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कविता का सिर्फ एक काम है जूझती मानवता के बारे में बात करना: विष्णु नागर

14th Jun 2018
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बचपन से आज तक, कभी घर की मुश्किलों तो कभी वक्त मार से लड़ते रहे देश के प्रतिष्ठित कवि विष्णु नागर का आज जन्मदिन है। उनका मानना है कि कला और साहित्य का उद्देश्य देश-समाज का भविष्य आज से ज्यादा मानवीय, ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने का होना चाहिए, जबकि हो इसके उल्टा रहा है। जहां तक अच्छी कविता का प्रश्न है, उसका काम सिर्फ इतना है कि जिन संकटों से पूरी मानवता जूझ रही हो, उसके बारे में बात करना।

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रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गजों के बीच अपने लेखन और काम से जब वह पहचाने जाने लगे, उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। संघर्ष, संवेदनशीलता, सरोकार और कठिन मेहनत की पूंजी के जरिए उन्होंने धीरे-धीरे पहले पत्रकारिता, फिर साहित्य में अपना प्रतिष्ठित मोकाम हासिल कर लिया। 

देश के प्रतिष्ठित कवि विष्णु नागर की एक कविता-संकलन है - 'हँसने की तरह रोना', जिसमें एक कविता है - 'मैं और कुछ नहीं कर सकता था'। यह रचना जैसे उनके सृजन-समस्त का निचोड़ है, और उनके व्यक्तित्व का भी। विष्णु नागर का आज (14 जून) जन्मदिन है। दिल्ली में रह रहे विष्णु नागर के बच्चे बड़े हो गए हैं, नौकरी करते हैं। घर पर सिर्फ कवि-दंपति रहते हैं। विष्णु नागर का बचपन बेहद मुश्किलों में बीता है। उनका जन्म 14 जून 1950 को हुआ था। वह शाजापुर (म.प्र.) में पले-बढ़े। वहीं शिक्षा प्राप्त की। पिता के अचानक चले जाने से उनकी मां ने ही उन्हें पाला-पोसा और पढ़ाया-लिखाया। जब पहली नौकरी मिली तो मां को साथ लेकर दिल्ली आ गए। दिल्ली में 1971 से स्वतन्त्र पत्रकारिता आरंभ की।

'नवभारत टाइप्स' में पहले मुम्बई तत्पश्चात् दिल्ली में विशेष संवाददाता सहित विभिन्न पदों पर रहे। जर्मन रेडियो, 'डोयचे वैले' की हिंदी सेवा का 1982-1984 तक संपादन किया। 'हिंदुस्तान' दैनिक के विशेष संवादाता रहे। वर्ष 2003 से 2008 तक हिंदुस्तान टाइम्स की लोकप्रिय पत्रिका 'कादंबिनी' के कार्यकारी संपादक रहे। दैनिक 'नई दुनिया' से भी जुड़े रहे। उन दिनो कम पैसे के कारण दिल्ली के इतने छोटे से मकान में रहते कि मां-बेटे को ठीक से सोने में भी समस्या आती। अचानक नौकरी छूटी तो मां के साथ फिर पिता के घर लौट गए। दिल्ली प्रेस से हुई शुरुआत लंबी नहीं चली क्योंकि बॉस के तनाव और दबाव को लगातार झेलने की बजाय उन्होंने इस्तीफा देना ज्यादा उचित समझा।

फिर शुरू हुआ संघर्ष का दौर। रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, राजेंद्र माथुर जैसे दिग्गजों के बीच अपने लेखन और काम से जब वह पहचाने जाने लगे, उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। संघर्ष, संवेदनशीलता, सरोकार और कठिन मेहनत की पूंजी के जरिए उन्होंने धीरे-धीरे पहले पत्रकारिता, फिर साहित्य में अपना प्रतिष्ठित मोकाम हासिल कर लिया। आम आदमी को अपने सबसे करीब पाने वाले विष्णु नागर 60 की उम्र में रिटायर होने के बाद बहुत कुछ करना चाहते हैं। उनकी तड़प बताती है कि वह उम्र के कारण भले रिटायर हो गए हों, उनके अंदर का युवा पत्रकार और साहित्यकार अब ज्यादा ऊर्जावान हो चुका है। आत्मकथ्य सरीखी उनकी कविता है - 'मैं और कुछ नहीं कर सकता था' -

मैं क्या कर सकता था

किसी का बेटा मर गया था

सांत्वना के दो शब्द कह सकता था

किसी ने कहा बाबू जी मेरा घर बाढ़ में बह गया

तो उस पर यकीन करके उसे दस रुपये दे सकता था

किसी अंधे को सड़क पार करा सकता था

रिक्शावाले से भाव न करके उसे मुंहमांगा दाम दे सकता था

अपनी कामवाली को दो महीने का एडवांस दे सकता था

दफ्तर के चपरासी की ग़लती माफ़ कर सकता था

अमेरिका के खिलाफ नारे लगा सकता था

वामपंथ में अपना भरोसा फिर से ज़ाहिर कर सकता था

वक्तव्य पर दस्तख़त कर सकता था

और मैं क्या कर सकता था

किसी का बेटा तो नहीं बन सकता था

किसी का घर तो बना कर नहीं दे सकता था

किसी की आँख तो नहीं बन सकता था

रिक्शा चलाने से किसी के फेफड़ों को सड़ने से रोक तो नहीं सकता था

और मैं क्या कर सकता था-

ऐसे सवाल उठा कर खुश हो सकता था

मान सकता था कि अब तो सिद्ध है वाकई मैं एक कवि हूँ

और वक़्त आ चुका है कि मेरी कविताओं के अनुवाद की किताब अब

अंग्रेजी में लंदन से छप कर आ जाना चाहिए।

विष्णु नागर की अब तक प्रकाशित कविता की पुस्तकें हैं - मैं फिर कहता हूँ चिड़िया, तालाब में डूबी छह लड़कियाँ, संसार बदल जाएगा, बच्चे, पिता और माँ, हंसने की तरह रोना, कुछ चीजें कभी खोई नहीं, कवि ने कहा। उनके कहानी संग्रह हैं- आज का दिन, आदमी की मुश्किल, आह्यान, कुछ दूर, ईश्वर की कहानियाँ, बच्चा और गेंद। उन्होंने एक उपन्यास भी लिखा है - आदमी स्वर्ग में। निबंध संग्रहों में प्रमुख हैं- हमें देखती आँखें, यर्थाथ की माया, आज और अभी, आदमी और समाज। एक आलोचना संग्रह भी है- कविता के साथ-साथ। वह मध्य प्रदेश सरकार के शिखर सम्‍मान, हिंदी अकादमी के साहित्‍यकार सम्‍मान, शमशेर सम्‍मान आदि से समादृत हो चुके हैं। उनका कहना है कि साहित्य में जनतंत्र की बात सृजन-कर्म तक ही सीमित नहीं।

कला-साहित्य-संस्कृति तीनों ही के लिए आज जनतंत्र का प्रश्न विचारणीय है। सारी कलाओं पर असहजता रुख है, जबकि भारतीय संस्कृति ऐसी नहीं रही है। यह आत्मघाती असहिष्णुता है। असहिष्णुता में विश्वास रखने वाले जनता के 'अनपढ़' और 'निरक्षर' रहने में ही अपना भला चाहते हैं। उनका साहित्य और कला से कोई लेना-देना नहीं है। देखिए, कि लोक संगीत, शास्त्रीय संगीत को जमाने से संश्रय मिला है। महान शास्त्रीय गायक, लेखक, वह चाहे किसी जाति-धर्म-समुदाय के हों, उनकी कला की ऊंचाइयों, उनकी सुयोग्यता के नाते उन्हें मान-सम्मान दिया जाता था। वह सूफी कवि अमीर खुसरो रहे हों या संगीतकार अमीर खां, रहीम-रसखान रहे हों या बिस्मिल्ला खां। और भी अनेक। मीर, ग़ालिब, कबीर जैसे जाने कितने नाम। हमारे देश में कला-साहित्य में उनका किसी से कम योगदान नहीं रहा है। उन्हें कहां, किसी ने रोका है। लेकिन कुछ लोग नई पीढ़ी का ऐसा भविष्य चाहते हैं, जो उनकी विचारधारा, उनकी राजनीति का भविष्य सुरक्षित रख सके।

विष्णु नागर का कहना है कि कला और साहित्य का उद्देश्य देश-समाज का भविष्य आज से ज्यादा मानवीय, ज्यादा लोकतांत्रिक बनाने का होना चाहिए, जबकि हो इसके उल्टा रहा है। आर्थिक उदारीकरण ने ऐसी शिक्षा प्रणाली विकसित की है, जो उनके हितों को साधने लायक नौकरीशुदा युवाओं की फौज तैयार करे। उन युवाओं को 'विचार' से कुछ लेना-देना नहीं है। 12 से 18 घंटे तक नौकरी कर वह घर लौटते हैं तो थके-मांदे सुस्ताना चाहते हैं, मौज-मस्ती करना चाहते हैं, टीवी-मोबाइल में व्यस्त रहना चाहते हैं। बाजार के, सिस्टम के सिरे से उनमें ऐसी अभिरुचि विकसित की जाती है। इसीलिए आज हमारे देश में विचारशील युवाओं का अभाव है। यह दुखद है।

समाज के बारे में सोचने के लिए उसके पास समय नहीं है। उनमें से ज्यादातर को पता नहीं, प्रेमचंद, त्रिलोचन, पाश कौन थे। इन युवाओं को साहित्य पढ़ने को मिले, न मिले, उनके दिल-दिमाग पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। उनके लिए 15 अगस्त भी मौज-मस्ती का दिन हो चुका है, सिर्फ छुट्टी मनाने का दिन। जहां तक अच्छी कविता का प्रश्न है, उसका काम सिर्फ इतना है कि जिन संकटों से पूरी मानवता जूझ रही हो, उसके बारे में बात करना। अच्छी कविता किसी भी तरह के अतिवाद से पृथक चीज है। रचनात्मक लेखन का कोई एक फार्मूला नहीं। निराला, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय अपनी दोनो ही तरह की कविताओं से बड़े होते हैं। विश्व साहित्य पढ़ने के बाद भी कोई अच्छी कविता जन्म ले सकती है। जरूरी नहीं कि वह अपने अर्थ-गांभीर्य में सहज ही समझ में न आने के कारण अच्छी कविता न मानी जाए। विषयानुसार कोई कविता सरल या कठिन होती है। ऐसे में जटिल कविता अच्छी, सरल कविता खराब हो सकती है। विष्णु नागर की एक कविता है - 'एडजस्टमेण्ट' -

ज़िन्दगी एडजस्टमेण्ट से ही चलती है

उसी से नौकरी मिलती है, पदोन्नति होती है

मालिक या अफ़सर का विश्वास हासिल होता है

दुकान चलती है

एडजस्टमेण्ट करनेवालों की ज़िन्दगी में

तूफ़ान नहीं आते, बाढ़ नहीं आती

आ भी जाए तो नुक़्सान दूसरों का होता है

एडजस्टमेण्ट करना भला - शरीफ़ होने का लक्षण है

चरित्र का प्रमाण है

औरत का सुहाग है, तलाक़ से बचने का शर्तिया उपाय है

एडजस्टमेण्ट से ही सत्ता मिलती है, देर तक टिकती है

पैसा बनता है, लोकप्रियता मिलती है

हार्टअटैक और ब्रेन हैमरेज से बचने के लिए

डॉक्टर इसकी सलाह दिया करते हैं

एडजस्टमेण्ट करके चलो

तो दुनिया में अपनी तूती बोलती है

एडजस्टमेण्ट कर लो तो कुछ भी अश्लील

कुछ भी अकरणीय नहीं रह जाता

कुछ भी बेचैन-परेशान नहीं करता

कुछ भी,कैसे भी करना धर्म सरीखा लगता है

हत्यारे सज्जन पुरुषों में तब्दील हुए दीखते हैं

आदरणीय होकर फादरणीय हो जाते हैं

हक़ की लड़ाई नक्सलवाद लगने लगती हैं

नफ़रत फैलाना संस्कृति के प्रचार-प्रसार का

अभिन्न अंग मालूम देता है

एडजस्टमेण्ट समय की पुकार है

शास्त्रों का सार है

एडजस्टमेण्ट करना सेल्फ़ी लेने जितना आसान है

एडजस्टमेण्ट हर शहर का महात्मा गाँधी मार्ग है

एडजस्टमेण्ट कण्डोम के समान है

जिसे पहनकर अपने को ब्रहमचारी सिद्ध करना आसान है

एडजस्टमेण्ट 2002 के बाद का

सत्य है, शिव है, सुन्दर है

एडजस्टमेण्ट का पुरस्कार मिलकर रहता है

भारत माँ के सच्चे पुत्र होने का सौभाग्य मिलता है

और कुछ हो न हो मगर देश का विकास होकर रहता है

अरे विकास, विनाश नहीं, विकास।

विष्णु नागर का कहना है कि पत्र-पत्रिकाओं के विक्रेता भी आज बाजारवादी संस्कृति की चपेट में हैं। एक तो, समाज में एक अंग्रेजीदां वर्ग आर्थिक रूप से समर्थ है। वह इस मद में कितना भी पैसा खर्च कर लेता है। अपने हाव-भाव से सामने वाले को चमत्कृत करना चाहता है। दिखावे में विश्वास रखता है। उसके ड्राइंग रूम में तरह-तरह की अंग्रेजी मैग्जीन्स टेबल पर सजी होनी चाहिए। वह अपने बच्चों को हिंदी नहीं पढ़ाना चाहता है। आधी हिंदी, आधी अंग्रेजी में बात करता है। दूसरी बात करियर, बेरोजगारी से जूझ रहे युवाओं को रोजगार संबंधी जानकारियां अंग्रेजी पत्रिकाओं के माध्यम से मिल रही हैं। अब पहले की तरह 'रोजगार समाचार' कहां दिखता है। उसे घर बैठे ऑनलाइन भी सबकुछ मिल जा रहा है। नौकरी के लिए अंग्रेजी माध्यम मुख्य है।

इसके अलावा हमारे सामाजिक जीवन में आ रहे बाजारू बदलावों के कारण भी हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का पाठक घटा है। वह हर काम में व्यक्तिगत नफा-नुकसान देखने लगा है। उसके लिए देश और समाज बाद की बात है। चालीस-पचास रुपए देकर हिंदी की कोई पत्रिका खरीदना उसे फायदे का नहीं लगता है। एक और गंभीर वजह हमे हिंदी के अखबारों की हालत से समझना चाहिए। किसी घटना, किसी रिपोर्ट को अंग्रेजी के पत्रकार, संपादक जितनी गंभीरता से लेते हैं, उनकी रिपोर्ट, उनकी राइटिंग में जितनी कुशलता, जितनी जरूरी सूचना पढ़ने को मिलती है, हिंदी के अखबारों में आमतौर से ऐसा पढ़ने को नहीं मिल पा रहा है। मसलन, आप हिंदू, इंडियन एक्सप्रेस की कोई रिपोर्ट उठाकर देख लीजिए, चाहे उनके कला-साहित्य के पन्ने को भी पलट लीजिए, पढ़ने से लग जाता है कि प्रकाशन से पहले उसे कितनी गंभीरता से लिया गया होगा। बस इतना समझिए कि तथ्यों से भरा-पूरा होने के नाते अंग्रेजी का अखबार पढ़ने में घंटा-दो घंटा पढ़ने लायक सामग्री मिल जाती है तो हिंदी का अखबार हम पांच-दस मिनट में पढ़कर रख देते हैं। विष्णु नागर की एक अन्य कविता है - 'सपने ऐसे भी हों' -

मैं उसके सपनों में शायद ही कभी आया हूँ

मगर वह मेरे सपनों में कई बार आई है

हो सकता है कि वह किसी और के सपनों में आना चाहती हो

मगर वह न आने देता हो

इसलिए हताशा में वह मेरे सपनों में चली आती हो

सपने ऐसे भी हों जिनमें हम दोनों एक दूसरे से मिलें

फिर यथार्थ में दोनों कहीं मिले तो ऐसे शरमायें

जैसे कल ही कहीं चोरी छुपे- मिले थे

और आगे भी इरादा इस तरह मिलने जुलने का है

मगर इस बीच कोई समझ जाये कि दोनों के बीच कुछ है

वह मुस्कुराये और हम दोनों उसकी मुस्कुराहट के जवाब में ऐसे मुस्कुरायें

जैसे हमारी चोरी पकड़ी गयीं

तो भी क्या!

यह भी पढ़ें: बचपन में नाना से महाभारत सुनते-सुनते पंडवानी पुरोधा बन गईं लोक गायिका तीजनबाई

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