दीनबंधू साहू के "समुद्र-मंथन" से कई किसानों को मिला अमृत

By Ashutosh khantwal
March 26, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:20:58 GMT+0000
दीनबंधू साहू के  "समुद्र-मंथन" से  कई किसानों को मिला अमृत
समुद्रीय जीव वैज्ञानिक ने ओडिसा के किसानों को सिखाई शैवाल की खेतीकिसानों के लिए वरदान साबित हुआ चिल्का प्रोजेक्टअब मात्र 45 दिनों में खेती कटाई के लिए होती है तैयारप्रोजेक्ट चिल्का को मिली अपार सफलता, बढ़ी किसानों की आय
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दीनबंधू साहू वो नाम है जिसने किताबी ज्ञान को हकीकत के धरातल में रखा और अपने इस प्रयास के बूते हजारों लोगों को रोजगार का एक नया विकल्प दिया। एक ऐसा विकल्प जिसने न सिर्फ ग्रामीणों की जिंदगी सुधारी बल्कि उनका यह प्रयास पर्यावरण की दृष्टि से भी काफी उपयोगी साबित हुआ। साहू ने प्रोजेक्ट चिल्का के जरिए उड़ीसा में लोगों को समुद्री खेती करनी सिखाई जिसके जरिए वे साल भर पैसा कमा सकते हैं। ये एक ऐसा कार्य था जिसके बारे में किसी ने भी नहीं सोचा था लेकिन साहू ने अपने अथक प्रयास द्वारा इसे कर दिखाया।

डॉ दीनबंधु साहू

डॉ दीनबंधु साहू


दीनबंधू साहू एक समुद्रीय जीव वैज्ञानिक हैं। समुद्र में खेती और समुद्र व पानी के द्वारा कौन-कौन से काम किए जा सकते हैं जिसके द्वारा धन सर्जन किया जा सके, साहू उसी क्षेत्र में काम करते हैं।

साहू मूलत: उड़ीसा के रखने वाले हैं। साहू के परिवार में कोई ज्यादा पढ़ा लिखा नहीं था उन्होंने अपनी फीस के पैसों का इंतजाम ट्यूशन पढ़ाकर किया और काफी मुश्किल परिस्थितियों में पढ़ाई की और कॉलेज टॉप किया। उसके बाद मात्र 800 रूपए लेकर वे दिल्ली आ गए और दिल्ली विश्वविद्यालय से बॉटनी में एमएससी की। उसके बाद उन्होंने इसी विषय में रिसर्च करने की सोची लेकिन तभी अंटार्टिका जाने वाले छात्र के रूप में उनका चयन हुआ और वे एक वैज्ञानिक दल के साथ अंटार्टिका चले गए। यह यात्रा उनके जीवन में मील का पत्थर साबित हुई। पहली बार वे किताबी और लैब की दुनिया से दूर कुछ नया और अविस्मरणीय अनुभव कर रहे थे। इसके बाद तो साहू ने विदेश की कई यात्राएं कीं और बहुत कुछ नया सीखा व समझा।

सन 1989 में दिल्ली विश्वविद्यालय से साहू ने बॉटनी में पीएचडी पूरी की और यूएस चले गए लेकिन उनके मन में भारत के लिए कुछ करने की इच्छा थी। वे चाहते थे कि देश की प्रगति में वे अपना योगदान दें। यही वजह थी कि वे सब कुछ छोड़कर दिल्ली आ गए। बचपन से ही उन्होंने चिल्का लेक को काफी करीब से देखा था और एक शोधकर्ता के रूप में साहू की समुद्रीय शैवाल में खास रुचि थी। लेकिन भारत में इस पौधे के उपयोग के बारे में बहुत कम लोगों को पता था। जबकि दूसरे देशों में शैवाल की खेती हो रही थी और लोग अच्छा खासा कमा रहे थे तब साहू ने तय किया कि वे लोगों को पहले शौवाल के बारे में जानकारी देंगे और बताएंगे कि इसका प्रयोग टूथपेस्ट, टमेटो कैचप, चॉकलेट, दवाइयों आदि बनाने में हो सकता है। लाल शैवाल व्यापारिक दृष्टिकोण से बहुत महत्वपूर्ण था। इसी कड़ी में उन्होंने फार्मिंग द ओशियन नाम की किताब भी लिखी।

भारत में मछली पालन पर हमेशा से ज्यादा ध्यान दिया जाता रहा है लेकिन शैवाल की खेती बहुत ही कम हो रही थी। साहू चाहते थे कि ज्यादा से ज्यादा शैवाल की खेती की जाए ताकि किसानों की अच्छी आय हो। अगर यह व्यवसाय अच्छी तरक्की करता है तो इसे एक उद्योग की शक्ल भी दी जा सके।

इस योजना के क्रियान्वयन के लिए साहू कई मंत्रियों से भी मिले लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। अंत में डीएसटी के साइंस एंड सोसाइटी विभाग ने इस प्रोजेक्ट को 3 साल के लिए 20 लाख रुपए फंड दे दिया। बस फिर क्या था साहू ने भारत के विभिन्न तटीय इलाकों का दौरा शुरू किया और ग्रामीणों को प्रशिक्षण देने के लिए चिल्का मॉडल बनाया। फिर लोगों को शैवाल की खासियतों के बारे में बताया। साथ ही शैवाल की खेती से भविष्य में होने वाले फायदे के बारे में भी बताना शुरू किया। उन्होंने किसानों को बताया कि किस प्रकार बहुत कम दामों में मुनाफा कमाया जा सकता है। शैवाल की खेती की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके लिए जुताई, सिंचाई और उर्वरकों का प्रयोग नहीं करना होता, बस बीज डालो और उसे छोड़ दो। फिर 45 दिन बाद उसे काट लो। इसमें निवेश भी काफी कम करना होता है और मुनाफा काफी ज्यादा मिलता है।

इसके बाद साहू ने 4 भिन्न प्रकार के शैवालों की पहचान की जिनकी राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय बाजारों में काफी मांग थी। फिर वहां उगने वाली वनस्पतियों की पहचान करने की गई और जलवायु के हिसाब से वनस्पतियां उगाई गईं। पहला प्रयोग 2009 में चिल्का लेक की सातपाड़ा साइट पर किया गया। साहू खुद ही वहां प्रतिरक्षक के तौर पर वहां मौजूद थे। परिणाम काफी अच्छे रहे। उसके बाद तो दूसरे किसानों ने शैवाल की खेती करनी शुरु कर दी। शैवाल की खेती काफी आसान होती है। अब किसानों को बारहमासी आय का एक बहुत ही अच्छा जरिया मिल गया था। किसान एक तरफ रोपाई करते, दूसरी तरफ 45 दिन पुरानी फसल की कटाई भी करते। इससे वे अच्छा खासा पैसा कमाने लगे।

चिल्का मात्र एक झील नहीं है यह उड़ीसा के गौरवशाली इतिहास का प्रतीक है। हजारों लोगों की जीवनरेखा है। उम्मीद है, चिल्का प्रोजेक्ट उड़ीसा ही नहीं भारत के बाकी तटीय राज्यों और विदेशों में भी अपना असर दिखाएगा। अब साहू विभिन्न मंचों में जाकर इस प्रोजेक्ट के बारे में बताते हैं ताकि शैवाल की खेती को प्रोत्साहन मिले और तटीय क्षेत्रों में रहने वाले गरीब किसानों के लिए पैसा कमाने के विकल्प खुले। साहू का मकसद पैसा कमाना नहीं है। वे बहुत ही सादगी भरी जिंदगी जीना पसंद करते हैं। गरीब लोगों से इस तकनीक को साझा करने का पैसा नहीं लेते। हरित और श्वेत क्रांति के बाद साहू का सपना है नीली क्रांति का। समुद्र में अपार संभावनाएं हैं। उड़ीसा एक गरीब राज्य है यहां कुपोषण की काफी समस्या है। ऐसी जगह में शैवाल की खेली काफी फायदेमंद है क्योंकि मात्र 100 ग्राम शैवाल में एक किलो सब्जी जितने पोशक तत्व पाय जाते हैं।

दीनबंधू साहू एक मिसाल हैं। वे विदेश में रहकर काफी पैसा कमा सकते थे लेकिन उन्होंने अपनी मातृभूमि की सेवा करना अपना पहला कर्तव्य माना और देश के गरीब किसानों के लिए समुद्री खेती का एक नया विकल्प खोला।

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