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बदलाव के लिए एक पहल की ज़रूरत,'LetzChange'...

"लेट अस चेंज" की भूमिका संस्थाओं के लिए वरदान

17th Jun 2015
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''लेट अस चेंज" विक्रांत भार्गव के दिमाग की अनोखी उपज है. विक्रांत आईआईटी और आईआईएम से स्नातक है. लोकोपकार, सामाजिक सरोकार और सामुदायिक विकास की तरफ उनके जूनून ने उन्हें ''लेट अस चेंज'" की स्थापना के लिए प्रेरित किया. इस दौरान उन्होंने ने महसूस किया कि देश के ज्यादातर स्वैच्छिक संगठन इस हालत में नहीं हैं की वो अपने कार्यों और उपलब्धियों के प्रचार और प्रसार में भारी खर्च कर सकें. वास्तव में बाकी दुनिया से अनजान और अलग थलग वो सामाजिक परिवर्तन का अपना प्रयास जारी रखते हैं. इस मुद्दे पर सामाजिक संगठनो को मदद करने के लिए उन्होंने "लेट अस चेंज" की स्थापना की. औपचारिक स्थापना, 21 जनवरी 2014 के 7 माह के अंदर ही ''लेट अस चेंज" ने एक करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया है. किन्तु स्वैच्छिक जगत को लेकर वर्तमान राजनैतिक उथल पुथल ने अनुदान (फंडिंग) की स्थितियों को और कठिन बना दिया है. और सबके ऊपर विश्वास की कमी ने हालत को और बदतर कर दिया.

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"योर स्टोरी" से साक्षात्कार के दौरान "लेट अस चेंज" के प्रमुख (ऑपरेशंस) राहुल चोव्वा ने बताया- " देश में लगभग 33 लाख संस्थाएं हैं. और हमें उन दाताओं का विश्वास दृढ़ करना होगा जो 50 रूपये से 50,000रूपये तक का दान देते हैं" उन्होंने आगे कहा कि "संस्थाओं की विश्वसनीयता एक बड़ा मुद्दा है और अनेकों संस्थाएं ऐसी है जिन पर विश्वास नहीं किया जा सकता". बहुत सी दाता संस्थाएं है जो संगठनों को लाखों-करोड़ों की मदद करती हैं. लेकिन हमारा लक्ष्य संस्थाओं को ऑनलाइन उपभोक्ताओं से दान इक्कट्ठा करने में उनकी मदद करना है. अमेरिका और इंग्लैंड की तरह हमारे देश में कार्यरत संस्थाओं की कोई सूची उपलब्ध नहीं है. और बहुत सी संस्थाएं अन्य कारणों जैसे अच्छे कार्यकर्तों, तकनीकी या संसाधनों की कमी के कारण बंद हो जाती हैं. विक्रांत ने एक अन्य संस्थान "लेट अस ड्रीम' भी बनाई है, जो की " लेट अस चेंज" की ही एक आनुषंगिक ईकाई है. और जिसका मुख्य काम वित्तीय अनुदान या इन मुद्दों पर संस्थाओं की सहायता करना हैं. वह चाहते हैं कि भारत में भी लोगों के अंदर ऑनलाइन दान करने की सामान्य एवं सामाजिक प्रवृति विकसित हो. उनका कहना है-" हम सोशल मीडिया का इस्तेमाल दानदाताओं की वृद्धि के लिए करना चाहते हैं. हमने बहुत करीब से देखा है की संस्थाएं किस प्रकार से चुनौतियों का सामान कर रही हैं. इनमे से ज्यादातर ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रही हैं. और उनके पास उनके द्वारा किये जा रहे प्रयासों को लोगों तक पहुचने के लिए पर्याप्त और अच्छे संचार और विक्रय माध्यम नहीं हैं. और ऐसे संस्थाओं की सहायता के लिए "लेट अस चेंज" यह जिम्मेदारी लेना चाहता है. वास्तव में यह अत्यंत महत्वाकांक्षी एवं प्रभावी प्रणाली है.

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राहुल आगे बताते हैं-" २०१२ में हम लोगों ने भारत के विभिन्न भागों के 120 गैर सरकारी संगठनो को चिन्हित किया था. उनमे से फिर 108 संस्थानों को चुना गया.फिर हमने १०-१२ फिल्म निर्माताओं को नियुक्त किया और इन सभी संगठनो के पास गए. और इन सब संस्थाओं द्वारा किये जाने वाले प्रयासों को दर्शाने वाली infocommercial लघु फ़िल्में बनाई. लेकिन ये फ़िल्में किसी व्यवसायिक लाभ के लिए नहीं बनायीं गयी थी. इसके बाद हमने इन सभी संस्थाओं की एक प्रोफाइल बनाई. " लेट अस चेंज" के लिए ये सारा कार्य जिम्मेदारी और अच्छे उद्देश्य के रूप में था. यह संभावित ऑनलाइन दाताओं के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण था. एक ऐसी भूमि पर जहाँ उदासीनता, संदेह और मानवद्वेषवाद अपने चरम पर हो वहां "लेट अस चेंज" का यह कार्य परस्पर विश्वास निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. दानकर्ताओं के स्वाभाव से मेल करते हुए सदाशयता, और सामाजिक लक्षण के अनुसार देने के लक्षण को समझना "लेट अस चेंज" को बहुत अच्छे से आता है.

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बहुत सारी संस्थाएं अपना वार्षिक-प्रतिवेदन (Annual Report ) सरकार के पास प्रस्तुत करती हैं. यह लगभग १०० पृष्ठों का एक ऐसा दस्तावेज होता है जिसको विस्तार से कोई भी नहीं पढता. इस प्रक्रिया को आसान और सुगम बनाने के लिए इन सभी चयनित संस्थाओं के लिए हमने एक प्रारंभिक विडिओ बनाया है. और तब हम उन्हें संस्थानों से सम्बंधित प्रमाणीकरण जैसे कि 80G या 35C आदि के बारे में बताते हैं. इन प्रमाणीकरण के आधार पर करों में छूट मिलती है. हम दानीजन को भी बताते है के दान देने से उन्हें किस प्रकार का कर लाभ मिल सकता है. साथ ही कुछ सफल प्रयोगों को भी संक्षिप्त रूप से प्रदर्शित करतें है कि कैसे इस संस्था की पहल से लोगों कि जीवन में बदलाव आया और साथ ही संस्थाएं किस प्रकार से कार्य करती है इसका तकनीकी पहलु भी हम बताते हैं.

कोई भी लोकोपकारी प्रतिष्ठान बनाना अपने आप में एक दुरूह कार्य है. सर्वप्रथम योग्यता आधारित कठोर एवं सुदृढ़ प्रणाली विकसित कर पाना जिस से कि संस्था की साख बन सके. चूंकि इसमें वित्तीय लेन-देन होता है और विश्वश्नीयता सर्वोपरि होती है. और इसी विश्वश्नीयता के आधार पर ही कोई संस्था नियमित अनुदान के लिए अपनी बात ठोस तरीके से रख सकती है. हम कुल 108 संस्थानों से जुड़े हैंलेकिन हमने सिर्फ 71 संस्थाओं को ही प्रदर्शित किया. हम संस्थाओं की प्रमाणिकता के सन्दर्भ में अत्यंत सचेत रहना चाहते हैं. हम संस्थाओं की बहुत ही अच्छे से जाँच परख करते हैं क्योंकि हम चाहते है कि आप का पैसा अच्छे उद्देश्यों में लगे. अनेकों संस्थाएं हमारी वेबसाइट का हिस्सा बनना चाहती हैं किन्तु हमारी प्रक्रिया को पूरा किये बिना हम उन्हें शामिल नहीं कर सकते. राहुल गंभीरता पूर्वक बताते हैं कि नई संस्थाओं को जोड़ते समय हम बेहद सतर्क रहते हैं. दान कर्ता हम पर भरोसा करते है और किसी भी दान कर्ता को दान करते से यह निश्चिन्तिता होनी चाहिए कि उसके द्वारा दी गयी राशि अच्छे उद्देश्य और अच्छे कार्यों कि लिए खर्च की जायेगी. साथ ही संस्थाओं की भी आपस में बहुत ही अच्छी नेटवर्किंग होती है और यदि एक अच्छी साख वाली संस्था दूसरे किसी संस्थान को हमारे पास संदर्भित करती है तो प्रक्रिया पूरी कर के उस संस्था को सम्मिलित करना हमारे लिए आसान होता है. हम अभी २० संस्थाओं की परीक्षण प्रक्रिया पूरी कर रहे हैं और संभवतः महीने भर में हम उन्हें अपने प्रणाली में सम्मिलित कर लेंगें. मुश्किल ये है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने कि लिए संस्थाएं धार्मिक सम्बद्धता रखती हैं. अतः हमें कठोर निर्णय लेना होगा कि इस प्रकार की संस्थाओं को सम्मिलित करना है या नहीं. और यही राजनैतिक प्रतिबद्धता वाली संस्थाओं कि साथ भी लागू होगा.

" हम सिर्फ उन्ही संस्थाओं को रजिस्टर करते है जो किसी धर्म से सम्बद्ध नहीं नहीं है. हम उनके विरुद्ध नहीं है हैं. लेकिन हमने ये अनुभव किया है कि हमारे अधिकतर दानकर्ता ऐसी संस्थाओं को दान देना चाहते है जिनकी कि कोई धार्मिक पृष्ठभूमि न हो. यह सुनिश्चित कर के कि हम किसी भी धार्मिक संस्था को सम्बद्ध नहीं करते हम दान दाताओं को उनकी पसंद का कार्य जिसके लिए वो दान देना चाहते हैं का अवसर प्रदान करते हैं.

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राहुल और तफ्सील से संस्था के चयन के विषय में बताते हैं- "वास्तव में हम संस्था के लिए नहीं बल्कि संस्था द्वारा चलाये जा रहे किसी प्रोजेक्ट के लिए संसधान जुटते हैं, जैसे कि नेत्रहीन लोगों कि लिए विद्यालय का निर्माण. वो हमें बताएँगे कि उन्हें इस कार्य के लिए कितने धन की आवश्यकता है और अन्य सम्बंधित जानकारियां. हम इन सारी सूचनाओं का पुनर्परीक्षण करते हैं और तब उनके प्रोजेक्ट को अपनी वेबसाइट पर फण्ड रेजिंग के लिए अपलोड करते हैं.

किसी भी कोष जुटाने वाली संस्था के लिए अपने दाताओं को प्रोत्साहित करना आवश्यक है न केवल अपने अस्तित्व के लिए बल्कि बल्कि सैकड़ो संस्थाओं की उत्तरजीविता के लिए भी.

राहुल बताते है कि अभी हम संस्थाओं को रजिस्टर करने का कोई शुल्क नहीं लेते. और यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक हम बहुत सी संस्थाओं को जोड़ नहीं लेते. हमारी बातचीत कई संभावित सहभागियों विशेष रूप से कॉर्पोरेट क्षेत्र कि सहयोगियों के साथ चल रही है. इसमें "लेट अस चेंज" कर्मचारी वेतन को केंद्रित कर रहा है. जहाँ बहुराष्ट्रीय कंपनी का कोई कर्मचारी वर्षों तक मासिक किस्तों में किसी संस्था के प्रोजेक्ट को सहयोग करेगा. इस प्रकार की बढ़ती जिम्मेदारियों के लिए मानव संसाधन की आवश्यकता होगी.राहुल हँसते हुए बताते है कि " हमारी वेबसाइट पर हमें हमें ऐसे लोगों के आवेदन मिलते है जो हम से जुड़ना चाहते हैं विशेष रूप से स्वयंसेवी के रूप में. तो ऐसा ही हम कुछ सोच रहे हैं. लोग केवल पैसा ही नहीं देना चाहते वो स्वैक्षिक रूप से हम से जुड़ कर काम भी करना चाहते हैं. सामान्यतः ऐसा संभव नहीं है क्योंकि उनका कोई सीधा सम्बन्ध किसी संस्था से नहीं है. अतः हम एक सेतु का काम करना चाहते है और हम इस तरह के उत्साही वॉलंटियर्स को प्रशिक्षु के रूप में संस्थाओं से जोड़ना चाहते हैं. इस तरह से संस्थाओं और "लेट अस चेंज" दोनों को मदद मिलेगी. आप देख सकते हैं कि यहाँ काम करने वाले हम लोग ज्यादातर युवा हैं, जबकि हम जिनके लिए काम करते हैं वो अपेक्षाकृत ज्यादा उम्र के लोग हैं, लेकिन हम सभी यहाँ नॉन-कॉर्पोरेट माहौल में अत्यंत उत्साह से कार्य करते हैं. हम चाहते हैं कि हमारे साथ और लोग जुड़ें. एक अन्य तरीके से भी हम डोनर्स को जोड़ने का प्रयास कर रहे है है और वो है "चैंपियन ऑफ़ थे चेंज". इसमें हम ऐसे लोगो कि पहचान करते हैं जो अन्य दानकर्ताओं के साथ नेटवर्क कर सकते हैं. हमने एक सॉफ्टवेयर कंपनी से समझौता किया है जो हमारे लिए एक प्रकार का "डोनर मैनेजमेंट सिस्टम" विकसित कर रहे हैं जिस से हमें संभावित दानकर्ताओं की पहचान करने में मदद मिलेगी. जब भी कोई डोनर "लेट अस चेंज" पर रजिस्टर होता है हम उनके सोशल नेटवर्क के माध्यम से उनसे जुड़े अन्य लोगों में से संभावित दानकर्ताओं की पहचान करते हैं. फिर अपने रजिस्टर्ड डोनर के माध्यम से उनलोगो को आमंत्रित करते हैं. वास्तव में हम लोगों को एक प्रकार से फण्ड रेजिंग प्लेटफार्म मुहैया कराना चाहते हैं."

हमारा यह अभियान मुख्यतः तीन समूहों को लक्षित करता है: १. स्कूली बच्चे (ईमेल के माध्यम से) २. युवा 15-25 आयु वर्ग (फेसबुक और ट्वीटर के माध्यम से) और ३. प्रोफेशनल्स (लिंकेडीन के माध्यम से)

अनंत संभावनाओं के साथ "लेट अस चेंज" बहुत कुछ कर पा रहा है. यह लोगों को संस्थाओं से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है. यह छोटी और महत्वपूर्ण संस्थाओं को प्रकाश में ला रहा है और एक सूचना एवं ज्ञान के संसाधन के स्रोत के रूप में कार्य कर रहा है.

और जैसे जैसे दिन समाप्ति की ऒर है राहुल मुस्कुरा कर कहते हैं- " तो यह था हमारा अत्यंत संक्षिप्त परिचय". और उनकी यह सहज मुस्कान "लेट अस चेंज" के इरादों को बयां कर देती है.

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