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मौत सामने थी लेकिन मधुबाला अपनी ज़बान से पीछे नहीं हटीं

24th May 2017
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ढाई इंच की मुस्कान वाली एक लड़की, जिसकी खूबसूरत ऐसी कि फूल भी मात खा जाये... चमक ऐसी की चंद्रमा भी फीका पड़ जाये... अदाकारी में सबकी मल्लिका मधुबाला भारतीय सिनेमा का ध्रुवतारा हैं, जो अपने भीड़ भरे आकाश में हमेशा चमकता रहेगा। छोटी-सी जिंदगी में मधुबाला ने अनेकों यादगार फिल्में दीं और अपने चाहने वालों के दिलों में अनंतजीवी हो उठीं, लेकिन क्या आपको मालूम है, कि ये बला की खूबसूरत लड़की बला की बहादुर भी थी...?

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मुग़ल-ए-आज़म की अनारकली 'मधुबाला'a12bc34de56fgmedium"/>

मधुबाला का असली नाम मुमताज बेगम देहलवी था। उनके पिता अताउल्लाह खान रिक्शा चलाया करते थे। जब मधुबाला छोटी थीं, तो उनके पिता की मुलाकात एक भविष्यवक्ता कश्मीर वाले बाबा से हुई। बाबा ने भविष्यवाणी की, कि मधुबाला बड़ी होकर बहुत शोहरत पाएगी। इस भविष्यवाणी को अताउल्लाह खान ने गंभीरता से लिया और वे मधुबाला को लेकर मुंबई आ गए।

मधुबाला भारतीय सिनेमा का ध्रुवतारा हैं, जो हमेशा हमेशा चमकता रहेगा। अपनी छोटी-सी जिंदगी में मधुबाला ने अनेकों यादगार फिल्में दी हैं। फिल्म निर्देशक मधुबाला को अपनी फिल्म में लेने के लिए लालायित रहते थे। लेकिन 50 के दशक में स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान मधुबाला को पता चला, कि वे हृदय की बीमारी से ग्रसित हो चुकी है। मधुबाला को लगा कि यदि उनकी बीमारी के बारे में फिल्म इंडस्ट्री को पता चल जायेगा तो इससे फिल्म निर्माताओं को काफी नुकसान होगा, इसलिए उन्होंने ये बात किसी को नहीं बताई। उनकी हालत बद से बदतर होती जा रही थी, लेकिन वे लोगों को किए अपने वादे से पीछे नहीं हटीं। वो अपनी साइन की हुई सारी फिल्में पूरी करती रहीं।

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मधुबाला का असली नाम मुमताज बेगम देहलवी था। उनका जन्म दिल्ली में 14 फरवरी 1933 को हुआ था। उनके पिता अताउल्लाह खान रिक्शा चलाया करते थे, तभी उनकी मुलाकात एक भविष्यवक्ता कश्मीर वाले बाबा से हुई। उन्होंने भविष्यवाणी की कि मधुबाला बड़ी होकर बहुत शोहरत पाएगी। इस भविष्यवाणी को अताउल्लाह खान ने गंभीरता से लिया और वे मधुबाला को लेकर मुंबई आ गये। 1942 में मधुबाला ने बतौर बाल कलाकार 'बेबी मुमताज' के नाम से काम करना शुरू कर दिया।

मधुबाला के शरीर में आवश्यक मात्रा से ज्यादा खून बनने लगता था और ये खून उनकी नाक और मुंह से बाहर आता था। खून तब तक निकलता रहता, जब तक कि उसे शरीर से ना निकाल दिया जाए। एक वक्त ऐसा भी आया, जब मधुबाला का सांस लेना दूभर हो गया।

एक्टिंग के लिए मधुबाला की प्रतिबद्धता

1958-59 में मधुबाला के. आसिफ की फिल्म 'मुगल-ए-आज़म' की शूटिंग में व्यस्त थीं। मधुबाला की तबीयत काफी खराब रहा करती थी। मधुबाला वैसे तो घर में उबले पानी के सिवाय कुछ नहीं पीती थीं। लेकिन उन्हें जैसमेलर के रेगिस्तान में कुएं और पोखरे का गंदा पानी तक पीना पड़ता था। अनारकली के किरदार के लिए मधुबाला के शरीर पर असली लोहे की जंजीर भी लादी गई लेकिन उन्होंने उफ्फ तक नहीं की और फिल्म की शूटिंग जारी रखी। मधुबाला का मानना था कि अनारकली के किरदार को निभाने का मौका बार-बार नहीं मिलता। मधुबाला के ना सिर्फ दिल में छेद था, बल्कि फेफड़ों में भी परेशानी थी। इसके अलावा उन्हें एक और गंभीर बीमारी थी, जिसमें उनके शरीर में आवश्यक मात्रा से ज्यादा खून बनने लगता था और ये खून उनकी नाक और मुंह से बाहर आता था। ये खून तब तक निकलता रहता जब तक कि उसे शरीर से ना निकाल दिया जाए। एक वक्त ऐसा भी आया जब मधुबाला का सांस लेना दूभर हो गया और हर चार घंटे में उन्हें ऑक्सीजन देनी पड़ती थी।

इलाज के लिए मधुबाला जब लंदन पहुंचीं, तो डॉक्टरों ने ये कहकर सर्जरी करने से इन्कार कर दिया कि उनके जीवन का मात्र एक वर्ष शेष है, लेकिन मज़बूत इरादों वाली ये अदाकारा 9 और वर्षों तक हिन्दी सिनेमा के दर्शकों का मनोरंजन करती रहीं।

एक वक्त पर जिस मधुबाला के करोड़ों दीवाने थे और जिसकी खूबसूरती के चर्चे विदेशों में भी थे, वही मधुबाला अपने आखिरी दिनों में सिर्फ हड्डियों का ढांचा भर रह गई थीं। निर्देशक केदार शर्मा का कहना था, कि शुरुआती समय से ही वो बेहद प्रोफेशनल थीं। वो एक मशीन की तरह बड़ी तत्परता से काम में लगी रहती थीं। भले ही उन्हें खाना छोड़ना पड़े या तीसरी श्रेणी में सफ़र करना पड़े, मधुबाला हमेशा समय पर पहुंचती थीं। इलाज के लिए जब वो लंदन पहुंचीं, तो डॉक्टरों ने ये कहकर सर्जरी करने से इन्कार कर दिया कि उनके जीवन का मात्र एक वर्ष शेष है, लेकिन मज़बूत इरादों वाली ये अदाकारा 9 और वर्षों तक हिन्दी सिनेमा के दर्शकों का मनोरंजन करती रही थी।

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मधुबाला की आखिरी फिल्म ‘चालाक’ अभिनेता राज कपूर के साथ अधूरी ही रह गई थी। मधुबाला की बढ़ती बीमारी के कारण फिल्म को बीच में ही रोक देना पड़ा, लेकिन उनकी हालत में कभी सुधार ही नहीं आया। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान ही इस अद्वितीय सुंदरी ने सिनेमा के लिए आखिरी बार श्रृंगार किया था। गंभीर रूप से बीमार रहने के बावजूद उन्होंने ‘फ़र्ज़ और इश्क’ नामक फ़िल्म का निर्देशन करने की पूरी तैयारी कर ली थी, लेकिन दुर्भाग्यवश ये फ़िल्म कभी सिनेमा-घरों तक नहीं पहुंच सकी और मधुबाला 36 वर्ष की छोटी उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गईं।

बचपन से ही मधुबाला धुन की पक्की थीं

छोटी आयु में ही काम के बोझ के कारण मधुबाला को स्कूल जाने का मौका नहीं मिला। लेकिन इस मज़बूत इरादों वाली लड़की ने 17 वर्ष की आयु तक धाराप्रवाह अंग्रेज़ी सीख ली थी। उन्होंने गाड़ी चलाना 12 वर्ष की आयु में ही सीख लिया था। उन्हें जब समय मिलता, तब वह लॉन्ग-ड्राइव पर निकल पड़तीं थी। मधुबाला को कपड़ों और गहनों पर पैसा बरबाद करना पसंद नहीं था। वो छोटी-छोटी चीज़ों से ही खुश हो जातीं थीं। 'थियेटर आर्ट्स’ अमेरिकी मासिक पत्र ने तो मधुबाला को ‘दुनिया का सबसे बड़ा सितारा’ ही कह डाला था, जबकि अपने पूरे जीवन में मधुबाला ने कभी कैलिफोर्निया के ‘बेवरली हिल्स’ में कदम भी नहीं रखा।

-प्रज्ञा श्रीवास्तव

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