कोरोना वायरस: बेंगलुरु के इस छात्र ने जुगाड़ से बनाया कांटैक्टलेस नल

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बेंगलुरु के कक्षा 8 के छात्र गोवर्धन ने लॉकडाउन के दौरान अपने खाली समय का उपयोग एक कांटैक्टलेस नल बनाने के लिए किया, इसके लिए उन्होंने इंटरनेट से प्रेरणा ली है।

14 वर्षीय गोवर्धन


आज जब हम कोरोना वायरस महामारी के मुकाबला कर रहे हैं, तब तकनीक ने हमें काफी हद तक इस लड़ाई में मदद की है।

इस बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और भारत सरकार सुरक्षित स्वच्छता प्रथाओं को प्रोत्साहित करने के साथ, आज लोगों के बीच साबुन से हाथ धोना एक आदत बन गई है। हालांकि हाथ धोने के दौरान नल को अनावश्यक रूप से छूने से भी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

हाथ धोते समय संक्रमण के जोखिम को कम करने में मदद करने के लिए बेंगलुरु पूर्व में स्थित चन्ननसन्द्रा सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय के कक्षा 8 के छात्र गोवर्धन ने इंटरनेट से मदद लेकर ‘टिप्पी टैप’ नामक एक कांटैक्टलेस पानी के नल का निर्माण किया है।

टिप्पी टैप एक सैनिटाइजर डिस्पेंसर जैसा समाधान है, जहां लोग पानी के नल को छूने के बजाय पानी निकालने के लिए पैडल का उपयोग कर सकते हैं।

गोवर्धन ने योरस्टोरी को बताया, “इस COVID-19 समय में कुछ भी नहीं छूना सुरक्षित है। इसलिए मुझे यह विचार आया और मैंने पैडल संचालित टिप्पी टैप के बारे में भी पढ़ा। मैंने इसे देखा और इसे बनाना बहुत आसान था। इसलिए, मैंने अपने पिता की मदद ली और टिप्पी टैप की स्थापना की।”


गोवर्धन का कहना है कि अक्षय पात्र फाउंडेशन में उनके संरक्षक ने उन्हें लॉकडाउन के दौरान नई चीजें सीखने के लिए प्रेरित किया और उनका यह इनोवेशन इसी का परिणाम था। उनके पिता कृष्णप्पा कपड़े धोने की दुकान के मालिक हैं, जबकि उनकी मां कलावती गृहिणी हैं।

अपने इनोवेशन के बारे में बात करते हुए गोवर्धन ने कहा कि उन्होंने टिप्पी टैप बनाने के लिए एक भी रुपया खर्च नहीं किया और घर में आसानी से उपलब्ध होने वाली सामग्री जैसे कि खाली तेल की कैन, कुछ माचिस आदि का इस्तेमाल किया।

बड़े होकर गोवर्धन एक खगोल विज्ञानी बनने के अपने सपने का पीछा करना चाहते हैं। वह भोलेपन के साथ कहते हैं, "मैं एक खगोलशास्त्री बनना चाहता हूं और अंतरिक्ष यान बनाने के लिए नासा के साथ काम करना चाहता हूं और अंतरिक्ष में कुछ दिलचस्प ढूंढना चाहता हूं।"

सोमवार देर शाम के आंकड़ों के अनुसार भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के मामले 9 लाख के पर जा चुके हैं, जबकि अब तक 5 लाख 71 हज़ार से अधिक लोग इससे रिकवर हुए हैं।