूल्हों को बनाने में केवल एक घंटा लगता है, ऐसे में अगर कोई महिला दिन भर में 3-4 चूल्हे भी बना लेती है तो वो हर हफ्ते 2 हजार रुपये तक कमा सकती है।” हालांकि शुरूआत में उनके इस काम में ज्यादातर गांव वालों ने रूचि नहीं दिखाई लेकिन दीक्षा ने भी हिम्मत नहीं हारी और उन्होने डांग के करीब 20-30 गांवों का दौरा किया और लोगों को ना सिर्फ खास तरह के चूल्हे के बारे में समझाया बल्कि इससे मिलने वाले फायदे की भी जानकारी दी। उनकी इस कोशिश से कुछ गांव वाले इन चूल्हों को लगाने के लिए तैयार हो गये। धीरे धीरे जब दूसरे लोगों ने इन चूल्हों का असर देखा तो वो भी इन चूल्हों को लेकर अपनी रूचि दिखाने लगे। यहां पर करीब साल भर काम करने के बाद दीक्षा कुछ समय बाद आगां खां फाउंडेशन के साथ जुड़ गई। जिसके जरिये उन्होने बिहार के समस्तीपुर जिले में इस तरह के चूल्हे के मॉडल पर काम किया, ताकि यहां की महिलाओं को भी धुंए से आजादी मिल सके। आज गुजरात और समस्तीपुर में उनके डिजाइन किये चूल्हे अच्छी तरह से काम कर रहें हैं, वहीं दूसरी ओर इन चूल्हों के कारण यहां की महिलाओं कि जिंदगी में भी बदलाव देखने को मिला है।

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