भारत से पहले कनाडा ने लगाया सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन

कनाडा ने प्लास्टिक उत्पादकों को छह महीने का और निर्यातकों को डेढ़ साल का बफ़र टाइम देते हुए सिंगल यूज प्लास्टिक पर बैन लगा दिया है.
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हम भारत में 1 जुलाई से होने जा रहे सिंगल यूज प्लास्टिक बैन का उत्सुकता और उम्मीद से इंतज़ार कर रहे हैं. ऐसा लग रहा है कि इस बार हम ऐसा बैन लगाने और उसे सफल बनाने के लिए अधिक तैयार हैं. इस बीच कनाडा ने व्यापक तैयारी के साथ यह कदम उठा लिया है. सोमवार को जारी किये गए एक आदेश में कनाडा सरकार ने सिंगल यूज ‘हानिकारक’ प्लास्टिक के आयात और बिक्री पर बैन लगा दिया.  चेक-आउट बैग्स, खाना कैरी के लिए यूज किये जाने वाले कंटेनर्स, प्लास्टिक स्ट्रॉ, सिक्स-पैक रिंग्स इत्यादि इस बैन के दायरे में शामिल हैं. 

लेकिन इन वस्तुओं पर यह बैन तुरंत लागू नहीं होगा बल्कि इसके लिए डेढ़ साल बाद दिसंबर 2023 की समय सीमा निर्धारित की गयी है. उसी तरह प्लास्टिक के एक्सपोर्ट पर बैन के लिए भी  2025 की समय सीमा रखी गयी है. यह दर्शाता है कि कनाडा सरकार ने यह फ़ैसला बहुत तैयारी के साथ लिया है. प्लास्टिक पोल्यूशन पर दुनिया के सब देशों में सहमति हैं और सब इस पर नियंत्रण पाने के लिए प्रतिबद्धता जाहिर भी कर चुके हैं लेकिन सबसे बड़ी चुनौतियाँ  हमेशा यही रहती है कि अर्थव्यवस्था, प्लास्टिक इंडस्ट्री, और उससे जुड़े रोज़गार पर होने नकारात्मक असर को कम कैसे किया जाये और प्लास्टिक के सस्ते सस्टेनेबल विकल्प बाज़ार में कैसे उपलब्ध होन. कनाडा सरकार ने इस दिशा में ठोस काम करते हुए प्लास्टिक उत्पादकों को नए नियमों से एडजस्ट करने और प्लास्टिक आइटमस के अल्टरनेटिव तलाशने के लिए दिसम्बर तक का वक्त दिया हैं.  

कनाडा इस निर्णय तक पहुँच इसके पीछे विश्व समुदाय में इस मुद्दे पर बढ़ती आम सहमति और दबाव के साथ यह भी कारण है कि कनाडा में सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल ख़तरनाक हदों तक जा चुका है.  कनाडा में रोज़ डेढ़ करोड़ से ज़्यादा  प्लास्टिक स्ट्रॉ इस्तेमाल की जाती हैं और क़रीब 15 अरब प्लास्टिक चेक आउट बैग हर साल पर्यावरण में जाते हैं.  फेडरल डाटा के मुताबिक अकेले  2019 में कनाडा में  कैरी बैग, कटलरी, प्लास्टिक स्ट्रा,  सिक्स-पैक रिंग्स और टेक-आउट कंटेनर्स जैसी प्लास्टिक की वस्तुओं की कुल बिक्री 28 अरब के आसपास थी. हालाँकि यही स्थिति दुनिया के सारे देशों की है. पिछले 70 साल में विश्व के सारे देशों ने लभग 8.3 अरब टन प्लास्टिक उत्पन्न किया है जिसमे से 60 प्रतिशत री-सायकल नहीं किया गया है.  मतलब इतना सारा प्लास्टिक लैंड फिल, समुद्र, नदियों और तालाबों में पड़ा हुआ है. 

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2060 तक विश्व की प्लास्टिक की खपत आज से तीन गुणा बढ़ जायेगी. वहीँ फॉसिल फ्युएल बेस्ड प्लास्टिक प्रोडक्शन 2060 तक इतनी बढ़ जाएगी कि इससे उत्पन्न हुआ प्लास्टिक वेस्ट हर साला 100 करोड़ टन से ज्यादा होगा. 

यह आँकड़े और इससे झांकने वाली सचाई  डराने वाली है. दुनिया में पहली बार यह संकट इतने बड़े पैमाने पर खड़ा हुआ है कि क्या हम आने वाले मनुष्यों के लिए रहने लायक़ पृथ्वी छोड़ पाएँगे? दुनिया चलाने वालों को, सरकारों को, नीति निर्धारकों को इस संकट और इसकी गहराई का कुछ ठोस अहसास अब होने लगा है.  कनाडा सरकार की इस पहल को उसी के एक प्रमाण की तरह देखा जाना चाहिए. 

क्या कनाडा कामयाब हो पाएगा? क्या जुलाई से भारत कामयाब हो पाएगा? क्या बैन इस संकट का सामना करने में कारगर होंगे? सस्टेनेबिलिटी स्टोरी में हम इन प्रतिबंधो के असर पर नज़र बनाये रखेंगे.