केंद्र सरकार ने क्यों वापस लिया डेटा प्रोटेक्शन बिल? जानिए पूरी वजह

डेटा संरक्षण विधेयक में लोगों के व्यक्तिगत आंकड़ों के इस्तेमाल एवं प्रवाह को वर्गीकृत करने के अलावा निजी डेटा के प्रोसेसिंग के बारे में व्यक्तिगत अधिकारों के संरक्षण के भी प्रस्ताव रखे गए थे.
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सरकार ने बुधवार को लोकसभा में ‘डेटा संरक्षण विधेयक, 2019’ को वापस ले लिया है. अब सरकार को उम्मीद है कि संसद के अगले बजट सत्र में नया विधेयक पारित हो सकेगा. इस विधेयक को 11 दिसंबर, 2019 को सदन में पेश किया गया था. इसके बाद इसे दोनों सदनों की संयुक्त समिति को भेज दिया गया था. समिति की रिपोर्ट 16 दिसंबर, 2021 को लोकसभा में पेश की गई थी.

समिति की रिपोर्ट लोकसभा में इसके अध्यक्ष पीपी चौधरी द्वारा प्रस्तुत की गई थी. रिपोर्ट में जस्टिस श्रीकृष्णा ने कहा था कि यह बिल पूरी तरह से सरकार के पक्ष में है. एक मीडिया रिपोर्ट में उन्होंने कहा था कि यह बिल भारत को ऑरवेलियन स्टेट में बदल देगी.

क्या है डेटा संरक्षण विधेयक?

डेटा संरक्षण विधेयक में लोगों के व्यक्तिगत आंकड़ों के इस्तेमाल एवं प्रवाह को वर्गीकृत करने के अलावा निजी डेटा के प्रोसेसिंग के बारे में व्यक्तिगत अधिकारों के संरक्षण के भी प्रस्ताव रखे गए थे. इसके अलावा डेटा प्रोसेसिंग वाली इकाइयों की जवाबदेही तय करने और अनधिकृत इस्तेमाल की स्थिति में बचाव के कदमों का उल्लेख भी किया गया था.

डेटा संरक्षण विधेयक में सरकार को अपनी जांच एजेंसियों को अधिनियम के प्रावधानों से कुछ खास रियायतें देने की बात भी कही गई थी.

व्यक्तिगत डेटा बिल को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था. पहला संवेदनशील व्यक्तिगत डेटा (जैसे हेल्थ, सेक्सुअल ओरिएंटेशन, फाइनेंसेस), दूसरा महत्वपूर्ण पर्सनल डेटा और तीसरा बेसिक पर्सनल डेटा था.

बिल में क्या था?

1. बिल में पर्सनल डेटा एकत्र करने वाली संस्थाएं लोगों की सहमति से केवल उस डेटा को कलेक्ट कर सकती हैं, जो एक किसी खास उद्देश्य के लिए आवश्यक हैं.

2. डेटा लीक को लेकर कंपनी को उल्लंघन के बारे में 72 घंटों के भीतर बताना होगा. यदि कोई कंपनी व्यक्तिगत डेटा या बच्चों के डेटा को प्रोसेसिंग करने के प्रावधानों का उल्लंघन करती है, या निर्धारित नियमों के विरुद्ध भारत के बाहर डेटा स्थानांतरित करती है, तो उस पर पिछले वित्तीय वर्ष के कुल विश्वव्यापी कारोबार का 15 करोड़ रुपये या 4 प्रतिशत तक का जुर्माना लगाया जाएगा.

3. व्यक्ति को पर्सनल डेटा प्राप्त करने, गलत डेटा को सही करने, डेटा मिटाने, डेटा को अपडेट करने और पर्सनल डाटा के डिस्क्लोजर को प्रतिबंधित करने या रोकने का अधिकार प्रदान करता है.

4. डेटा प्रोटेक्शन ऑथिरिटी ऑफ इंडिया नामक एक ऑथिरिटी की स्थापना करने का भी प्रावधान किया गया था.

5. केंद्र सरकार को सरकार की किसी एजेंसी को प्रस्तावित कानून के लागू होने से छूट देने का अधिकार देना.

6. इस कानून के प्रावधानों के तहत लगाए जाने वाले दंड और मुआवजे का फैसला करने के लिए अधिकारी की नियुक्ति करना.

7. किसी भी अपील को सुनने और निपटाने के लिए अपीलेट ट्रिब्यूनल की स्थापना करने और प्रस्तावित कानून के प्रावधानों के उल्लंघन के लिए जुर्माना और दंड लगाने का प्रावधान शामिल है.

क्यों लाना पड़ा था बिल

साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने पर्सनल डेटा को मौलिक अधिकार घोषित किया था. सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को लोगों के पर्सनल डेटा की सुरक्षा के लिए एक बिल लाने के लिए भी कहा था.

इसको देखते हुए सरकार ने साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बीएन श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन किया था. कमिटी ने तब डेटा प्रोटेक्शन बिल का पहला ड्राफ्ट पेश किया था.

क्यों वापस लेना पड़ा बिल?

बिल के तहत सरकार को असीमित अधिकार देने का आरोप लगाते हुए हितधारकों, विपक्षी दलों के सदस्यों, कई गैर-सरकारी संगठनों और कार्यकर्ताओं ने उसका विरोध करते हुए अपनी असहमति जताई थी.

बिल को वापस लेते हुए इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया है कि समिति ने अपनी रिपोर्ट में 81 संशोधनों के सुझाव दिए हैं. इसके अलावा, 12 प्रमुख सुझाव भी दिए गए हैं. ऐसे में नया मसौदा लाना ही पड़ेगा.

उन्होंने कहा कि निजता के सिद्धांतों और सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से किसी भी तरह का समझौता करे बगैर हमने नया मसौदा तैयार किया है. आज हमने संसदीय प्रक्रिया पूरी कर ली और अब जल्द ही हम नया मसौदा मंजूरी के लिए लाएंगे. उम्मीद है कि बजट सत्र तक नया कानून पारित हो जाएगा.

दिग्गज टेक कंपनियों और इंडस्ट्री ने की सराहना

गूगल, मेटा और अमेजन जैसी कंपनियों के अमेरिका स्थित संगठन आईटीआई ने भारत सरकार के विधेयक को वापस लेने के कदम की सराहना की.

आईटीआई के कंट्री मैनेजर (भारत) कुमार दीप ने कहा, ‘‘हमें विश्वास है कि जब रूपरेखा पर परामर्श शुरू होगा तो सरकार सभी विचारों पर गौर करेगी. हम इसमें शामिल होने के लिए उत्सुक हैं.’’

आईटीआई उन वैश्विक उद्योग संगठनों में से एक है जिसने विधेयक के संयुक्त समिति वाले संस्करण का विरोध किया था. करीब एक दर्जन उद्योग संगठनों ने सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र लिखकर कहा था कि प्रस्तावित विधेयक को लागू करने का भारत के कारोबारी माहौल पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और विदेशी निवेश भी कम हो जाएगा.

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