संस्करणों
प्रेरणा

'हिंदी में क्रिकेट मैच का आंखों देखा हाल सुना रहे हैं कमेंटेटर सुशील दोशी'

‘‘जिनलोगों को दिल की बीमारी हो, वो कमेंट्री नहीं सुनें तो बेहतर है क्योंकि उनके डॉक्टर उन्हें यह सलाह दे रहे होंगे कि ये रोमांच जो सर पर चढ़कर हावी हो रहा है, ये उनके दिल के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।’’

Raj Ballabh
1st Jun 2015
Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share
सुशील दोशी, क्रिकेट कमेंटेटर

सुशील दोशी, क्रिकेट कमेंटेटर


‘‘जिनलोगों को दिल की बीमारी हो, वो कमेंट्री नहीं सुनें तो बेहतर है क्योंकि उनके डॉक्टर उन्हें यह सलाह दे रहे होंगे कि ये रोमांच जो सर पर चढ़कर हावी हो रहा है, ये उनके दिल के लिए हानिकारक साबित हो सकता है।’’ये कथन हैं रेडियो के मशहूर हिंदी क्रिकेट कमेंटेटर सुशील दोशी के। 1979 में भारत-इंग्लैंड टेस्ट मैच में कहे गए ये वाक्य आज भी भारत-पाकिस्तान या फिर भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले जाने वाले कई मैच के लिए हू-ब-हू लागू होते हैं।

image


जब 65-वर्षीय सुशील दोशी दूरदर्शन के लिए कमेंट्री करने के लिहाज से माइक संभालते हैं, तो वह शायद अपने शब्दों को याद कर रहे होते हैं, जो लोगों को 33 वर्षों के बाद भी याद है। ‘‘वह घड़ी मेरी स्मृति में स्थायी रूप से रच-बस गई है। ओवल में टेस्ट, था जिसमें सुनील गावस्कर ने 221 रन बनाए थे और मैच उत्तेजना के चरण में था क्योंकि भारत की लिए जीत नजर के सामने दिख रही थी,’’ वह इंदौर से मुझे फोन पर बताते हैं जहां वे अभी रह रहे हैं।

अपनी प्रसिद्ध उक्ति के लिए जवाबदेह घटना के बारे में विस्तार से बताते हुए दोशी जी कहते हैं कि कमेंट्री बॉक्स से उन्होंने कुछ लोगों को स्टेडियम छोड़कर जाते देखा। ओवरों के बीच ही उन्होंने बताया था कि वे लोग इस घड़ी में मैच छोड़कर क्यों जा रहे हैं। ‘‘उनलोगों ने मुझे बताया कि दिल का मरीज होने के कारण डॉक्टर ने उन्हें इस तरह की उत्तेजना से दूर रहने की सलाह दी है। इसीलिए जब उन्होंने माइक संभाला तो उसी भावना को व्यक्त किया,’’ दोशी जी उन पंक्तियों को अपनी मौलिक शैली में मेरे लिए फोन पर दुहराते हैं। इसने मुझे उन दिनों की याद में पहुंचा दिया जब जिंदगी के पांच दिनों को ट्रांजिस्टर के इर्दगिर्द रहकर फुरसत में गुजारा जाता था।

सफेद वर्दी वाले लोग

देवता तो हैं ही, कुछ देवता और भी हैं। अगर सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा, सर डॉन ब्रेडमैन, इमरान खान और मुथैया मुरलीधरन की चाहतों का अपना-अपना परमपावन स्थान है, तो टोनी कोर्नहीजर, नरोत्तम पुरी, सुरेश सरैया, रवि चतुर्वेदी, विज्जी, जसदेव सिंह, सुशील दोशी और अनेक प्रसिद्ध कमेंटेटर भी अपने आप में देवगण हैं। जिस तरह क्रिकेट के प्रशंसक हैं, उसी तरह क्रिकेट कमेंट्री के भी अनेक दृढ़ प्रशंसक हैं।

कमेंटेटरों के लिए खेल की गहरी जानकारी के अलावा, कथावाचन का गुर भी जानना जरूरी होता था। गेंद-दर-गेंद का तथ्यपूर्ण विवरण देना भर पर्याप्त नहीं था (जैसा कि नई पीढ़ी के टीवी कमेंटेटर अक्सर करते हैं)। रेडियो पर कमेंट्री के ये जादूगर श्रोताओं के लिए अपनी खास जादुई शैली से मैदान में होने वाली गतिविधियों को गढ़ते थे। दोशी जी खास तौर पर स्वर्गीय सुरेश सरैया पर मोहित थे जिनकी कमेंट्री प्रवाहपूर्ण लयात्मक शैली के कारण अक्सर सरैया राग के नाम से जानी जाती थी। दोशी खुद भी अपनी आवाज की पिच और टोन से हासिल नाटकीय प्रभाव के जरिए खेल का सस्पेंस सामने लाकर आपके अंदर एड्रिनेलिन का स्तर बढ़ा सकते हैं।

ऑल इंडिया रेडियो के अंग्रेजी क्रिकेट कमेंटेटर रहे आर. के. कृष्णास्वामी ने मुझे बताया कि रेडियो कमेंट्री बहुत कठिन होती है। ‘‘आपको अपने-आपको टेलिस्कोप से एक ही आयाम में स्थिर करना होता है जहां आप और खेल एकमात्र यथार्थ होते हैं। आपके लिए इस तरह ध्यान केंद्रित करना जरूरी होता है। आपके शब्द सैंकड़ों मील दूरी पर सुनने वाले लाखों लोगों के लिए सच्चाई होते हैं। लेकिन इस पूरे क्रियाकलाप से आपको जो आनंद मिलता है वह लगभग ऑर्गाज्मिक होता है,’’ वह लापरवाही से कहते हैं।

‘बच्चे, थोड़ा अनुभव तो हासिल कर लो’

आज के युवावर्ग को यह सोचने के लिए माफ किया जा सकता है कि रेडियो कमेंट्री गंजे, उम्रदराज लोगों के लिए है। ऑल इंडिया रेडियो के स्टेशन डायरेक्टर ने भी यही सोचा था जब 18-वर्षीय दोशी उनके कार्यालय में हिंदी में कमेंट्री करने की इच्छा व्यक्त करने पहुंचे थे। ‘‘उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा और और बोले, ‘बच्चे, थोड़ा अनुभव, थोड़ी परिपक्वता हासिल कर लो और तब आना,’ और उन्होंने मुझे अस्वीकार कर दिया था,’’ दोशी जी हंसते हुए बताते हैं। लेकिन जैसे कि नियति ने तय कर रखा हो, सरकार ने हिंदी में क्रिकेट कमेंट्री शुरू करने के लिए ऑल इंडिया रेडियो को निर्देश जारी किया था और उसकी समयसीमा करीब थी। जब अंतिम तिथि तक दूसरा कोई सामने नहीं आया तो स्टेशन डायरेक्टर ने किसी तरह दोशी जी को खोज निकाला और उन्हें उस काम की पेशकश की।

दोशी जी को रेडियो कमेंट्री का कोई अनुभव नहीं था, और हालांकि वह खेल के उत्सुक फॉलोवर थे और अक्सर अंग्रेजी कमेंटेटरों की नकल किया करते थे लेकिन क्रिकेट की घटनाओं को हिंदी में जीवंत प्रस्तुति उनके लिए बड़ी चुनौती साबित हुई।

वह ऐसा समय था कि ऑल इंडिया रेडियो किसी को रातोंरात स्टार बना सकता था, लेकिन दोशी जी ने जब पहली बार 1968 में रणजी ट्रॉफी के एक मैच में माइक संभाला, तो उन्हें काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। उस समय लोग कल्पना भी नहीं कर सके कि क्रिकेट कमेंट्री हिंदी में भी हो सकती है इसलिए यह बात उन्हें अजीब लगी।

"यह मेरे कोमल हृदय के लिए बड़ा धक्का था। उसके बाद मैंने महसूस किया कि अगर मुझे यही करना है, तो अच्छी तरह करना होगा। मुझे एक स्वर्णिम अवसर मिला था और मैं इसे खोना नहीं चाहता था। कोई तो था नहीं जिसकी मैं नकल कर सकता था इसलिए मैंने अपनी खुद की शैली विकसित की।"

शैली और विषयवस्तु

दोशी जी इंजिनियरिंग के स्नातक थे जिनके दिल में हिंदी साहित्य के प्रति भी खिंचाव था लेकिन उनके काम ने उन्हें उससे दूर कर दिया। उन्हें हिंदी पत्रिका धर्मयुग के संपादक धर्मवीर भारती के कथन की याद आई जो उन्होंने कमेंट्री करते समय श्रोताओं के दिल से जुड़ने के बारे में कहा था। ‘‘उन्होंने मुझ कहा कि जो कुछ बोलो, दिल से बोलो तो वह उनके भी दिलों तक पहुंचेगी। उन्होंने मुझे रास्ता दिखाया और उस दिन से मैंने उसे अपना लिया,’’ वह कहते हैं।

दोशी जी ने महसूस किया था कि अंग्रेजी के शब्दों का हिंदी में महज अनुवाद कर देने का कोई फायदा नहीं है। ‘‘उदाहरणस्वरूप, अगर मैंने ‘स्क्वायर लेग’ को वर्गाकार पैर कहा तो श्रोता के सामने इसका कोई अर्थ नहीं निकलेगा। इसलिए ऐसे शब्दों को मैंने यथावत छोड़ दिया। लेकिन मैंने बल्लेबाज और उसके द्वारा खेले के स्ट्रोकों के लिए अपनी खुद की भाषा और शैली गढ़ी। मैं क्रिकेट खेला करता था इसलिए मुझे मालूम था कि बाउंड्री पर पहुंचाने के लिए शॉट खेलने के पहले बल्लेबाज क्या करता है और मैंने इसका फायदा उठाने का फैसला किया। इसलिए मुझे मालूम था कि स्क्वायर कट के लिए बल्लेबाज खुद को गेंद की लाइन से अलग करता है, स्ट्रोक के लिए जगह बनाता है और उसके बाद सीमा रेखा की ओर उसे कट कर देता है,’’ उन्होंने बताया।

इसलिए किसी बल्लेबाज द्वारा स्वाक्यर कट बाउंड्री के लिए उनकी कमेंट्री कुछ इस तरह होती, ‘शॉट पिच गेंद थी, ऑफ स्टंप के बाहर बैकफुट पर गए, स्ट्रोक के लिए जगह बनाए और बहुत खूबसूरती के साथ स्क्वायर कट कर दिया चार रनों के लिए’।

ड्रीम बॉक्स

दोशी जी अकेले क्रिकेट कमेंटेटर हैं जिनके नाम पर कमेंट्री बॉक्स का नामकरण किया गया है जो इंदौर में होल्कर क्रिकेट स्टेडियम में अवस्थित है। लेकिन इन सारी चीजों के लिए होने वाली अपनी यात्रा के बारे में उन्होंने बहुत नम्र आवाज में बताया। ‘‘मैं मध्यवर्गीय परिवार से हूं। जब मैं 14 वर्ष का था तो मैंने जिद पकड़ ली कि मैं मुंबई के, जो उस समय बंबई हुआ करता था, ब्रैबोर्न स्टेडियम में भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच होने वाला मैच देखूंगा। मुझे लगता है कि यह 1958-58 की बात है जब ऑस्ट्रेलियाई टीम रिची बेनो के नेतृत्व में भारत आई थी। मुझे खुश करने के लिए मेरे पिताजी मुझे बंबई ले गए और दो दिनों तक हमलोग स्टेडियम के बाहर खड़े रहे क्योंकि पिताजी को जानकारी नहीं थी कि मुझे लेकर अंदर कैसे जाएं। तीसरे दिन, उन्होंने गेट पर पहरा दे रहे पुलिस के एक सिपाही से अनुरोध किया कि हमलोगों को अंदर जाने दें। सिपाही ने हमलोगों को पहले भी देखा और उसने मेरे पिताजी पर दया की। लेकिन उसने कहा, ’मैं सिर्फ बच्चे को अंदर जाने दूंगा। आप बाहर ही इंतजार कीजिए।’ बिना सोचे कि बेचारे पिताजी बाहर ही इंतजार कर रहे हैं, मैं खुशी-खुशी अंदर चला गया। लेकिन उस समय मेरा पूरा ध्यान उतनी दूरी से भी खिलाडि़यों को एक नजर देख लेने का था। तभी मेरी नजर कमेंट्री बॉक्स पर गई जहां से बॉबी तल्यारखान और विजय मर्चेंट कमेंट्री कर रहे थे, और पल भर के लिए मेरे दिमाग में एक विचार कौंध गया, ‘काश, किसी दिन इस कमेंट्री बॉक्स में मेरी भी जगह होती,’’ दोशी जी बताते हैं।

‘‘विश्वास करो या नहीं,’’ दोशी जी कहते हैं, ’’मैंने अपना टेस्ट मैच कमेंट्री का कैरियर उसी कमेंट्री बॉक्स से शुरू किया।’’ उन्होंने बताया कि जब भी अपने पिताजी द्वारा अपने बेटे का सपना सच करने के लिए किए उन पांच दिनों के कष्ट की बात याद आती है, उनकी आंखें भर आती हैं।

आज दोशी जी टीवी कमेंट्री भी करते हैं और शायद वह अकेले हिंदी क्रिकेट कमेंटेटर हैं जिन्होंने अभी तक नौ विश्व कपों के मैच कवर किए हैं।

मैं आश्वस्त हूं कि आज सिडनी स्टेडियम ‘खचाखच भरा हुआ’ होगा’। अपने ‘आंखों देखा हाल’ में मानवीय मनोविज्ञान का तत्व हमेशा समाविष्ट करने वाले दोशी जी कहते हैं कि पीली वर्दी वाले लोग नीली वर्दी वालों का सामना करेंगे, तो उनका आत्मविश्वास 125 प्रतिशत बढ़ जाता होगा। ‘‘ऑस्ट्रेलियाई लोगों को वही चेहरे दिखेंगे जिन्होंने उन्हें पहले हराया था, और निश्चित ही ‘उनका पलड़ा भारी होगा’।’’

आप सुशील दोशी की कमेंट्री आज भी दूरदर्शन पर सुन सकते हैं।

Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags