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न होते हुए ज्यादा उपस्थित रहेंगे कुंवर नारायण

16th Nov 2017
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ख्यात लेखक असद ज़ैदी के शब्दों में कुंवर नारायण का लहजा ऐसे आदमी का लहजा रहा, जिसने बहुत ज़माना देखा। वह अपने तजुर्बे की गहराई, सुलझेपन और अपनी आसानियों से चकित करते रहे और इस राह की दुश्वारियों को ओझल बनाते रहे। 

कुंवर नारायण (फाइल फोटो)

कुंवर नारायण (फाइल फोटो)


उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में 1927 ई. में जन्मे ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कुंवर नारायण पिछली चार जुलाई को मस्तिष्काघात के बाद कोमा में चले गए थे। उन्हें लगातार अस्पताल में भी भर्ती रखा गया था। 

बचपन में ही वे मामा के साथ नालंदा और राजगीर घूमने गए थे। बाद में नालंदा और राजगीर पर कविताएं भी लिखीं। उन्होंने दोबारा जालान संग्रहालय, नालंदा और राजगीर घूमने की इच्छा जाहिर की थी। 

नब्बे वर्ष की उम्र में देश के सुप्रतिष्ठित कवि कुंवर नारायण नहीं रहे। हिंदी साहित्य में उनकी ख्याति पहली बार 'तार सप्तक' के कवि के रूप में हुई। उन्हें बहुलता से मुख्यतः कवि-साहित्यकार के रूप में जाना जाता है लेकिन आज की पीढ़ी के बहुत कम लोगों को पता है कि अस्सी-नब्बे के दशक में वह विश्व सिनेमा पर 'दिनमान', 'सारिका' जैसी पत्रिकाओं के अलावा नवभारत टाइम्स में भी लिखा करते थे। मुख्यतः उनकी टिप्पणियां अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में दिखाई गई फिल्मों पर हुआ करती थीं। उन्होंने उस दौर में, जब न इंटरनेट था, गूगल, पूरी एक पीढ़ी को विश्व सिनेमा से परिचित करवाया।

मीना बुद्धिराजा लिखते हैं- 'बीसवीं सदी मे विश्व सिनेमा के महान और सबसे असाधारण फिल्मकार माइकल एंजेलो एन्तोनिओनी का कथन है कि – 'फिल्मो का जन्म उसी तरह होता है जैसे एक कवि के ह्रदय में कविता का। शब्द, ध्वनियां और विचार – ये सब दिमाग मे उठते है और एक दूसरे मे घुल मिल जाते हैं और एक कविता सामने आती है। मैं यह मानता हूं कि फिल्म के साथ भी यही होता है।'

एन्तोनिओनी को दूसरे महायुद्ध के बाद का सबसे विलक्षण फिल्मकार माना जाता है। उनकी फिल्में आकारों और दृश्यों के बीच आधुनिक मनुष्य के अस्तित्व की एक अनवरत खोज है। उनका सिनेमा मानवीय यथार्थ के अंतहीन त्रास का चित्रण है। इसके लिए उन्होने एक नई फिल्म-भाषा की खोज की, जिसमे रिक्तता और अनुपस्थिति का अपना महत्व है। इसे एक रचनाकार का सिनेमा भी कहा जा सकता है। हिन्दी कविता के वर्तमान परिदृश्य मे वरिष्ठ कवि कुंवरनारायण की एक नितांत अलग तरह की उपस्थिति है। वे विश्व-साहित्य विशेष रुप से विश्व-कविता और विश्व-सिनेमा के गहन अध्येता और जानकार भी रहे। आधी सदी तक सिनेमा पर गंभीर विवेचन और लेखन उन्होंने किया।

कई व्याख्यान भी दिए और बहुत से अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहो में जाकर विश्व-प्रसिद्ध फिल्मकारों की फिल्में देखने और समझने का अवसर मिला।' उन्हीं अनुभवों पर आधारित उन्होंने एक किताब लिखी - ‘लेखक का सिनेमा’। हिन्दी साहित्य, सिनेमा और नई पीढ़ी जो विश्व-सिनेमा में दिलचस्पी रखती है उनके लिए यह पुस्तक एक दस्तावेज के रुप मे महत्वपूर्ण है। सिनेमा देखने का एक नया तरीका जो इन दिनो दुर्लभ है, उसे भी यह किताब प्रस्तावित करती है। यूरोपीय सिनेमा को जानने के अतिरिक्त हिन्दी सिनेमा के अध्ययन विश्लेषण में, एक –विधा के रुप मे सिनेमा की सैद्धान्तिकी को समझने, और नए सिनेमा की संभावनाओं एवं चुनौतियों से रुबरु होने मे यह पुस्तक उन छात्रों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है, जो विश्व-विद्यालयों के नए पाठ्यक्रमों में ‘हिन्दी–सिनेमा’ को एक विषय के रूप मे पढ़ रहे हैं।

जाने माने आधुनिक कवि पंकज चतुर्वेदी बताते हैं कि कुंवर नारायण हिंदी कविता में उस वक्त से रचनारत रहे हैं, जबकि त्रिलोचन और रघुवीर सहाय हमारे बीच नहीं, तो बेशक वह हिन्दी के सबसे बड़े कवि माने जा सकते हैं। मुक्तिबोध ने 1964 में ही उनके महत्त्व को पहचानते हुए लिखा था कि वह 'अंतरात्मा की पीड़ित विवेक-चेतना और जीवन की आलोचना' के कवि हैं। सतत रचनाशीलता के बावजूद कुंवर नारायण को हिन्दी आलोचना में वह सम्मान और शोहरत नहीं मिली, जिसके दरअसल वह हक़दार थे। उलटे, उनकी कविता की सायास उपेक्षा, अवमूल्यन और अन्यथाकरण का प्रकट न सही, पर गुपचुप एक प्रायोजित सिलसिला इस बीच ज़रूर चलता रहा।

इसे अंजाम देनेवाले लोग हिन्दी की विश्वविद्यालयी दुनिया, प्रकाशन-तंत्र और पुरस्कार-तंत्र पर क़ाबिज़ थे। इन्हें कौन नहीं जानता? इन्होंने यह साबित करना और करवाना चाहा कि कुँवर नारायण तो एक ख़ास स्कूल के कवि हैं मगर 1993 में 'कोई दूसरा नहीं' सरीखे एक सौ कविताओं के अनूठे संग्रह के प्रकाशन और 1995 में इसके लिए उन्हें 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार' सहित अनेक सम्मान मिल जाने पर ऐसी कोशिशें अंतिम तौर पर नाकाम हो गईं।

ख्यात लेखक असद ज़ैदी के शब्दों में कुंवर नारायण का लहजा ऐसे आदमी का लहजा रहा, जिसने बहुत ज़माना देखा। वह अपने तजरुबे की गहराई, सुलझेपन और अपनी आसानियों से चकित करते रहे और इस राह की दुश्वारियों को ओझल बनाते रहे। काव्यशास्त्रीय नज़र से देखें तो कह सकते हैं, उनके लहजे ही में सब कुछ रहा। उनको पढ़ते हुए लगता है कि उनका काफ़ी ज़ोर अपने इसी लहजे को साधे रखने और इसी ठाठ को बनाए रखने में सर्फ़ होता- यही उनकी तर्ज़ है। बुफ़ों के शब्दों में : 'द स्टाइल इज़ द मैन'। पर यह कहना असंगत न होगा कि स्टाइलिस्टों से कुलबुलाते काव्य-परिदृश्य में वह एक महत्वपूर्ण स्टाइलिस्ट-भर नहीं। वह मूलतः नैतिक और सामजिक रूप से अत्यन्त सावधान और प्रतिबद्ध कवि थे। हिन्दी के अव्वलीन नागरिक-कवि का कार्यभार और अधिकार अब उन्हीं के पास मिलता है।

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में 1927 ई. में जन्मे ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कुंवर नारायण पिछली चार जुलाई को मस्तिष्काघात के बाद कोमा में चले गए थे। उन्हें लगातार अस्पताल में भी भर्ती रखा गया था। उनका निधन उनके चितरंजन पार्क स्थित घर पर हुआ। उनका अंतिम संस्कार दिल्ली के लोधी शव दाहगृह में किया गया। बिहार से भी उनके गहरे सरोकार रहे। वह 2009 में उदयराज सिंह सम्मान ग्रहण करने जब पटना गए थे तो वहीं सूर्यपुरा हाउस में ठहरे थे। वहां तीन दिन रुके। इस दौरान उन्होंने बताया था कि मेरा बचपन पटना सिटी में बिता था। जालान संग्रहालय के पास उनके मामा का घर था, जहां वे रहते थे।

बचपन में ही वे मामा के साथ नालंदा और राजगीर घूमने गए थे। बाद में नालंदा और राजगीर पर कविताएं भी लिखीं। उन्होंने दोबारा जालान संग्रहालय, नालंदा और राजगीर घूमने की इच्छा जाहिर की थी। अपने भाषण में उन्होंने शिकायती लहजे में कहा था कि यहां हमारे कई साहित्यिक मित्र हैं, पर किसी ने मुझे नहीं बुलाया, जबकि बिहार मुझे हमेशा से आवेशित करता रहा है। उस तीन दिवसीय यात्रा के दौरान उनका एकल काव्य पाठ भी स्काडा बिजनेस सेंटर में आयोजित किया गया था।

अरुण कुमार त्रिपाठी का मानना है कि कुंवर नारायण मूलतः विद्रोह और समन्वय के कवि हैं और यही मानव की मूल दार्शनिक प्रवृत्ति है। इसी भाव में व्यक्ति और उसका संसार चलता है और इसी भाव में एक पीढ़ी और दूसरी पीढ़ी से टकराती है और इसी दार्शनिक भाव के बीच एक व्यवस्था से दूसरी व्यवस्था निकलती है। इसी द्वंद्व के बीच एक सत और असत का निर्धारण होता है और उसी से सच के कई अंधेरे पहलुओं से परदा उठता है और उसके नए रूप प्रकट होते हैं।

कुंवर नारायण का जाना स्वाधीनता संग्राम की उस पीढ़ी का जाना है जिसने इस देश को सिर्फ राजनीतिक स्तर पर ही नहीं, दार्शनिक स्तर पर ढूंढने का प्रयास किया था और बीसवीं सदी के सर्वाधिक चेतनाशील दौर में अपने सपने को आकार दिया था। विचित्र संयोग की बात है कि कुंवर नारायण का जन्म 1927 में उस समय हुआ जब देश अंग्रेजों से मुक्ति का आंदोलन लड़ रहा था और जब वे गए तो देश की बुद्धि और चेतना को कुंठित करने और उसे किसी नेता की डिब्बी में, तो किसी संगठन के ध्वज में, चंद नारों में या कानून की किसी दफाओं में कैद करने का प्रयास चल रहा है। रवींद्र त्रिपाठी सही कहते हैं कि कुंवर नारायण अपनी अनुपस्थिति में हमारे बीच अब अधिक उपस्थित रहेंगे। वे वृहत्तर भारतीयता के कवि थे। अपने लंबे काव्यजीवन में उन्होंने बार बार समकालीनता से मुठभेड़ किया और अपनी पक्षधरता दिखाई। ‘अयोध्या 1992’ कविता की ये पंक्तियां इसका साक्ष्य हैं-

हे राम

जीवन एक कटु यथार्थ है

और तुम एक महाकाव्य…

… अयोध्या इस समय तुम्हारी अयोध्या नहीं

योद्धाओं की लंका है,

‘मानस’ तुम्हारा ‘चरित’ नहीं

चुनाव का डंका है…

… सविनय निवेदन है प्रभु कि लौट जाओ

किसी पुराण- किसी धर्मग्रंथ में

सकुशल सपत्नीक…

अबके जंगल वे जंगल नहीं

जिनमें घूमा करते थे वाल्मीकि!

यह भी पढ़ें: एक जिद्दी कवि, जिसने आत्मसमर्पण नहीं किया!

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