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झुग्गियों में शिक्षा का 'Shwas' भरकर, बच्चों को नई ज़िंदगी देने में जुटीं ‘किंजल’

‘Shwas’ की ट्रस्टी हैं किंजलस्लम में रहने वाले बच्चों को शिक्षित करने का बीड़ा उठायापढ़ाई का खर्चा उठाता है ‘Shwas’

Harish Bisht
24th Aug 2015
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हम से ज्यादातर लोगों के लिए 25 साल की उम्र वो होती है जब हम बड़े बड़े सपने देखते हैं उस वक्त हमारा करियर उड़ान भरने की तैयारी कर रहा होता है तो दूसरी ओर हमारा जीवन देखने का नजरिया बदल जाता है। लेकिन किंजल शाह के लिए ऐसा कुछ नहीं था। किंजल ने अपनी शुरूआती जिंदगी में ही फैसला ले लिया था कि वो दूसरों के सपनों को पूरा करेंगी। इसलिए वो ‘Shwas’ की ट्रस्टी बन गईं। ‘Shwas’ जीवन को सांस देने का काम करता है। ये शिक्षा से वंचित बच्चों को साक्षर बनाने का काम करता है। किंजल ने अहमदाबाद से बायोमेडिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है।

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किंजल ने स्लम में रहने वाले बच्चों को तब से पढ़ाना शुरू कर दिया था जब वो अपने कॉलेज के दूसरे साल में थी। वो हर हफ्ते के अंत में अपने दोस्तों के साथ इन बस्तियों में जाती और स्कूल ना जाने वाले बच्चों को पढ़ाने का काम करती। किंजल का कहना है कि वो शिक्षा के क्षेत्र में कुछ करना चाहती थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होने अपने दोस्तों के साथ स्लम में रहने वाले बच्चों को पढ़ाने का काम जारी रखा। उन्होने स्लम में रहने वाले बच्चों को पास के ही नगर पालिका स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। वो इन बच्चों को पढ़ाने का काम स्कूल खत्म होने के बाद करती थी। इस तरह उन्होने 40-45 बच्चों को इकट्ठा कर पढ़ाई का काम जारी रखा।

इस दौरान बच्चों को पढ़ाई के साथ साथ बुनियादी स्वच्छता और पोषण के बारे में जानकारी दी जाती। किंजल का कहना है कि जब उन्होने इन बच्चों के साथ काम करना शुरू किया तो उनको महसूस हुआ कि ये बच्चे भी दूसरे आम बच्चों की तरह ही हैं जिनको बस तलाश है सही मौके की। किंजल का कहना है कि शुरूआत में इन बच्चों के माता-पिता उनको शक की निगाह से देखते थे तब वो सोचती थी कि कहीं उनका काम और उनकी कोशिश बर्बाद ना चली जाए लेकिन साल भर में ही उनको अच्छे परिणाम मिलने लगे और धीरे धीरे किंजल के सारे संदेह मिट गये। पढ़ाई का स्तर सुधारने के लिए वो अगले तीन साल तक बच्चों को नियमित तौर पर पढ़ाने लगीं। अब उनके सामने बड़ी दिक्कत थी कि स्लम के इन बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने की। इस परेशानी को दूर करने के लिए उन्होने अपने दोस्तों और परिवार वालों से पैसे इकट्ठा करने शुरू किये। जिसके बाद उन्होने शुरूआत में चार बच्चों को मुख्यधारा के स्कूल में दाखिला दिलाया। तब उन्होने देखा कि उन बच्चों को पढ़ाई में काफी मजा आ रहा है और वो अपना काम मन लगाकर कर रहे हैं।

किंजल ने देखा कि नगर पालिका स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे 8वीं क्लास के बाद सुविधाओं के अभाव में आगे की पढ़ाई जारी नहीं रख पाते थे। खास बात ये थी कि लड़कियों के माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ने के लिए दूर दराज नहीं भेजना चाहते थे। तब किंजल ने ऐसे माता-पिता से मिली और उनको इस बात के लिए तैयार किया कि वो अपने बच्चों के भविष्य के सवांरने के लिए उनकी पढ़ाई को जारी रखें।

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इस प्रकार ‘Shwas’ जीवन को सांस, की शुरूआत हुई। जो गरीब बच्चों को मुख्य धारा से जुड़े स्कूलों में ऐसे गरीब बच्चों का दाखिला कराता है जो आगे पढ़ना चाहते हैं। ये संगठन साल 2008 से ऐसे बच्चों के लिए स्टेशनरी, वर्दी और किताबों का खर्चा उठाता है। जबकि सोमवार से शुक्रवार तक इसके स्वयंसेवक और ‘Shwas’ की ट्रस्टी किंजल ऐसे बच्चों को पढ़ाने का काम करती हैं। जबकि शनिवार और रविवार को आस-पड़ौस के स्लम में रहने वाले बच्चों को पढ़ाया जाता है।

बच्चों को पढ़ाने के अलावा ‘Shwas’ हर महीने ऐसे बच्चों को बाहर घुमाने भी ले जाता है जैसे मनोरंजन पार्क, कारखानों में और ऐसी दूसरी जगहों में जहां जाकर बच्चे बाहरी दुनिया में कदम रखने से पहले अपने को तैयार कर सकें। किंजल का कहना है कि बच्चे जब बाहरी दुनिया के संपर्क में आते हैं तो वो कई नई चीजें सीखते हैं इससे उनकी जानकारी भी बढ़ती है। किंजल का मानना है कि बच्चे संभावनाओं से भरे होते हैं बस उनको जरूरत होती है सही दिशा दिखाने और मौके की।

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