संस्करणों
प्रेरणा

पूर्वी घाट की सुरक्षा के लिए कोशिशें और तेज, प्राधिकरण स्थापित करने के लिए आंदोलन

देश के पूर्वी पर्वतीय श्रेणियों के संरक्षण पर राष्ट्रीय सम्मेलन भुवनेश्वर में

F M Saleem
13th Apr 2016
  • Share Icon
  • Facebook Icon
  • Twitter Icon
  • LinkedIn Icon
  • Reddit Icon
  • WhatsApp Icon
Share on

विकास के नाम पर जहाँ देश के महानगरों एवं उप नगरीय क्षेत्रों में सिमेंट एवं कंकरीट के मैदान खड़े करने की गलाकाट प्रतियोगिता जारी है और जंगलों को काटने और वादियों एवं पहाड़ों के पेट को प्राकृतिक संसाधनों से खाली करने का क्रम जारी है, ऐसे में कुछ लोग हैं, जिन्हें देश की प्राकृतिक संपदा और विरासत को अगली पीढियों तक पहुँचाने की चिंता सताए जा रही है। हैदराबाद की संस्था कॉउंसिल फार ग्रीन रेवल्यूशन (सीजीआर) इसी चिंता के साथ पिछले 6 वर्षों से देश के पूर्वी घाट की पर्वतीय श्रेणियों के संरक्षण के लिए ग्रीन्स एलाइन्स फार कंज़र्वेशन ऑफ ईस्ट्रन घाट्स (जीआरएसीई) के बैनर तले संघर्ष कर रही है।

image


जीआरएससीई ने देश के पूर्वी घाटों की पर्वत श्रेणियों के संरक्षण के लिए एक राष्ट्रीय सम्मेलन 16 एवं 17 अप्रैल को ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के उत्कल विश्वविद्यालय में आयोजित किया जा रहा है।

पूर्वी घाट पर लंबी पर्वत श्रेणियों को पर्यावरणविद न केवल पर्यावरण, बल्कि जैव भौगोलिक, सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टिकोण से भी काफी महत्वपूर्ण मानते हैं।

image


तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से प्रकाशित होने वाले तेलुगु समाचार पत्र साक्षी के कार्यकारी संपादक व ग्रीन एलाइन्स फॉर कंजर्वेशन ईस्ट्रन घाट्स के चेयरमैन दिलीप रेड्डी बीते दो दशकों से एक पत्रकार के रूप में पर्यावरण संरक्षण की लड़ाई लड़ रहे हैं। सीजीआर की अध्यक्ष के. लीला लक्ष्मा रेड्डी भी सीजेआर की विभिन्न गतिविधियों के साथ सक्रिय हैं। सम्मेलन के मुख्य सलाहकार प्रो. के. पुरुषोत्तम रेड्डी तालाबों, नदियों एवं वनों को बचाने के लिए तीन दशकों से अधिक समय से आंदोलन कर रहे हैं। इन सभी का मानना है कि पूर्वी घाटों की सुरक्षा के मुद्दे पर त्वरित ध्यान देने की ज़रूरत है। सम्वेत रुप से सबका मानना है, 

वनों की कटाई, अंधाधुंध उत्खनन, बड़े बांधों का निर्माण, भूमि का बड़े पैमाने पर दुरुपयोग, वनों में आग, ऊर्जा उत्पादन केंद्र सहित कई कारण हैं, जिनसे पूर्वी घाटों पर पर्यावरण का खतरा मंडरा रहा है। बीते सात दशकों में इन पर्वत श्रेणियों को इतना नुकसान पहुँचाया गया है कि उसकी भरपाई मुमकिन नहीं है।
image


दिलीप रेड्डी ने बताया कि पूर्वी घाटों की सुरक्षा के लिए पिछले 6 वर्षों से उनकी संस्था सीजीआर आंदोल कर रही है। हर वर्ष एक विश्वविद्यालय में सम्मेलन का आयोजन किया जाता है, ताकि आने वाली पीढ़ियों में इस मुद्दे के प्रति जागरूकता लायी जा सके। इस बार यह सम्मेलन भुवनेश्वर के उत्कल विश्वविद्यालय में आयोजित किया जा रहा है, जबकि इससे पूर्व पालमुरू विश्वविद्यालय, आंध्र विश्विविद्यालय, नागार्जुना विश्वविद्यालय, राययलसीमा विश्वविद्यालय तथा एआरएम एवं एस वी विश्व विद्यालय में आयोजित किये जा चुके हैं।

image


दिलीप रेड्डी ने कहा कि पूर्वी घाट के लिए पारिस्थितिकी, जैव विविधिता एवं संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों का धारणीय प्रबंधन, स्थानीय समुदाय, नागरिक समाज की भूमिका, कनून, नीतियाँ, तथा एक प्रशासनिक फ्रेमवर्क की तैयारी आदि महत्वपूर्ण विषय पर भुवनेश्वर में होने वाले सम्मेलन में चर्चा का विषय होंगे।

दिलीप रेड्डी का मानना है,

पश्चिमी घाटों की तरह पूर्वी घाटों के संरक्षण के लिए भी सशक्त नीति बननी चाहिए। इसके लिए एक स्वायत्त पूर्वी घाट सुरक्षा प्राधिकरण का गठन होना चाहिए और यूएनओ की ओर से पूर्वी घाट की पर्वतीय श्रेणियों को विश्व प्राकृतिक धरोहर घोषित किया जाना चाहिए।
image


ओडिशा के राज्यपाल सम्मेलन का उद्घाटन करेंगे। सम्मेलन में 350 से 400 प्रतिनिधि भाग लेंगे और छह सत्रों में आयोजित होने वाले इस सम्मेलन के बाद एक बैठक दिल्ली में आयोजित की जाएगी और सम्मेलन अपनी मांगों का एक प्रस्ताव पर्यावरण मंत्री एवं प्रधान मंत्री को सौंपेगा।

सीजीआर की उपलब्धियों के बारे में दिलीप रेड्डी बताते हैं कि अब तक तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 28 लाख पौधे लगाये गये हैं, जिनके रखरखाव पर भी ध्यान दिया जाता है और सफलता 70 प्रतिशत से अधिक है। 

  • Share Icon
  • Facebook Icon
  • Twitter Icon
  • LinkedIn Icon
  • Reddit Icon
  • WhatsApp Icon
Share on
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें