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शहर भर के कबाड़ से शहर को सजा रही हैं बनारस की शिखा शाह

वाराणसी की शिखा शाह ने खूबसूरत स्टार्टअप शुरू किया है, जिसका नाम है स्क्रैपशाला। स्क्रैपशाला की मदद से शिखा काशी के हर घर को संवारने की कर रही हैं एक नायाब कोशिश, आप भी जानें कैसे?

मन्शेष null
2nd May 2017
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कबाड़ से कमाल का एक और बेहतरीन उदाहरण सामने आया है। वाराणसी की शिखा शाह ने खूबसूरत स्टार्टअप शुरू किया है, जिसे नाम दिया है स्क्रैपशाला। ये स्टार्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता अभियान और स्टार्टअप इंडिया से प्रेरित होकर शुरू किया गया है। इसकी मदद से शिखा शहर भर के कबाड़ को इकट्ठा करके उसे सुंदर और अनोखा रूप प्रदान कर रही हैं।

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स्क्रैपशाला की शिखा शाह, फोटो साभार: गूगलa12bc34de56fgmedium"/>

शिखा शाह नगर निगम के कबाड़ से काशी के हर घर को संवारने की कोशिश कर रही हैं। यही नहीं कबाड़ से बनी खूबसूरत और उपयोगी चीजों को काशी से लेकर क्योटो तक और लखनऊ से लेकर लंदन तक फेसबुक, स्नैपडील जैसी साइट्स के जरिए बेच रही हैं।

बनारस में स्क्रैपशाला जैसे अनोखे स्टार्टअप से शहर की तस्वीर बदलने वाली 27 वर्षीय शिखा शाह का कहना है, कि 'मोदी के स्टार्टअप इंडिया के विज़न ने भारत के शहर से लेकर गांव में रहने वालें लोगों की सोच को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है'

शिखा को नेचर से बहुत प्यार है। उन्होंने दिल्ली में एन्वायरमेंटल साइंस से ग्रेजुएशन करने के बाद नौकरी शुरू कर दी थी। नौकरी के दौरान तमाम स्थानों पर कई प्रोजेक्ट्स पर काम के समय उन्होंने एन्वायरमेंट के प्रति लोगों की संवेदनहीनता को देखा। तभी से उन्होंने ठान लिया कि कुछ ऐसा करना है, जिससे व्यापार भी हो सके और ज़रूरतमंदों को नौकरी भी मिल सके, साथ ही अपने स्टार्टअप के माध्यम से समाज को स्वच्छता का संदेश भी दिया जा सके।

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शिखा शाह, फोटो साभार: फेसबुकa12bc34de56fgmedium"/>

सबसे पहले शिखा ने अपने घर के कबाड़ से इस मिशन की शुरूआत की, फिर उसके बाद नगर निगम में आने वाले कबाड़ को लेना शुरू कर दिया और कबाड़ के सामान को कांट-छांटकर खूबसूरत चीजें तैयार करने लगीं।

शिखा ने अच्छी-खासी सैलरी की नौकरी को छोड़कर अपना स्टार्टअप स्क्रैपशाला शुरू किया है। शिखा बताती हैं, कि उन्होंने सबसे पहले अपने घर के कबाड़ से इस मिशन को शुरू किया था। इसके बाद उन्होंने नगर निगम में आने वाले कबाड़ को लेना शुरू किया और कबाड़ के सामान को कांट-छांटकर खूबसूरत चीजें तैयार करने लगीं। इतने सुंदर क्राफ्ट्स, जिन्हें देख कर किसी को भरोसा ही नहीं होता है, कि कबाड़ से भी इतने खूबसूरत और उपयोगी सामान बनाये जा सकते हैं। शिखा का व्यापार अब बढ़ने लगा है। वो अब अपनी वर्कशाप के लिए बड़ी जगह तलाश रही हैं।

स्क्रैपशाला के माध्यम से ज़रूरतमंदों को मिल रहा है रोजगार

शिखा की योजना है कि कबाड़ से बनी चीजों को बाजार उपलब्ध कराने के लिए शहर में तमाम स्थानों पर अपना आउटलेट खोलेंगी। शिखा ये हुनर दूसरों को सैलरी देकर सिखाती हैं। शिखा अपने सपने और समाज को संदेश देने के इरादे में काफी हद तक सफल भी हो चुकी हैं। वे दो साल पहले बिना किसी की मदद के ही नगर निगम के बेकार पड़े कबाड़ को बीस हजार में खरीदकर काशी को सवांरने के साथ ही स्वच्छता का संदेश देने की राह पर अकेले ही निकल पड़ी थीं। आज शिखा के पीछे कारवां सा बनता जा रहा है और उन्होंने अपनी प्रतिभा, लगन और मेहनत से आधा दर्जन से ज्यादा बेरोजगार हुनरमंदों को अपने पैरों पर खड़ा कर दिया है।

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शहर में बना स्क्रैपशाला आज उन लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है, जो अपने घर के कबाड़ को या तो बेच दिया करते हैं या फिर सड़क पर फेंक देते हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि इस कबाड़ से भी लाखों का व्यवसाय किया जा सकता हैं।

शिखा अब ये हुनर और भी कारीगरों को सिखा रही हैं और बाकायदा 15 से 20 हजार रुपये की सैलरी भी दे रही हैं। साथ में काम करने वाले कारीगर भी काफी खुश हैं। उनका कहना है कि यहाँ रोज काम मिल जाता है। ऐसे में परिवार का खर्च चलाना अब आसान हो गया हैं।शहर में बना स्क्रैपशाला आज उन लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है, जो अपने घर के कबाड़ को या तो बेच दिया करते हैं या फिर सड़क पर फेंक देते हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि इस कबाड़ से भी लाखों का व्यवसाय किया जा सकता हैं।

आज के समय में शिखा जैसे युवाओं की जरूरत है, जो अपने भविष्य को चमकाने के साथ-साथ समाज को बेहतर बनाने के रास्ते भी तलाश रही हैं।

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