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सपनों की दुनिया में रंग भरने में माहिर 'चेरिल ब्रगांजा'

चित्रकार और कवि हैं चेरिल ब्रगांजामॉन्ट्रियल में रहती हैं चेरिलकैंसर को दी मात2008 में मॉन्ट्रियल वूमेन ऑफ द इयर अवार्ड से सम्मानित

Harish Bisht
24th Aug 2015
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कला दुनिया को बदल सकती है, क्योंकि कोई भी चित्र इंसान पर गहरी छाप छोड़ता है। ये कहना है चेरिल ब्रगंजा का जो एक चित्रकार, कवि, लेखक, एक पियानोवादक और कला प्रेमी हैं। फिलहाल वो मॉट्रियल, कनाडा में रहती हैं। चेरिल का जन्म यूं तो मुंबई में हुआ लेकिन वो लाहौर में पली बड़ी। दरअसल बंग्रजा परिवार के पूर्वज गोवा में रहते थे और चेरिल के पिता का लाहौर के रेलवे स्टेशन के ठीक सामने एक होटल था। इस परिवार ने आजादी के बाद बंटवारे के दौरान काफी लड़ाई झगड़ा देखा था। साल 1960 में चेरिल पढ़ाई के लिए लंदन चलीं गई और उसके बाद वो कनाडा आ गई। 31 अगस्त, 1966 को जब कनाडा की महारानी मॉन्ट्रियल में डॉक पर थी उस वक्त वो भी उनके साथ थी। चेरिल बताती हैं कि उनको वो दृश्य आज भी याद है जब वहां पर हजारों लोग महारानी को देखने के लिए आये थे। चेरिल बताती है कि उस वक्त वो मॉन्ट्रियल में अकेली थीं और उनको वहां पर कोई नहीं जानता था लेकिन एक नये महाद्विप में उतरने का उत्साह ही कुछ और था।

चेरिल ब्रगांजा

चेरिल ब्रगांजा


कनाडा पहुंचने के बाद चेरिल की जिंदगी एकदम बदल गई। वो अपनी वेबसाइट पर लिखती हैं कि कनाडा में उतरते ही वो विली मैरी की 37 वीं मंजिल में थी। इससे पहले वो कभी भी चार मंजिल इमारत से ऊपर नहीं गई थीं लेकिन यहां पर वो एकदम से आसमान पर आ गईं। वो उस जगह पर थीं जहां पर वो बादलों से बात कर सकती थी, हवा में उड़ सकती थी। इस तरह मॉन्ट्रियल से उनकों प्यार हो गया। तो वहीं दूसरी ओर इस शहर ने, यहां की संस्कृति ने और यहां के कलाकारों को उनको गले लगा लिया। शुरूआत में जब उन्होने पेंटिंग बनानी शुरू की तो विभिन्न आर्ट गैलरियों में कहा जाने लगा कि उनका स्टाइल दूसरे कलाकारों के रंगों से मेल नहीं खाता जिसका वो इस्तेमाल करते हैं। भारतीय होने के नाते वो चमकदार और बोल्ड रंगों का इस्तेमाल करती। जबकि दूसरे कलाकार हल्के रंगों का इस्तेमाल करते। इस तरह उनकी कला वहां से मेल नहीं खा रही थी जिसको देखते हुए चेरिल ने अपने रंगों की टोन को थोड़ा हल्का किया।

पिछले कुछ सालों के दौरान उन्होने भारतीय विरासत को फिर से जिंदा करने की कोशिश की और आज वो अपने जीवंत रंगों से भारतीयता को परिभाषित करती हैं। वो सबसे ज्यादा प्रभावित मोनेट, चगल, वैन गाग, पिकासो और फ्रीडा काहलो के काम से हैं। चेरिल का कहना है कि जब वो जवान थी तब वो इन बड़े कलाकारों की नकल करती थीं लेकिन समय के साथ उन्होने अपने स्टाइल का विकास किया। आज उनकी बनाई पेंटिंग महिलाएं केंद्रीत होती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक महिला होने के नाते वो महिलाओं के संघर्ष और खुशी के पलों को महसूस कर सकती हैं। इसलिए उनके साथ चेरिल की खास सहानुभूति रहती है।

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चेरिल की जिंदगी कभी भी एक समान नहीं रहीं, उन्होने अपनी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव देखे। उनकी जिंदगी में बुरा वक्त तब आया जब उनका अपने पति से तलाक हो गया और उसके बाद जब उनको कैंसर का पता चला। चेरिल का कहना है कि तलाक ने उनको अंदर से मजबूत बनाया तो कैंसर ने उनको लड़ना सीखाया हालांकि ये उनके लिए काफी बड़ी चुनौती थी। लेकिन जिंदगी के ऐसे पलों से समय के साथ वो बाहर निकल आई। आज वो उन चीजों के लिए आभारी हैं जिन्होने उनके जीवन की गति ही बदल दी। वो चीजें जो उनको कला के नजदीक ले गईं, जिन्होने उनको कई मौके दिये कुछ रचनात्मक काम करने के लिये, उन्होने जीवन के हर पल का मजा लिया।

वक्त के साथ चेरिल भी मॉन्ट्रियल शहर, वहां की जिंदगी और वहां के लोगों का हिस्सा बन गई। उनको साल 2008 में मॉन्ट्रियल वूमेन ऑफ द इयर अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। इस सम्मान से उनको ना सिर्फ पहचान मिली बल्कि उनको प्रोत्साहन भी मिला। उनकी बनाई पेंटिग हर चीज से प्रेरित होती है जिसे वो सुनती हैं, देखती हैं। उन्होने शहर में शाम को घूमते हुए महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार देखा है, उन्होने कैंसर के दौरान अपने तजुर्बों को केनवॉस में रंगों और भावनाओं के जरिये उकेरा है। उनका कहना है कि दुनिया भर की महिलाएं उनको प्रेरणा देती हैं।

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