क्या सस्ती सार्वजनिक चार्जिंग व्यवस्था दे सकती है दिल्ली के इलेक्ट्रिक वाहनों को रफ्तार?

दिल्ली में अभी 573 चार्जिंग स्टेशन हैं जहां इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्ज करने पर 10 से 15 रुपये प्रति यूनिट का शुल्क देना होता है. दिल्ली सरकार ने हाल ही में 100 सस्ते सार्वजनिक चार्जिंग स्टेशन शुरू करने का निर्णय लिया है जहां पर 2 रुपये प्रति यूनिट के दर से वाहनों को चार्ज करने की सुविधा दी जाएगी.
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कोरोना महामारी की वजह से आई मंदी के बाद, इलेक्ट्रिक वाहनों का बाज़ार दिल्ली में फिर से तेज होता दिख रहा है. इस वर्ष के शुरू के छह महीनों में इस केंद्र-शासित प्रदेश में 25,890 इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद की गई. यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है क्योंकि इससे पहले कभी भी इलेक्ट्रिक वाहनों की इतनी बिक्री नहीं हुई थी.

देश की राजधानी दिल्ली में निजी और कमर्शियल दो पहिया और चार पहिया इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के अलावा फूड डिलेवरी, ई-कॉमर्स वेबसाइट की डिलेवरी और पोर्टर सर्विसेस क्षेत्र में भी इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रयोग को लेकर अच्छा उत्साह है. बीते समय में ई-रिक्शा, ई-ऑटो, ई-स्कूटर जैसे वाहनों मे विस्तार देखने को मिला है जिससे न केवल ऐसे वर्ग के वाहनों के ईंधन में आने वाला खर्च कम हो पाया है बल्कि कार्बन उत्सर्जन में भी कमी का अनुमान है.

आप ब्लूस्मार्ट का ही उदाहरण लीजिये. ब्लूस्मार्ट दिल्ली और एनसीआर में केवल इलेक्ट्रिक से चलने वाली टैक्सी सेवा है. इसकी शुरुआत 2019 में 70 ई-टैक्सी के साथ हुई थी. इनका उद्देश्य दिल्ली के प्रदूषित सड़कों पर उत्सर्जन-मुक्त टैक्सी सर्विस उपलब्ध कराना था. इनके सह-संस्थापक पुनीत गोयल ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया कि अब इनके पास 1,800 से अधिक इलेक्ट्रिक टैक्सी है. इनका लक्ष्य आने वाले कुछ वर्षों में 5,000 इलेक्ट्रिक वाहनों को सड़कों पर लाने का है. उपभोक्ताओं में बढ़ते जागरूकता के कारण अब इलेक्ट्रिक से चलने वाली टैक्सी सेवा की मांग भी बढ़ रही है.

गोयल बताते हैं कि उनके वाहनों के ईंधन की जरूरतों के लिए उनके पास 1,400 चार्जिंग पॉइंट है. उन्होंने यह भी बताया कि केंद्र सरकार की एफ़एएमई-II योजना और दिल्ली सरकार की बिजली के कम दरों के कारण इलेक्ट्रिक टैक्सी सेवा देने वाले उद्योगों को मदद मिली है. ब्लूस्मार्ट के अलावा दिल्ली में ईईए-टैक्सी, प्रकृति ई-मोबिलिटी द्वारा भी इलेक्ट्रिक टैक्सी की सुविधा मुहैया करायी जा रही है.

उसी तरह खाने और घरेलू समान की डिलेवरी से जुड़ी कंपनियां जैसे-स्विगी, जेपटो, ज़ोमटो, ब्लिंकइट भी डिलेवरी के लिए भारी मात्रा में इलेक्ट्रिक स्कूटर का प्रयोग कर रही हैं. इनकी चार्जिंग की सुविधा उनके ऑफिस में ही की गई है ताकि निजी या सार्वजनिक चार्जिंग केन्द्रो पर इनकी निर्भरता न हो.

दिल्ली सरकार ने इस महीने की 5 तारीख को अपने ड्राफ्ट दिल्ली मोटर वाहन एग्रीगेटर नीति भी प्रकाशित की है. इसका उद्देश्य इलेक्ट्रिक टैक्सी, डिलेवरी सेवा से जुड़े कंपनियों को संचालित करना है. इस नीति के तहत, सभी वर्ग के वाहनों के प्रबंधकों को धीरे धीरे इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या बढ़ाने के लिए कहा गया है जबकि ऐसा न करने पर दंड का भी प्रावधान किया गया है.

इस नीति के अनुसार यात्रियों के आवागमन में लगे टैक्सी सेवा देने वाले, डिलेवरी से जुड़े वाहनों को 2030 तक पूरी तरह से इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग करना अनिवार्य होगा.

चार्जिंग है सबसे बड़ी चुनौती

हालांकि दिल्ली में सभी तरह के इलेक्ट्रिक वाहनों में लोग रुचि दिखा रहे है. पर इन गाड़ियों को चार्ज करने में अभी भी बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. वैसे तो निजी और कमर्शियल दो पहिया और चार पहिया वाहनों के चार्जिंग के लिए ऑफिस और घरों में लगे चार्जिंग केंद्र से अक्सर इनका काम हो जाता है. पर सार्वजनिक परिवहन में प्रयोग किए जाने वाले वाहन जैसे ई-रिक्शा, ई-ऑटो, ई-मालढुलाई वाहन चार्जिंग को लेकर आज भी काफी मुश्किल का सामना कर रहे हैं. इन्हें अक्सर ऐसे निजी केन्द्रों पर निर्भर रहना होता है जहां चार्जिंग और पार्किंग की सुविधा तो मिलती है लेकिन इसके लिए अच्छी-खासी रकम देनी होती है. औसतन एक ई-रिक्शा या इस श्रेणी के इलेक्ट्रिक वाहन को एक महीने में लगभग 3000 से 4000 रुपये सिर्फ चार्जिंग के लिए खर्च करना पड़ता है.

दिल्ली की सड़कों पर राज्य सरकार के द्वारा संचालित इलेक्ट्रिक बसों का विस्तार धीरे धीरे हो रहा है. तस्वीर - मनीष कुमार

आप पवन कुमार का ही उदाहरण लीजिये. वो पिछले साल तक ठेला चलाते थे और महीने में करीब 10,000 रुपये कमा लेते थे. वो जगतपुरी में टाइल्स की ढुलाई का काम करते है. इस साल उन्होंने एक इलेक्ट्रिक वाहन खरीद ली. माल ढुलाई के मकसद से ही. वैसे तो उनकी कमाई में कुछ इजाफा हुआ लेकिन चार्जिंग की समस्या की समस्या ने उन्हें निश्चिंत नही होने दिया.

“मैंने इस साल के जनवरी में ई-रिक्शा चलाना शुरू किया और इससे मेरे कमाई में भी वृद्धि हुई. पहले में एक महीने में लगभग 10,000 रुपये तक कमाता था. इस काम बहुत शारीरिक मेहनत लगती थी और लगातार ऐसा करना संभव नहीं था. इसलिए बीच-बीच में आराम करना पड़ता था. ई-रिक्शा में अब में ज्यादा समय तक अपना काम कर सकता हूं. अब मैं महीने के अंत तक लगभग 15,000 रुपये कमा लेता हूं. मैं और मेरे बहुत से ई-रिक्शा चलाने वाले साथी अक्सर चार्जिंग के लिए अपने वाहनों को ऐसे केन्द्रों में छोड़ आते है जहां उनकी वाहनों के लिए चार्जिंग और पार्किंग की सुविधा होती है. इसमे हमें हर महीने लगभग 3,000 रुपये तक खर्च पड़ता है,” कुमार ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया.

उसी तरह रमेश यादव दिल्ली के आईपी एक्सटैन्शन मेट्रो स्टेशन के पास अपनी ई-रिक्शा चलाते है. वो बताते है कि इस शुल्क के अलावा भी वाहनों के रख-रखाव में कुछ और खर्च भी आता है. उनका कहना है कि अगर सरकार कम शुल्क में सार्वजनिक चार्जिंग केन्द्रों की सुविधा मुहैया कराये तो दिल्ली में चल रहे ई-रिक्शा चलाने वाले बहुत से लोगो को लाभ होगा और उनपर हर महीने लगने वाले खर्च भी कमी आएगी.

“दिल्ली में अगर आप निजी चार्जिंग स्टेशन का लाभ लेने की सोचें भी तो उनका शुल्क 10 रुपये प्रति यूनिट से 50 रुपये प्रति यूनिट तक है. ऐसी स्थिति में सरकार अगर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में चार्जिंग स्टेशन लगाए तो यह सबके लिए अच्छा होगा,” रमेश यादव ने बताया.

ई-ऑटो चलाने वाले रामनाथ प्रसाद कहते है कि अधिक शुल्क अदा करने के अलावा निजी चार्जिंग की संख्या इलेक्ट्रिक गाड़ियों की संख्या के अनुसार बहुत ज्यादा नहीं है. इसके अलावा बहुत से निजी चार्जिंग केन्द्रों में केवल चार पहिया इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्ज करने की ही सुविधा होती है.

ई-रिक्शा और ई-ऑटो को चार्ज करने से जुड़ा एक और पहलू भी है जो बिजली की चोरी और इन्हें चार्ज करने के लिए अनाधिकृत बिजली के प्रयोग से जुड़ा है जिससे अक्सर बिजली वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को भारी नुकसान भी उठाना पड़ता है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, ई-रिक्शा के ऐसे अनाधिकृत चार्जिंग से दिल्ली में डिस्कॉम को सालाना 150 करोड़ रुपये तक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. सामान्यतः एक ई-रिक्शा को पूरी तरह से चार्ज करने में 7 से 10 यूनिट बिजली का प्रयोग होता है. लेकिन घरों में समुचित जगह न होने और सस्ती सार्वजनिक केन्द्रों की कमी के कारण ई-रिक्शा के ड्राईवर अक्सर वाहनों को ऐसे पार्किंग-कम-चार्जिंग केन्द्रो में चार्ज करते हैं.

हालांकि दिल्ली में ईवी चार्ज करने के लिए घरों में लगाया जाने वाला मीटर से बिजली की दर 4.5 रुपये प्रति यूनिट आती है. कई राज्यों की अपेक्षा यह मूल्य काफी कम है. इसके अतिरिक्त सरकार की तरफ से इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने पर कई और तरह की सहूलियत दी जाती है. लेकिन जागरूकता की कमी और घरों में पार्किंग की जगह के अभाव के कारण बहुत से ई-रिक्शा के ड्राईवर उन्हे घरों पर चार्ज नहीं कर पाते.

हालांकि दिल्ली सरकार ने हाल ही में सस्ती सार्वजनिक ईवी चार्जिंग केन्द्रों की शुरुआत करने की घोषणा की है जहां ईवी की चार्जिंग 2 रुपये प्रति यूनिट के दर से की जा सकेगी. दिल्ली में ऐसे 14 जगहों पर काम शुरू भी हो चुका है जबकि इस साल के सितंबर महीने तक 100 ऐसे केन्द्र की शुरुआत करने का लक्ष्य रखा गया है. सरकारी आंकड़ों की माने तो दिल्ली में अभी 573 चार्जिंग स्टेशन है जिसमे अधिकतर निजी हैं. ऐसी जगहों पर वाहन चार्ज करने पर कम से कम 10 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से पैसा वसूला जाता है.

दिल्ली में इलेक्ट्रिक से चलने वाले बड़े स्तर के सार्वजनिक परिवहन का भी विस्तार होता दिख रहा है. दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) ने हाल ही में 50 नए ई-रिक्शा चुनिन्दा मेट्रो स्टेशन से फीडर सर्विस के लिए चलाने का निर्णय लिया है. ऐसा तब हो रहा है जब डीएमआरसी द्वारा चलाये फीडर बसों के प्रति लोगों का रुझान उत्साहजनक नहीं था.

स्पूर्थी रवुरी जो सेंटर फॉर स्टडी ऑन साइन्स, टेक्नालजी एण्ड पॉलिसी (सीएस्टेप) में सीनियर एसोशिएट है, कहती हैं कि इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक परिवहन में इनका समागम बहुत जरूरी है. “2020 में दिल्ली के इलेक्ट्रिक वाहन नीति के आने के बाद ईवी की बिक्री में 100 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. पिछले साल ईवी की बिक्री में 8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई थी. अपेक्षा है कि नीति आयोग के बैटरी स्वैपिंग नीति से भी बहुत से लोग ईवी की तरफ प्रोत्साहित होंगे,” रवुरी ने मोंगाबे-हिन्दी को बताया.

दिल्ली के पटपड़गंज इलाके में एक निजी चार्जिंग स्टेशन. तस्वीर - मनीष कुमार

उन्होंने यह भी कहा, “दिल्ली सरकार की नीति के अनुसार 2030 तक कुल वाहनों के बिक्री में से 25 प्रतिशत ईवी का होना है. अगर ऐसा हो पाता है तो दिल्ली में 5 मैट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को रोका जा सकता है. अभी के समय में दिल्ली में जाम 48 प्रतिशत है यानी जाम की स्थिति में सामान्य समय से 48 मिनट अधिक लगता है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि यहां सड़क पर वाहन की संख्या काफी अधिक है. ऐसे स्थिति में हमें इलेक्ट्रिक से चलने वाले सार्वजनिक वाहनों को बढ़ावा देने के जरूरत है.”

सार्वजनिक परिवहन में दिल्ली में बसों के एक बड़ा स्थान है लेकिन बसों के विद्युतीकरण की रफ्तार अभी बहुत अच्छी नहीं दिखती. अभी दिल्ली में केवल 150 इलेक्ट्रिक बसें सड़कों पर चल रही हैं जबकि डीटीसी ने 2023 तक 1800 इलेक्ट्रिक बसें चलाने की बात कही है. दिल्ली के परिवहन विभाग के सचिव आशीष कुंदरा ने हाल ही में में घोषणा भी की है कि कोई भी महिला ड्राईवर अगर सरवरी ड्राइविंग प्रशिक्षण केंद्र में ई-वाहन चलाने का प्रशिक्षण लेती है तो उन्हे 50 प्रतिशत तक की छूट मिलेगी. इन महिलाओं को ई-वाहन चलाने वाले किसे टैक्सी कंपनी में नौकरी भी दी जा सकती है. दिल्ली सरकार 2025 तक सड़कों पर चलने वाले बसों में से 75 प्रतिशत बसों को ई-बसों में बदलने का भी लक्ष्य रखा है.

जब मोंगाबे-हिन्दी ने डीटीसी या दिल्ली परिवहन विभाग के अधिकारियों से चार्जिंग और विद्युतीकरण के गति के सिलसिले में संपर्क करने के कोशिश की तो कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.

इन सब के बावजूद इलेक्ट्रिक वाहन चलाने वाले लोगों ने ईंधन में लग रहे खर्च के कमी की बात भी मानी है. दिल्ली के पटपड़गंज में एक निजी चार्जिंग स्टेशन में काम कर रहे एक कर्मचारी ने बताया कि वो चार पहिया के चार्जिंग के लिए 13 रुपये प्रति यूनिट लेते हैं. 22 किलोवाट के इलेक्ट्रिक वाहन एक बार पूरी तरह से चार्ज पर 150 किलोमीटर तक का सफर पूरा कर सकते हैं वहीं 44 किलोवाट की बैटरी से चलने वाले ईवी 350 किलोमीटर तक जा सकते है.

(यह लेख मुलत: Mongabay पर प्रकाशित हुआ है.)

बैनर तस्वीर: दिल्ली के मयूर विहार इलाके में एक ई-रिक्शा. तस्वीर- मनीष कुमार

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