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पहली बार रामविलास की कलम से ख्यात हुई निराला की साधना

हिंदी नवजागरण के अग्रदूत, सुप्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार, विचारक एवं कवि डॉ. रामविलास शर्मा के जन्मदिन पर विशेष...

10th Oct 2017
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हिंदी नवजागरण के अग्रदूत, सुप्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार, विचारक एवं कवि डॉ. रामविलास शर्मा प्रगतिवादी समीक्षा-पद्धति के एक प्रमुख स्तम्भ रहे हैं। आज (10 अक्टूबर) उनका जन्मदिन है। वह थे तो हिंदी के साहित्यकार लेकिन पेशे के दौर पर वह उत्तर प्रदेश के आगरा में आरबीएस कॉलेज के अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष रहे। उसी शहर में उन्होंने कुछ समय तक 'कन्हैयालाल माणिक मुंशी हिन्दी विद्यापीठ' के निदेशक का भी पद भार संभाला।

 निराला जी और रामविलास शर्मा की दुर्लभ तस्वीर

 निराला जी और रामविलास शर्मा की दुर्लभ तस्वीर


अंग्रेज़ों की प्रगतिशीलता पर वह लिखते हैं कि 'अंग्रेज़ उदारपंथियों के आदर्श प्रजातंत्र संयुक्त राज्य अमरीका में ग़ुलामों से खेती कराके बड़ी-बड़ी रियासतें कायम की गई थीं। ग़ुलामों के व्यापार से लाभ उठानेवालों में अंग्रेज़ सौदागर सबसे आगे थे। यह ग़ुलामी प्रथा न तो पूँजीवादी थी, न सामंती थी; समाजशास्त्र के पंडित उसे सामंतवाद से भी पिछड़ी हुई प्रथा मानते हैं ।

रामविलास शर्मा को पहला 'व्यास सम्मान' तो मिला ही, इसके साथ ही हिन्दी अकादमी के प्रथम सर्वोच्च 'शलाका सम्मान' से भी वह समादृत हुए। उनका लेखकीय जीवन जितना चुनौती पूर्ण और अनुकरणीय रहा, निजी घरेलू जीवन भी उतना प्रेरणापरक। 

हिंदी नवजागरण के अग्रदूत, सुप्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार, विचारक एवं कवि डॉ. रामविलास शर्मा प्रगतिवादी समीक्षा-पद्धति के एक प्रमुख स्तम्भ रहे हैं। आज (10 अक्टूबर) उनका जन्मदिन है। वह थे तो हिंदी के साहित्यकार लेकिन पेशे के दौर पर वह उत्तर प्रदेश के आगरा में आरबीएस कॉलेज के अंग्रेज़ी विभागाध्यक्ष रहे। उसी शहर में उन्होंने कुछ समय तक 'कन्हैयालाल माणिक मुंशी हिन्दी विद्यापीठ' के निदेशक का भी पद भार संभाला। उनका जन्म उन्नाव (उ.प्र.) के ग्राम उच्चगाँव सानी में हुआ था। अंग्रेज़ों की प्रगतिशीलता पर वह लिखते हैं कि 'अंग्रेज़ उदारपंथियों के आदर्श प्रजातंत्र संयुक्त राज्य अमरीका में ग़ुलामों से खेती कराके बड़ी-बड़ी रियासतें कायम की गई थीं। ग़ुलामों के व्यापार से लाभ उठानेवालों में अंग्रेज़ सौदागर सबसे आगे थे। यह ग़ुलामी प्रथा न तो पूँजीवादी थी, न सामंती थी; समाजशास्त्र के पंडित उसे सामंतवाद से भी पिछड़ी हुई प्रथा मानते हैं । इस प्रथा का विकास और प्रसार करके अंग्रेज़ सौदागरों ने कौन-सा प्रगतिशील काम किया, कहना कठिन है।' 

रामविलास शर्मा को पहला 'व्यास सम्मान' तो मिला ही, इसके साथ ही हिन्दी अकादमी के प्रथम सर्वोच्च 'शलाका सम्मान' से भी वह समादृत हुए। उनका लेखकीय जीवन जितना चुनौती पूर्ण और अनुकरणीय रहा, निजी घरेलू जीवन भी उतना प्रेरणापरक। वह कठिनतर साहित्य सृजन, अध्यापन के साथ ही घर में चारपाई पर पड़ी रहीं अपनी रुग्ण धर्मपत्नी का एक कुशल सेविका की तरह आजीवन सेवा-सुश्रुषा का गुरुतर दायित्व भी एक-अकेले स्वयं ही निभाते रहे।

रामविलास शर्मा ने यद्यपि कविताएँ तो ज्यादा नहीं लिखीं, लेकिन हिन्दी के प्रयोगवादी काव्य-आन्दोलन के साथ वह अविछिन्न तौर पर जुड़े रहे। 'अज्ञेय' द्वारा सम्पादित 'तारसप्तक' में भी उनकी कविताएं संकलित हुईं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद और प्रो. नामवर सिंह से पहले, डॉ. रामविलास शर्मा ही हिंदी साहित्य के ऐसे स्थापित आलोचक माने जाते हैं, जिन्होंने अन्य आलोचकों की तरह किसी रचनाकार का मूल्यांकन केवल लेखकीय कौशल जाँचने के लिए नहीं किया, बल्कि भाषा, साहित्य और समाज तीनो को एक साथ रखकर मूल्यांकन किया। उन्होंने एक सौ से अधिक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक कृतियां लिखीं, जिनमें ‘निराला की साहित्य साधना’ ने हिंदी साहित्य जगत में धूम मचा दी। 

तीन खंडों में प्रकाशित इसी आलोचनात्मक कृति के प्रकाश में आने के बाद निराला जी को लेकर पूरा हिंदी जगत गंभीर हुआ। इसके अलावा ‘गाँधी, आंबेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएँ’, ‘भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश’, ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नव-जागरण’, ‘पश्चिमी एशिया और ऋग्वेयद’, ‘भारत में अँग्रेजी राज्य और मार्क्सवाद’, ‘भारतीय साहित्य और हिन्दी जाति के साहित्य की अवधारणा’, ‘भारतेंदु युग’, ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी’ आदि उनकी अन्य कालजयी कृतियां रही हैं।

'रामविलास शर्मा का प्रतिऔपनिवेशिक चिंतन' सविस्तार रेखांकित करते हुए रूपेश कुमार लिखते हैं- डॉ रामविलास शर्मा का रचना संसार अत्यंत विस्तृत है। उन्होंने इतिहास, भाषा विज्ञान सहित साहित्य की विभिन्न विधाओं पर अपनी लेखनी चलाई तथा कई पुस्तकों का अनुवाद भी किया। वे मूलतः मार्क्सवादी लेखक हैं, इसीलिए सामंतवाद विरोधी तथा जनवादी विचारधारा उनके संपूर्ण चिंतन का केंद्र है। मार्क्सवादी होते हुए भी वे इतिहास एवं साहित्य को परखने के लिए परंपरा के प्रगतिशील तत्वों तथा प्रतिऔपनिवेशिक दृष्टि का सहारा लेते हैं। इस दृष्टि को केंद्र में रख कर वे एक ओर यूरो-केंद्रित इतिहास-दृष्टि का खंडन करते हैं तो दूसरी ओर इतिहास एवं साहित्य को देखने की विशुद्ध भारतीय दृष्टि देते हैं, साथ ही साथ साहित्य, राजनीति और इतिहास में आए परिवर्तन को लक्षित करते हुए राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के प्रवाह को रेखांकित करते हैं। हिंदुस्तान का प्रारंभिक इतिहास विदेशियों द्वारा लिखा गया और इन लोगों ने भारतीय इतिहास और ऐतिहासिक दृष्टिकोण को अनदेखा किया। 

विशेष रूप से अपने औपनिवेशिक हित के कारण अंग्रेज भारतीय धार्मिक ग्रंथों, दंतकथाओं, पौराणिक ग्रंथों आदि में उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों के साथ न्याय नहीं कर सके, क्योंकि वे प्रत्येक दृष्टि से भारत में अपनी औपनिवेशिकता को उचित ठहराना चाहते थे और इसके लिए भारतीय इतिहास तथा साहित्य को हीन साबित करना उन्हें जरूरी लगता था। चूँकि किसी भी देश के निवासियों का ऊर्जा स्रोत उसकी परंपराओं और गौरवशाली इतिहास में होता है, इसलिए उपनिवेशवादी अंग्रेज लेखक भारत के इतिहास और साहित्य को नकार कर अपनी सत्ता के खिलाफ भविष्य में होनेवाले विरोध से भी निजात पाना चाहते थे। इन पूर्वाग्रहों के कारण अग्रेजों द्वारा लिखा गया भारत का साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक जो भी इतिहास है, वह एकांगी और भ्रम पैदा करनेवाला है। आज अल्पसंख्यक, दलित और स्त्री अपने नजरिए से इतिहास लिख रहे हैं, किंतु इतिहास की व्याख्या इन पूर्वाग्रहों की अपेक्षा नही रखती।

'डॉ रामविलास शर्मा का लेखन काफी हद तक ऐसे पूर्वाग्रहों से मुक्त है। इन्होंने इतिहास को समझने की जो दृष्टि दी, वह अल्पसंख्यक, दलित और स्त्री के नजरिए से तो इतिहास को परखती ही है, साथ ही साम्राज्यवादी यूरो-केंद्रित इतिहास-दृष्टि का खंडन भी करती है। रामविलास जी इस बात पर आश्चर्य प्रकट करते हैं कि पता नहीं कैसे लोग औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी दृष्टिकोण से लिखे गए इतिहास पर विश्वास करते हैं? इसके लिए वे अशिक्षा को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखते हैं, “अग्रेजी राज ने यहाँ शिक्षण व्यवस्था को मिटाया, हिंदुस्तानियों से एक रुपए ऐंठा तो उसमें से छदाम शिक्षा पर खर्च किया। उस पर भी अनेक इतिहासकार अंग्रेजों पर बलि-बलि जाते हैं।"

ये भी पढ़ें: कविता को अब नए प्रतिमान का इंतजार

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