संस्करणों

गरीब बच्चों को पढ़ाई के साथ जीवन मूल्यों के बारे में सीख देने की कोशिश

- मयंक सोलंकी जिन्होंने मात्र 24 वर्ष की आयु में ही दो प्रोजक्ट युवा 'इग्नाइटिड माइंड्स ' और 'वेल-इड़' पर काम करना शुरू किया।- अपने पिता को अपना आदर्श मानते हैं मयंक- अपने प्रयासों से गरीब बच्चों की हर संभव मदद कर रहे हैं मयंक

Ashutosh khantwal
9th Jul 2015
  • Share Icon
  • Facebook Icon
  • Twitter Icon
  • LinkedIn Icon
  • Reddit Icon
  • WhatsApp Icon
Share on

जिस प्रकार एक दिया अंधकार को चीर देता है, ध्रुव तारा भटके हुए नाविकों को सही राह दिखाता है उसी प्रकार व्यक्ति के जीवन में एक रोल मॉडल का बहुत महत्व होता है। एक रोल मॉडल व्यक्ति के मन मस्तिष्क पर छाप छोड़ता है और इंसान उसी की तरह या उसके बताए मार्ग पर चलने का प्रयत्न करता है। ये रोल मॉड़ल कोई भी हो सकता है लेकिन जब यही रोल मॉड़ल किसी व्यक्ति के पिता हों तो इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता क्योंकि व्यक्ति ने अपने पिता को सबसे करीब से देखा व समझा होता है।

image


मयंक सोलंकी जिन्होंने मात्र 24 वर्ष की आयु में ही दो प्रोजक्ट युवा इग्नाइटिड माइंड्स और वेल-इड़ पर काम करना शुरू किया। आज अपनी सफलता का सारा श्रेय अपने पिता को देते हैं। मयंक के पिता डॉक्टर नरपत सोलंकी ने अपना पूरा जीवन गरीबों और बेसहाराओं के नाम कर दिया नरपत ने 13 लाख से अधिक लोगों का मुफ्त में चेकअप किया व 1 लाख 42 हजार फ्री में आई सर्जरी की। ये सब गरीब लोग थे जो फीस देने में सक्षम नहीं थे डॉ नरपत के पास जो भी आया उन्होंने उसका इलाज किया । और यही बात उन्होंने अपने पुत्र को समझाई कि लोगों की मदद करो और पैसे से ऊपर उठकर काम करो। गरीबों की मदद करना ही उनका मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। मयंक ने इस बात को गांठ बांध लिया और फिर अपने पिता के साथ लगभग 1 साल तक काम किया लेकिन मयंक कुछ और करना चाहते थे और फिर उन्होंने शुरूआत की युवा इग्नाइटिड माइंड्स की इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं को शक्ति प्रदान करना और आत्मनिर्भर बनाना था।

युवा इग्नाइटिड माइंड्स को बेहतरीन काम के लिए कई संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत भी किया गया। लकिन मयंक को अभी भी कुछ कमी लग रही थी उन्होंने फिर रिसर्च करनी शुरू की और जल्द ही मयंक ने दूसरे प्रोजेक्ट की शुरूआत की जिसका नाम था वेल-एड इनीशियेटिव।

रिसर्च के दौरान मयंक कई अभिभावकों से मिले, बच्चों से मिले और उन्होंने पाया कि माता-पिता अपने बच्चों को ज्यादा समय नहीं दे पा रहे हैं जिस कारण बच्चे जीवन मूल्यों की शिक्षा से महरूम हो रहे हैं इसके अालावा बच्चे गलत संगत में पड़ कर गलत चीजों को अपना रहे हैं। वेल-एड का मकसद बच्चों को जरूरी शिक्षा देना था जो अमूमन स्कूलों में नहीं मिलती, स्कूलों में किताबी ज्ञान तो मिलता है लेकिन नैतिकता का पाठ नहीं पढ़ाया जाता, जीवन मूल्यों के बारे में नही समझाया जाता वहां की शिक्षा किताबी हो कर रह जाती है व्यवहारिक नहीं हो पाती। ऐसे में जरूरी था कि बच्चों को किताबी ज्ञान के अलावा नैतिक मूल्यों की शिक्षा भी मिले इससे समाज का भी भला होगा और देश का भी।

image


मयंक ने ऐसे कोर्स का निर्माण किया जो काफी मजेदार था और इस कोर्स को उन्होंने विभिन्न एक्सपर्टस औऱ साइकेट्रिस्ट से भी चेक करवाया। बच्चों ने भी इसमे काफी आनन्द लिया । एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने एक आर्मी ऑफीसर को, एक पुलिस अधिकारी को और एक वैज्ञानिक को बुलाया। आर्मी ऑफीसर ने बच्चों को जंग के दौरान कैसे संयम से काम किया जाता है उसके बारे में बताया पुलिस अधिकारी ने बच्चों को सिस्टम में फैले करप्शन और उससे कैसे लड़ा जाए उसके बारे में बताया और वैज्ञानिक ने बताया कि कैसे छोटी- छोटी चीजों से डिस्कवरी की जा सकती है। ये सभी बाते अमूमन स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं होती लेकिन ये शिक्षा बच्चों के लिए बहुत ज्यादा उपयोगी थी और मयंक ने ऐसी ही शिक्षा के बढ़ावे पर जोर दे रहे हैं। जो कि मात्र किताबी न होकर व्यवहारिक व उपयोगी हो।

  • Share Icon
  • Facebook Icon
  • Twitter Icon
  • LinkedIn Icon
  • Reddit Icon
  • WhatsApp Icon
Share on
Report an issue
Authors

Related Tags