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पाठकों के दरवाजे पर चलती-फिरती लाइब्रेरियां

22nd Oct 2018
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आजकल भारत समेत दुनिया के विभिन्न देशों में, कहीं लड़ाकू टैंक के भीतर, कहीं कंटेनर, कहीं मारुति कार, तो कहीं गधों पर चलती-फिरती लाइब्रेरियां सक्रिय हैं, ताकि किताबें लोगों का सबसे विश्वसनीय दोस्त बनें। अभी गत 15 अक्तूबर को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती पर मध्य रेलवे ने दो इंटरसिटी ट्रेनों में चलती-फिरती 'लाइब्रेरी ऑन व्हील्स' की शुरुआत की है।

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


हमारे देश में व्यक्तिगत प्रयासों से पिछले कुछ वर्षों में चलती-फिरती लाइब्रेरियों का नया सिलसिला चल पड़ा है। बरेली में गरीब छात्र-छात्राओं, पाठकों की राह आसान करने के लिए एक मारुति कार में सचल लाइब्रेरी खोली गई है। इसे भी 'बुक ऑन व्हील्स' नाम दिया गया है। 

आधुनिक सार्वजनिक पुस्तकालयों का विकास वास्तव में प्रजातंत्र की महान देन है। यूनेस्को और भारत सरकार के संयुक्त प्रयास से स्थापित दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी का उद्घाटन प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 27 अक्टूबर 1951 को किया था। सन् 1836 में राष्ट्रीय पुस्तकालय की स्थापना कोलकाता में हुई थी। पुस्तकालय वह स्थान है, जहाँ विविध प्रकार के ज्ञान, सूचनाओं, स्रोतों, सेवाओं आदि का संग्रहण होता है। पुस्तकालय अंग्रेजी के 'लाइब्रेरी' शब्द का अनुवाद है। पुस्तकालय का इतिहास पुस्तकों और दस्तावेजों को संरक्षित रखने की पद्धतियों और प्रणालियों से जुड़ा है। सन् 1713 में अमरीका के फिलाडेलफिया नगर में सबसे पहले चंदे से चलनेवाले एक सार्वजनिक पुस्तकालय की स्थापना हुई थी।

लाइब्रेरी ऑव कांग्रेस अमरीका का सबसे बड़ा पुस्तकालय है। इसकी स्थापना वाशिंगटन में सन् 1800 में हुई थी। इसमें ग्रंथों की संख्या साढ़े तीन करोड़ है। पुस्तकालय में लगभग 2,400 कर्मचारी काम करते हैं। आधुनिक वेब संसाधनों के बहुप्रसारित होने के बावजूद हमारे देश में भी पुस्तकों के प्रति लोक जीवन में आकर्षण कम नहीं हुआ है। पिछले कुछ वर्षों से सीधे पाठकों के दरवाजे तक पहुंचने के लिए सचल-मोबाइल लाइब्रेरियों का चलन बढ़ता जा रहा है। अभी गत 15 अक्तूबर को पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की जयंती पर रेल मंत्रालय और महाराष्ट्र सरकार की संयुक्त पहल से मध्य रेलवे ने मुंबई और पुणे/मनमाड के बीच चलने वाली दो इंटरसिटी एक्सप्रेस गाड़ियों में चलती-फिरती 'लाइब्रेरी ऑन व्हील्स' की शुरुआत की है। चलती ट्रेन में चाय की चुस्कियों के साथ कंबल ओढ़कर मनपसंद किताबें पढ़ने का मजा ही कुछ और होता है। उत्तर रेलवे भी बोगियों में यात्रियों के लिए खाने-पीने के साथ पढ़ने के बंदोबस्त का हमराही है।

हमारे देश में व्यक्तिगत प्रयासों से पिछले कुछ वर्षों में चलती-फिरती लाइब्रेरियों का नया सिलसिला चल पड़ा है। बरेली में गरीब छात्र-छात्राओं, पाठकों की राह आसान करने के लिए एक मारुति कार में सचल लाइब्रेरी खोली गई है। इसे भी 'बुक ऑन व्हील्स' नाम दिया गया है। इसके संस्थापक हैं रुहेलखंड यूनिवर्सिटी के गेस्ट लेक्चरार नवनीत कुमार कहते हैं - 'आम तौर पर मोबाइल-कंप्यूटर में व्यस्त युवाओं को अध्ययन के प्रति जागरूक न होने की चिंता ने इस मुहिम को जन्म दिया। पाठकों को किताबें पढ़ते वक्त कोई परेशानी न हो, इसको ध्यान में रखते हुए वे स्टूल भी साथ-साथ लेकर जाते हैं। रांची (झारखंड) में एनजीओ 'बाल भवन' के अध्यक्ष और सिटीजन फाउंडेशन के सचिव गणेश रेड्डी बच्चों के लिए अपनी किस्म की मोबाइल लाइब्रेरी की पहल कर चुके हैं। महिंद्रा गाड़ी को लाइब्रेरी का रूप दिया गया है, जिसमें किताबों के लिए सात रैक हैं, जिनमें लगभग 3,500 किताबों को रखा जा सकता है।

कोलकाता में बोई गाड़ी (साइकिल) पर पुस्तकें रखकर हर हफ्ते ग्रामीण इलाकों में कुछ लोग बच्चों के बीच पहुंचते हैं। पंजाब में ही अप्रवासी भारतीय जसवंत सिंह ने 2005 में चार गांवों के लोगों, खासकर बच्चों के लिए मोबाइल लाइब्रेरी शुरुआत की थी। रोहतक (हरियाणा) के सत्यवीर शास्त्री का अपना अलग ‘चलता-फिरता पुस्तकालय’ है। उन्होंने दर्जी से दर्जन जेबों वाला कुर्ता सिलवा रखा है, जिनमें एक साथ वह 25-30 किताबें रख लेते हैं। शुरुआत में जब वह ये कुर्ता पहन कर ट्रेनों में निकले तो लोग उनका मजाक उड़ाने लगे लेकिन धीरे-धीरे रेलयात्री उनकी ओर आकर्षित होने लगे। जैसलमेर (राजस्थान) में पोकरण फायरिंग रेंज के पास डेढ़ हजार की आबादी वाले गांव भादरिया में संत हरिवंश सिंह निर्मल ने एक अंडरग्राउंड लाइब्रेरी बनवाई है। इसमें 562 शेल्‍फ हैं। इसमें करीब चार हजार लोग एक साथ बैठकर पढ़ सकते हैं। हर शेल्‍फ के ऊपर सजावटी लैंप हैं। लाइब्रेरी के रख-रखाव पर हर साल लाखों रुपए का खर्चा आता है। लाइब्रेरी में हर विषय की पुस्‍तकें मिल जाती हैं। इसे जगदंबा सेवा समिति चलाती है। यहां हर साल कम से कम साठ हजार पर्यटक और शोधार्थी पहुंचते हैं।

भारत ही नहीं, पूरे विश्व में पुस्तकों का आकर्षण बरकरार है। बात 31 जुलाई 2011 की है, जब किताबों से लदा-फदा विश्व का सबसे बड़ा चलता-फिरता पोत एमवी लोगोस होप विशाखापत्तन पहुंचा था। शहर के ओल्ड टाउन इलाके के विशाखा कंटेनर टर्मिनल पर इसने लंगर डाल दिया। पोत संयोजक कैथरीन विल्सन के मुताबिक इस पोत पर करीब पांच हजार किताबें पाठकों को पढ़ने के लिए उपलब्ध कराई गईं। आज आतंकवाद से जूझ रहे अफगानिस्तान के खराब हालात से सबसे ज्यादा बच्चों की शिक्षा पर असर पड़ा है। ऐसे में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट पचीस वर्षीय फ्रेश्ता करीम यहां अपने तीन दोस्तों की मदद से एक चलती-फिरती लाइब्रेरी चला रही हैं। फ्रेशता बताती हैं कि बचपन में उनकों कहानी की किताबों ललचाती थीं। वह रोजाना बस पर सवार होकर राजधानी काबुल में घूमती हैं और बच्चों को बस में बनी इस लाइब्रेरी में किताबें पढ़ने का मौका देती हैं। बच्चों को आकर्षित करने के लिए उनकी बस लाइब्रेरी पर सितारे और गुब्बारे भी लगे होते हैं। खिड़की पर बुकशेल्फ लगाए गए हैं। अंदर बच्चों के बैठने के लिए मेज, कुर्सियां भी बिछी रहती हैं। जापान में टोक्यो के शिनजुकु की बुक एंड बेड लाइब्रेरी है। इस लाइब्रेरी में करीब 10 हज़ार किताबें हैं। इस पुस्तकालय में पाठकों के लिए सोफे रखे हुए हैं। नियमित पाठकों के लिए छोटे-छोटे केबिन बने हुए हैं। पाठक यहां पढ़ते-पढ़ते सो भी सकता है। पहली बार नंवबर 2016 में इसकी स्थापना हुई थी। आज इसकी पांच ब्रांच और खुल चुकी हैं।

कोलंबिया में 1990 के दशक से लुईस सोरियानो अल्फा और बेतो नाम के दो गधों पर 'बिलियोबुरो' नाम से चलती-फिरती लाइब्रेरी संचालित कर रहे हैं। सोरियानो चाहते थे कि हर घर का बच्चा किताबें पढ़े। वह बचपन से ही किताबों को लेकर रोमांचित रहते थे। स्पेनिश लिटरेचर में डिग्री लेने के बाद वह प्राइमरी स्कूल में टीचर हो गए लेकिन किताबों को घर-घर तक पहुंचाने का सपना देखते रहे। कोलंबिया में कार से चलना मुश्किल होता है, लिहाजा उन्होंने दो गधे खरीदे और घर-घर जाकर किताबें पढ़वाने लगे। अब तो उन्होंने अपने गृह-क्षेत्र में एक पक्की लाइब्रेरी भी बनवा दी है, जिसमें 4800 किताबें हैं। वह दोनो गधों पर एक साथ लगभग डेढ़ सौ किताबें लाद लेते हैं। उनकी ये लाइब्रेरी कोलंबिया के गांव-गांव घूमती रहती है। इसी तरह नीदरलैंड में 'बाइब बस' नाम से एक सचल लाइब्रेरी छोटे से कंटेनर में पाठकों तक पहुंच रही है। इसमें बच्चों के लिए खेल के साथ किताबें पढ़ने की व्यवस्था है।

इसी तरह नाइजीरिया की राजधानी लाओस और इसके आसपास फुनमी इलोरी की 'आईरीड' नाम से चलती-फिलती लाइब्रेरी बच्चों से घिरी रहती है। फुनमी शुरू में दो टोकरियों में किताबें लेकर लोगों के पास जाते थे। धीरे-धीरे उनका तरीका लोकप्रिय होने लगा। अब उनके पास चार मिनी बसें हैं। उनकी ये मोबाइल लाइब्रेरी एक सप्ताह में कुल 44 स्टॉप पर खड़ी होती है। इस लाइब्रेरी के पास कुल 13 हजार किताबें हैं। इसी तरह रोमानिया की लोकल बसों में सचल लाइब्रेरी का एक अद्भुत प्रयोग चल रहा है। जो भी यात्री सफर के दौरान किताबें पढ़ेगा, उसका किराया माफ। अर्जेंटीना के कलाकार राउल लेमोशोफ रोचक तरीके से लोगों को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। राउल ने एक लड़ाकू टैंक को ‘जन शिक्षा का हथियार’ नाम से लाइब्रेरी बना रखा है। इसमें एक साथ करीब नौ सौ किताबें आ जाती हैं। लेमोशोफ इस टैंक के साथ अर्जेंटीना की सड़कों पर निकल जाते हैं और लोगों को फ्री किताबें देते हैं।

यह भी पढे़ं: घरों में काम करने वाली कमला कैसे बन गई डिजाइनर की खूबसूरत मॉडल

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