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'राशि आनंद' का ‘लक्ष्यम’, शिक्षा और विकास से सामाजिक कुरीतियों का हो खात्मा

Pooja Goel
9th Nov 2015
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‘‘मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मैं अपनी माँ के रास्ते पर चलूंगी लेकिन देखिये अब मैं ऐसा ही कर रही हूँ।’’ यह कहना है वंचित समुदाय के लोगों के कल्याण के लिये समर्पित एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) ‘लक्ष्यम’ की संस्थापक राशि आनंद का।

राशि वंचितों का जीवनस्तर सुधारते हुए उनके जीवन को बेहतर करने के प्रयासों में अपना जीवन समर्पित कर देने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता रूपी माँ को देखते हुए बड़ी हुईं। राशि ने बहुत नजदीकी से देखा कि जीवन समाज के कुछ वर्गों के साथ कितना क्रूर हो सकता है और इसके अलावा उन्होंने यह भी जाना कि समाज के विभिन्न तबकों के बीच कितनी भारी असामनता है। और बस वहीं से कहीं न कहीं उन्होंने भी अपने लिये इसी रास्ते का चुनाव कर लिया था।

लक्ष्यम

राशि कहती हैं, ‘‘मैं आॅटो से काॅलेज जाने के दौरान रास्ते में पड़ने वाली लाल बत्तियों पर उलझे हुए बालों वाले मैले-कुचैले बच्चों को रुकी हुई गाडि़यों के इर्द-गिर्द चक्कर काटते हुए देखती। इसके अलावा बत्ती के हरे हो जाने पर वही बच्चे आसपास प्लास्टिक की बोतलों इत्यादि से खेलने में जुट जाते।’’ राशि रोजाना ही बच्चों को ऐसे अपना समय बेकार करते हुए देखतीं और एक दिन उन्होंने लोगों के घरों से पुराने खिलौने इत्यादि एकत्रित करके इन बच्चों के बीच वितरित करने का निर्णय लिया। समय के साथ राशि इस काम में अधिक लिप्त होती गईं और उन्होंने ‘लक्ष्यम’ के नाम से एक एनजीओ की स्थापना की।

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रांची में, जहां उनका लालन-पालन हुआ है, उनकी माँ के संगठन का नाम ‘लक्ष्य’ है। राशि कहती हैं, ‘‘चूंकि मेरी माँ ही मेरी आदर्श और मार्गदर्शक हैं इसलिये मैंने अपनी संस्था का नाम ‘लक्ष्यम’ रखा। हालांकि मुझे इस बात का विश्वास है कि कोई अन्य शब्द मेरे कार्य को इससे बेहतर तरीके से परिभाषित कर सकता है। लक्ष्य यानि कि मंजिल। मेरे लिये यह शाश्वत संघर्ष और बेहतर दुनिया की ओर कदम बढ़ाने के प्रयास का एक प्रतीक है। एक जीवनपर्यंत लक्ष्य।’’

राशि ने समाज के सबसे निचले तबके में रहने वाले लोगों के सामने आने वाली चुनौतियों और समस्याओं के बारे में जानने के लिये दिल्ली की कई बस्तियों का सर्वेक्षण किया।

महिलाओं और बच्चों पर किया ध्यान केंद्रित

अपने बाल विकास कार्यक्रमों के तहत लक्ष्यम ने बच्चों के भावनात्मक और शैक्षिक विकास को प्राप्त करने के उद्देश्य से दो समग्र प्रयासों की पहल की है।

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बटरफ्लाईः बच्चों को सिर्फ शैक्षिक स्तर पर ही काबिल करने के अलावा उन्हें स्वास्थ्य और स्वच्छता के क्षेत्र में जागरुक करने के उद्देश्य के साथ बटरफ्लाई का जन्म हुआ। इनका शीर्षक ‘बटरफ्लाई’ तितली के पंखों के माध्यम से आजादी को परिलक्षित करता है और इस प्रकार से यह जीने की स्वतंत्रता के साथ शिक्षा के साथ संबंध स्थापित करता है। राशि कहती हैं कि उनकी टीम के लिये एक शब्द के रूप में ‘शिक्षा’ के मायने हर संभव तरीके से जीवन स्तर को ऊपर उठाने के संभावित पहलू को समझना है। शिक्षा से इनका मतलब स्वास्थ्य, पानी, स्वच्छता, शिक्षा और जीवन के बारे में सबकुछ है। इसके अलावा चित्रकारी, संगीत, नृत्य, अभिनय, ध्यान, इत्यादि जैसी अनेक गतिविधियां भी शामिल हैं। कोई भी बच्चा जो एक निश्चित कला को सीखना चाहता है वह प्रशिक्षित शिक्षकों से इन्हें सीख सकता है। लक्ष्यम ने औपचारिक रूप से अपनाई हुई बस्तियों में अपने विशेष स्कूल शुरू किये हैं जिनमें इन बच्चों के भीतर औपचारिक स्कूली शिक्षा न मिलने के कारण पैदा हुए अंतर को पाटने का प्रयास किया जाता है। साथ ही ये विभिन्न कार्यशालाओं और कक्षाओं के माध्यम से इन बच्चों को उनकी और उनके परिवारों की जीवनशैली को बदलकर स्वस्थ और सुरक्षित बनाने के तरीकों से भी रूबरू करवाते हैं।

टाॅय लाईब्रेरीः लक्ष्यम ने वर्ष 2004 में दिल्ली में देश की पहली टाॅय लाईब्रेरी की स्थापना की। खिलौने हर बच्चे के बचपन की नींव डालने में महत्वपूर्ण कारक होते हैं और कुछ बच्चे इनकी झलक तक से महरूम रहते हैं। राशि ने इसी समर्थन और भावनात्मक लगाव पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए लक्ष्यम की दिशा में अपना पहला कदम बढ़ाया। उनकी यह टाॅय लाईब्रेरी सफलता के नए आयाम स्थापित करने में सफल रही और अब यह लक्ष्यम के प्रत्येक केंद्र का एक अभिन्न हिस्सा है।

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रूहः लक्ष्यम का यह महिला सशक्तीकरण कार्यक्रम स्वास्थ्य और स्वच्छता के लिये कार्यशालाओं के जरिये महिलाओं को विभिन्न मार्केटिंग कौशल सिखाता है। इस प्रकार से ये उन्हें इस पुरुष प्रधान और बेहद पिछड़ी हुई मानसिकता वाले समाज में अपने हितों और अधिकारों की रक्षा के लिये प्रेरित और जागरुक भी करता है।

लक्ष्यम की नवीतनम पहल ‘अभ्यास’ बेकार और पुराने कागजों की रीसाईक्लिंग करने के साथ-साथ लक्ष्यम के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को निःशुल्क काॅपियों का भी वितरण करता है।

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इन सभी कार्यक्रमों और अभियानों का सामूहिक प्रभाव बेहद अभूतपूर्व रहा है। अबतक लक्ष्यम देशभर में करीब 21 हजार लोगों के जीवनस्तर को सुधारने में मददगार रहने में कामयाब रहा है।

क्रियशीलता, धन और सहयोग

लक्ष्यम दिल्ली के कौशाम्बी में अपने प्रधान कार्यालय से संचालित हो रहा है और फिलहाल देश के 11 राज्यों में कार्य कर रहा है। प्रत्येक केंद्र का अपना एक व्यवस्थापक है जो उस केंद्र के प्रबंधन के लिये जिम्मेदार होने के अलावा योजनाओं का निष्पादन राशि के मार्गदर्शन और निर्देशों के आधार पर करने के लिये उत्तरदायी है।

यह संस्थान पूरी तरह से व्यक्तिगत धन पर निर्भर है। फिलहाल तक ये किसी भी काॅर्पोरेट संगठन या सरकारी निकाय से किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता नहीं ले रहे हैं। कर्मचारियों की तनख्वाह इनके संचालन के बजट का ही एक हिस्सा हैं। राशि बताती हैं कि वे बेहद सीमित संसाधनों में संचालन कर रही हैं और इतने कम धन के साथ तमाम पहल का संचालन करना काफी कठिन होता है। वे कहती हैं, ‘‘इसके अलावा प्रचार के काम में हमारा काफी धन खर्च हो जाता है जिसके चलते कई बार हम अपेक्षित परिणाम पाने से चूक जाते हैं।’’ फिलहाल लक्ष्यम को 15 कर्मचारियों की एक टीम संचालित कर रही है।

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लक्ष्यम के पास सहयोगी संगठनों का एक मजबूत आधार मौजूद है। मैनफोर्ड, अशोका चेंजमेकर्स, सेफएक्स्प्रेस, जुवालिया एंड यू, क्राफ्यूजन, हैंगआउट, आईआईटी दिल्ली, ई-बे, बुक याॅर ड्रीम स्टोर और सीएएफ जैसे संस्थान लक्ष्यम के साथ जुड़े हुए हैं।

पुरस्कार

वर्ष 2015 में ‘सामाजिक कार्यों के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन’ के लिये इन्हें शख्सियत अवार्ड 2015 से नवाजा गया। वर्ष 2014 में यूटीवी बिंदास ‘बी फाॅर चेंज’ ने भारत के 4 चेंजमेकर्स का चुनाव किया जिनमें से एक राशि भी हैं। इसी वर्ष राशि जीटीएम हाॅलिस्टिक अवार्डस में ‘वोमेन आॅफ विजन’ का खिताब जीतने में सफल रहीं। वर्ष 2013 में नवरत्न फाउंडेशन ने उन्हें युवा सामाजिक कार्यकर्ता के लिये ‘नारी सशक्तीकरण पुरस्कार’ से नवाजा। वर्ष 2012 में बीबीसी ने लक्ष्यम को कवर किया। ये उन पुरस्कारों की सूचि में से कुछ हैं जो अबतक राशि और लक्ष्यम को मिल चुके हैं।

चुनौतियां और भविष्य की राहें

राशि का कहना है कि जब बात सामाजिक कार्य करने की हो तो शिक्षा की अवधारणा के बारे में बच्चों के माता-पिता को समझाना पहली और सबसे बड़ी चुनौती है। चूंकि इनमें से अधिकतर परिवार शिक्षा के लाभ से अनजान होते हैं इसलिये इन्हें बच्चों को स्कूल भेजने के लिये राजी करना काफी मुश्किल होता है। इनके बीच विश्वास की इसी कमी के चलते बच्चे भी स्कूल जाने के प्रति कम जागरुक और प्रेरित होते हैं।

राशि अपना सपना साझा करते हुए कहती हैं, ‘‘मेरा सबसे बड़ा सपना इस दुनिया को उस प्रकार से देखना है जैसी मैंने उसकी कल्पना की है। मैं सिर्फ महिला सशक्तीकरण या बाल कल्याण तक खुद को सीमित नहीं करना चाहती बल्कि मैं कुछ ऐसा करना चाहती हूँ कि इस दुनिया में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने सामने आने वाली तमाम परेशानियों से लड़ने के लिये आवश्यक सभी हथियारों से लैस हो। और मेरा मानना है कि शिक्षा और समग्र विकास वह इकलौता हथियार है। सिर्फ शिक्षा ही यौन भेदभाव से लेकर आतंकवाद जैसी सामाजिक कुरीतियों से संबंधित सामाजिक अवधारणाओं के खात्मे में कारगर है।’’


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