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कलाकृतियों इत्यादि को कला के कद्रदानों तक किराये पर पहुंचाने का प्रयास करतीं श्रावणी वट्टी

22nd Oct 2015
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‘‘कला के बिना वास्तविकता की असभ्यता दुनिया को असहाय बना देगी।’’ यह शब्द आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व प्रख्यात नाटककार जाॅर्ज बर्नार्ड शाॅ ने कहे थे। यह दुनिया आज पहले से कहीं अधिक अव्यवस्थित हो गई है और ऐसे में एक भारतीय महिला इस लगातार बढ़ती हुई अव्यवस्था के बीच कुछ शांति लाने के प्रयास कर रही है।

काॅरपोरेट्स के लिये आर्ट रेंटल कार्यक्रम संचालित करने वाली संस्था आर्टएनथ्यूज़ (ArtEnthuse) की संस्थापक श्रावणी वट्टी कहती हैं, ‘‘भारत के काॅर्पोरेट जगत में किसी के भी पास कला के लिये समय नहीं है लेकिन ऐसे कई हैं जो इसकी सराहना करते हैं। ऐसे लोग जो कला की तलाश में हैं, मैं कला को उनतक पहुंचाना चाहती हूँ।’’

अपने इस कार्यक्रम के तहत श्रावणी इस बात का अध्ययन भी करती हैं कि लोगों को अपने कार्यालयों के आसपास कैसी कला चाहिये। वे पेंटिंग, मूर्तियां या फिर प्रिंट भी हो सकते हैं और मौजूद स्थान और आवश्यकताओं के अनुसार उनके कार्यालयों में कला को स्थापित करती हैं। कला की प्रत्येक स्थापना में इन्हें करीब 3 से 4 महीने का समय लगता है।

एक इंटर्नशिप के दौरान बिट्स पिलानी की यह इंजीनियर कला के प्रेम मेें घिर गई

श्रावणी को जानने वाले किसी भी व्यक्ति को बड़ी आसानी से यह गलतफहमी हो सकती है कि वे या तो कलाकारों के परिवार से आती हैं या फिर वे स्वयं एक कलाकार हैं। हालांकि यह वास्तविकता से दूर भी नहीं है। वे बिरला इंस्टीट्यूट फाॅर टेक्नोलाॅजी एंड साइंस (बिट्स) पिलानी की इंजीनियर हैं। इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष के दौरान वे प्रशिक्षण के लिये एक कला फर्म का भाग बनीं जहां उन्हें कलाकारों को काम का संलेख (सवह) करने के अलावा उसका विश्लेषण भी करना था।

श्रावणी बताती हैं, ‘‘वह इंटर्नशिप मेरे लिये आंखें खोलने वाली साबित हुई। मैं करीब 200 कलाकारों के काम का विश्लेषण कर रही थी और प्रत्येक कलाकृति विविधताओं से पूर्ण होने के अलावा काफी दिलचस्प भी थी। मैं कला के बारे में और अधिक जानना चाहती थी लेकिन मुझे अधिक जानकारी पाने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। उसी समय मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मैं इसको एक व्यापार का रूप दे सकती हूँ।’’ यह अबसे पांच वर्ष पूर्व की बात है और आज श्रावणी पुणे में कला से संबंधित दो स्टार्टअप की संस्थापक हैं।

आर्डिज़न (Ardizen) के साथ कला की दुनिया में पहला कदम

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वर्ष 2012 में स्नातक करने के तुरंत बाद श्रावणी ने मध्यम स्तर के कलाकारों द्वारा तैयार की गई कलाकृतियों के लिये एक ई-काॅमर्स पोर्टल आर्डिज़न की स्थापना की।

वे कहती हैं, ‘‘कला के प्रत्येक रूप के लिये व्यक्तित्व के विभिन्न सेट हैं। कुछ लोगों को कोई कलाकृति निराकार और रूखी लग सकती है जबकि दूसरों को सिर्फ गैर-पारंपरिक कला पसंद आती है। मैं कला के प्रत्येक रूप को उसके बिल्कुल सही कद्रदान तक पहुंचाने में मदद करना चाहती थी।’’

हालांकि इनकी वेबसाइट पर 600 से भी अधिक भारतीय कलाकारों ने अपने काम को आॅनलाइन बिक्री के लिये डाल रखा है इसके बावजूद श्रावणी को उपभोक्ताओं को सौदों के लिये तैयार करने में बहुत अधिक आॅफलाइन प्रयास करने पड़ते हैं। बीते 3 वर्षों में आर्डिज़न ने 100 से भी अधिक कलाकृतियों को बेचा है जिनमें से प्रत्येक की कीमत लगभग 1.5 लाख रुपये रही है।

आर्ट आॅन रेंट - उपभोक्ता तो खुश हैं लेकिन कलाकार इतने प्रसन्न नहीं हैं

जैसे-जैसे श्रावणी ने अधिक से अधिक लोगों से कला की उनकी आवश्यकता के बारे में बात की उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि लोग कलाकृतियों को खरीदने में अधिक पैसा खर्च नहीं करना चाहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह अधिक स्थायी हैं।

श्रावणी कहती हैं, ‘‘काॅर्पोरेट जगत के अधिकतर लोग आगे आकर कलाकृति को खरीदने में उत्सुक नहीं रहते क्योंकि वे उसमें लाखों रुपये निवेश करने से पहले उस काम को महसूस करना चाहते हैं। ऐसे में मेरे मन में ख्याल आया कि क्यों न कला को किराये पर दिया जाए?’’

उनका सिद्धांत बिल्कुल ही सीधा था कि आर्ट रेंटल कला के विभिन्न स्वरूपों के बारे में जानने का सबसे बेहतरीन विकल्प है। चुनो, ट्राई करो, पसंद करो और स्थापित करो। उन्होंने इसी वर्ष जनवरी में आर्टएनथ्यूज़ की स्थापना करने का मन बनाया लेकिन यह काम उनकी उम्मीद के मुकाबले अधिक कठिन साबित हुआ। कलाकार अपने काम को किराये पर देने की अवधारणा के बारे में जानकर प्रसन्न नहीं हुए।

प्रारंभिक दिनों की मुश्किलों को याद करते हुए श्रावणी कहती हैं, ‘‘जब हमनें शुरू किया था तब कलाकारों की प्रारंभिक भावना यह थी कि वे स्वयं के काम को बहुत सस्ते में दूसरों को सौंप रहे हैं। वे लोग बोर्ड पर आने को तैयार ही नहीं थे। लेकिन जब देश के शीर्ष कलाकारों में से एक गणेश पंडा हमारे मंच के साथ जुड़े तो हमारे लिये अन्य कलाकारों को अपने साथ जुड़ने के लिये प्रोत्साहित करना काफी आसान हो गया।’’

उन्होंने कलाकारों को प्रदर्शनियों के मुकाबले किराये पर देने की लागत के विश्लेषण के बारे में उन्हें विस्तार से समझाने के अलावा यह भी समझाया कि कैसे वे अपने काम को किराये पर देकर प्रदर्शनियों के मुकाबले अपने काम को अधिक व्यापक लोगों तक पहुंचा सकते हैं।

भारतीय कलाकार अपने काम को लेकर अधिक सतर्क रहते हैं

श्रावणी कहती हैं, ‘‘सभी भारतीय कलाकर एक मायने में बिल्कुल एक जैसे हैं और वे उदार हैं। वे दुनियाभर के अन्य कलाकारों की तरह मुख्यतः अपने अनुभवों को चित्रित करते हैं। लेकिन इनमें से अधिकतर अपना काम दुनिया के सामने प्रदर्शित करने से हिचकते हैं। यही वह व्यवहार है जिसे बदलने का हम प्रयास कर रहे हैं।’’

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आज आर्टएनथ्यूज़ देशभर में 200 से अधिक कार्यलयों में कला को प्रतिस्थापित कर चुकी है और ये प्रतिमाह 2 से 3 लाख रुपये का राजस्व प्राप्त कर रही हैं। प्रत्येक स्थापना पर 2800 रुपये प्रतिमाह प्रतिनग खर्च होते हैं।

क्या आर्टएनथ्यूज़ के उपभोक्ता स्थापना की अवधि समाप्त हो जाने के बाद कलाकृति को खरीदते भी हैं? श्रावणी बताती हैं, ‘‘जी हाँ, बिल्कुल! कई बार वे लोग किसी-किसी कलाकृति के इतने अधिक आदी हो जाते हैं कि किराये का अनुबंध समाप्त होने के बाद वे उसे खरीद ही लेते हैं।’’

अवसर और कला के उपभोक्ता

सबसे ताजा उपलब्ध आॅनलाइन आंकड़ों के अनुसार भारतीय कला का बाजार 100 से 200 मिलियन अमरीकी डाॅलर के बीच कहीं रहने का अनुमान है जिसमें से 99 प्रतिशत चित्रों का है।

श्रावणी के अनुसार मुख्यतः कला को खरीदने वाले उपभोक्ता तीन श्रेणियों के अंतर्गत आते हैं। पहले जिनकी दिलचस्पी वास्तव में कला में होती है, दूसरे वे जो इन्हें सिर्फ इनके सौंदर्यशास्त्र के चलते पसंद करते हैं और तीसरे जो इन्हें सिर्फ खाली स्थान भरने के लिये फिलर की तरह देखते हैं।

भविष्य की योजनाएं

श्रवणी कला के कद्रदानों की इन तीनों श्रेणियों को अपने मंच के माध्यम से जानकारी उपलब्ध करवाकर सशक्त बनाना चाहती हैं।

वे कहती हैं, ‘‘हम एक ऐसी दुनिया का निर्माण करना चाहते हैं जो अपने आसपास मौजूद कला को लेकर अधिक जागरुक हो। इसके अलावा हम इसे कलाकारों के लिये एक स्थायी कैरियर विकल्प का रूप भी देना चाहते हैं। पूर्णकालिक हो या नहीं जब किसी भी कलाकार के सामने अपने काम को प्रदर्शित करने का मौका आए तो उसे कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिये।’’

वेबसाइट

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