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मां ने दिया अपने बेटे को मिशन, एक डॉक्टर बन गया कैंसर के गरीब मरीजों का मसीहा

Harish Bisht
18th Nov 2015
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600 लोगों का हो चुका है इलाज...

20 हजार से ज्यादा लोगों करा चुके हैं चेकअप...


मां ने उनको जिंदगी का मिशन दिया, जिसके बाद उनको जिद थी डॉक्टर बनने की, ललक थी गरीबों की मदद करने की। तभी तो आज महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में रहने वाले डॉक्टर स्वप्निल माने को लोग किसी मसीहा से कम नहीं मानते। आर्थिक रूप से पिछड़े इस इलाके में रहकर वो कैंसर जैसी महंगी बीमारी का इलाज गरीबों के लिए मुफ्त में करते हैं। महाराष्ट्र के विभिन्न इलाकों में कैंसर की जांच के लिए वो कैम्प लगाते हैं और जरूरत पड़ने पर किसी भी गरीब की मदद करने से पीछे नहीं हटते। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले से करीब 35 किलोमीटर दूर है ‘राहुरी’। आम लोग भले ही इस जगह को ना जानते हों लेकिन आर्थिक रूप से गरीब कैंसर के मरीजों के लिए ये जगह उम्मीद की अंतिम किरण है।

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डॉक्टर स्वप्निल माने का जन्म महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले के एक छोटे से गांव में हुआ। इनके पिता बैंक में क्लर्क थे और मां आंगनवाड़ी टीचर थीं। जब ये आठ साल के थे तो इन्होने अपने पड़ोस में रहने वाले एक कैंसर पेशेंट को देखा। जिनको लंग कैंसर था और वो दैनिक मजदूरी का काम करता था। माने बताते हैं कि वो बमुश्किल हर रोज 50 से 60 रुपये ही कमा पाता था। लेकिन दिन ब दिन उसकी बिगड़ती हालत की वजह से स्थानीय डॉक्टरों ने उसे इलाज के लिए किसी बड़े अस्पताल में जाने को कहा। इसके बाद जब वो एक बड़े अस्पताल में गया तो वहां पर उसके इलाज के लिए 50-60 हजार रुपये मांगे गए। जबकि इतने पैसे उसके पास नहीं थे। माने का कहना है कि “तब मैंने अपनी मां से कहा कि डॉक्टर उसका इलाज क्यों नहीं कर रहे हैं तो मेरी मां ने कहा कि डॉक्टर सिर्फ उन्हीं लोगों का इलाज करते हैं जो उनको पैसा दे सकते हैं” ये बात माने के दिमाग में घर कर कर गई और उन्होने अपनी मां से बोला कि “मैं बड़ा होकर डॉक्टर बनूंगा और गरीबों का मुफ्त में इलाज करूंगा।” इस घटना के बाद उन्होने अपनी जिंदगी का यही मिशन बना लिया कि वो डॉक्टर बन अपनी जिंदगी की अंतिम सांस तक गरीब लोगों का इलाज करेंगे।

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इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में हर रोज 1300 मौते केवल कैंसर के कारण हो रही हैं जबकि साल 2012 से लेकर 2014 के बीच देश में 6 प्रतिशत की रफ्तार से कैंसर मरीजों की संख्या बढ़ी है। रिपोर्ट बताती है कि साल 2014 में केवल कैंसर के कारण 5 लाख लोगों की मौत हुई। हर साल 50 हजार महिलाएं सर्वाइकल कैंसर का शिकार होती हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर स्वप्निल माने ने पांच साल पहले डॉक्टर माने मेडिकल फॉउंडेशन एंड रिसर्च सेंटर की ‘रेहुरू’ में स्थापना की। आज जिस जगह से अस्पताल चल रहा है वो किराये पर ली गई एक जगह है। 16 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में डॉक्टर स्वप्निल माने के अलावा 12 डॉक्टरों की एक टीम है और इनकी मदद के लिए 6 पैरा मेडिकल स्टॉफ भी है। अपने सेंटर के जरिये ये लोग अब तक 600 से ज्यादा मरीजों का इलाज कर चुके हैं।

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डॉक्टर माने का कहना है कि “हम दो प्रोजेक्ट पर एक साथ काम कर रहे हैं। जिसमें से एक है कम्यूनिटी बेस सर्वाइकल कैंसर प्रोजेक्ट। इसके तहत हम लोग गांव गांव जाकर लोगों को कैंसर के प्रति जागरूक करते हैं और उनको उचित सलाह देते हैं। जरूरत पड़ने पर हम कैंसर के मरीजों को ‘राहुरी’ में अपने अस्पताल में आने को कहते हैं ताकि उनका बेहतर तरीके से इलाज हो सके।” डॉक्टर माने मानते हैं कि कैंसर का इलाज काफी महंगा है और देश में ऐसी बहुत कम जगह हैं जहां पर इसका इलाज हो सके। इस कारण कैंसर के कई मरीज दम तोड़ देते हैं। डॉक्टर स्वपनिल माने ने महाराष्ट्र के मुंबई में टाटा मैमोरियल अस्पताल में फैलोशिप की थी। वो बताते हैं कि इस अस्पताल में क्षमता से ज्यादा मरीज आते हैं। ऐसे में जिन लोगों की जैब में सौ-दो सौ रुपये होते हैं उनके लिए वहां पर इलाज होना नामुनकिन है। इतना ही नहीं क्षमता से अधिक पेशेंट होने के कारण उनको दो तीन महीने इंतजार करना पड़ता है ऐसे में कैंसर शरीर में गंभीर बीमारी का रूप ले लेता है।

गरीब लोगों की इन्ही तकलीफों को देखते हुए डॉक्टर माने और उनकी टीम लगातार महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में हैल्थ कैम्प लगाती है। “पिछले पांच साल के दौरान हम लोग इन हैल्थ कैम्प के जरिये करीब 20 हजार से ज्यादा लोगों का चैकअप कर चुके हैं।” वो बताते हैं कि अहमदनगर और इसके आसपास के जिलों में महिलाओं के बीच सर्वाइकल कैंसर तेजी से फैल रहा है। यहां पर हर सौ महिलाओं में से 1 महिला इस बीमारी से पीड़ित है। उनका कहना है कि “पश्चिमी देशों में कैंसर को लेकर काफी जागरूकता है इस कारण वहां पर कैंसर उतने पांव नहीं पसार सका है जितना हमारे देश में।” हमारे देश के गांव में आज भी लोगों को कैंसर के बारे में ठीक से पता नहीं होता और वो इसे आम बीमारी के तौर पर लेते हैं। इसलिए जब वो इलाज के लिए आसपास के किसी डॉक्टर के पास जाते हैं तो उसको भी ज्यादा जानकारी नहीं होती और कैंसर धीरे धीरे शरीर में गंभीर रूप लेने लगता है।

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इसके अलावा घर की महिलाएं कोई तकलीफ होने पर अपने शर्मीले स्वभाव के कारण पहले बीमारी को छुपाती हैं और घर के मुखिया तक बीमारी की बात नहीं पहुंचने देती। इससे बीमारी बढ़ जाती है। डॉक्टर माने का मानना है कि “60 प्रतिशत कैंसर मरीज तब सामने आते हैं जब ये एडवांस स्टेज में पहुंच जाता है। तब डॉक्टर ज्यादा कुछ नहीं कर सकता उस वक्त सिर्फ किमो थैरेपी और रेडियो थैरेपी ही मरीज को दी जा सकती है।” उनका कहना है कि अशिक्षा के कारण लोगों में कैंसर को लेकर ज्यादा जागरूकता नहीं है। देश में लोग इस बात को लेकर साक्षर नहीं हैं कि उनको अपने शरीर का साल भर में एक बार चैकअप कराना चाहिए।

आज डॉक्टर माने कैंसर पीड़ितों का इलाज एक मिशन के तौर पर कर रहे हैं। रेहुरू में डॉक्टर माने मेडिकल फॉउंडेशन एंड रिसर्च सेंटर में आने वाले गरीब कैंसर मरीजों का इलाज का खर्चा सिर्फ 12 हजार रुपये आता है। खास बात ये है कि जो मरीज इतनी रकम देने में भी असमर्थ होते हैं उनका इलाज ये लोग मुफ्त में करते हैं। डॉक्टर माने बताते हैं कि इस कारण उनके सामने कई बार उनके आर्थिक दिक्कत भी आती है लेकिन लोगों से मिलने वाली वित्तिय मदद से ये सुलझ भी जाती है। डॉक्टर स्वपनिल माने का कहना है कि साल 2011 में जब उन्होने इस सेंटर को शुरू किया था तो मशीनों को खरीदने के लिए उन्होने अपनी बचत का पैसा लगाया था जबकि शेष राशि चंदे से इकट्ठा की थी। इस बात को लेकर उनको बड़ी तकलीफ है कि जब भी उनके सेंटर की कोई मशीन खराब हो जाती है तो उसे ठीक कराने के लिए मुंबई या दिल्ली जैसे दूर दराज के शहरों में ले जाना पड़ता है। जिसमें ना सिर्फ पैसा बल्कि वक्त भी खराब होता है। डॉक्टर माने का कहना है कि “हम लोग 6 हजार वर्ग मीटर में एक नये अस्पताल का निर्माण कर रहे हैं। साईंधाम कैंसर अस्पताल करीब 35 बिस्तरों वाला होगा। जहां पर मरीजों को अति आधुनिक सभी तरह की सुविधाएं मिलेंगी।” फिलहाल उनको तलाश है ऐसे लोगों की जो उनके इस काम में आर्थिक मदद देना चाहते हैं, ताकि कैंसर मुक्त भारत का निर्माण किया जा सके।


वेबसाइट : www.manemedicalfoundation.com

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