दिल्ली, मुंबई और लाहौर इस गैस के कारण भी रहते हैं इतने गर्म

By Prerna Bhardwaj
August 12, 2022, Updated on : Sat Aug 13 2022 10:08:20 GMT+0000
दिल्ली, मुंबई और लाहौर इस गैस के कारण भी रहते हैं इतने गर्म
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
  • +0
    Clap Icon
Share on
close
Share on
close

वैज्ञानिकों ने दुनिया भर के चार प्रमुख शहरों - भारत में दिल्ली और मुंबई, पाकिस्तान में लाहौर और अर्जेंटीना में ब्यूनस आयर्स से उपग्रह डेटा का उपयोग कर पाया कि चार लैंडफिल प्रति घंटे दसियों टन मीथेन (methane) का उत्सर्जन करते हैं.


लैंडफिल उस स्थान को कहते हैं जहां कूड़ा एकत्र किया जाता है. महानगरों में कचरे को अलग अलग करके इकठ्ठा न करने की उचित व्यवस्था न होने के कारण यह एक जगह डंप कर दिए जाते हैं, जो समय के साथ कचरे के पहाड़ में तब्दील हो जाते हैं. इनमे आग लग जाने की खबर भी हम आये दिन सुनते रहते हैं. कारखानों का कचरा, प्लास्टिक, दवाखानों की गन्दगी, एवं बेकार इलेक्ट्रॉनिक उपकरण (ई-वेस्ट) मिश्रित इस कचरे में उपस्थित विभिन्न प्रकार के रसायन परस्पर सम्पर्क में 10-12 वर्षों के बाद कई प्रकार की रासायनिक गैसें पैदा करते हैं, जिन्हें ‘लैंडफिल गैस’ कहा जाता है. मीथेन इन्हीं  में से एक विषैली गैस है.

क्या कहती है रिपोर्ट?

बता दें कि ग्रीनहाउस गैसे में मीथेन (CH4) कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) से लगभग 30 गुणा अधिक प्रभावशाली है. मीथेन रिसाव के विशिष्ट स्थलों की पहचान होना ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने के प्रयासों में काफी मददगार साबित हो सकता है. इसी दिशा में, बुधवार को साइंस एडवांस में प्रकशित अध्ययन के मताबिक मुंबई में एक-चौथाई से ज्यादा मीथेन उत्सर्जन लैंडफिल से होता है. राजधानी दिल्ली के मीथेन उत्सर्जन में 6 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा लैंडफिल का है. लाहौर में लैंडफिल से मीथेन उत्सर्जन 13 प्रतिशत का है. भारत के मुंबई और दिल्ली, पाकिस्तान के लाहौर, अर्जेटीना के ब्यूनस आयर्स से जुटाये गए डाटा के आधार पर यह भी पाया गया कि 2018 और 2019 से पहले की तुलना में लैंडफिल से उत्सर्जन 2.6 गुना अधिक था.


इस शोध के लिए शोधकर्ताओं ने अलग-अलग लैंडफिल से उनके मीथेन उत्सर्जन की गणना करने के लिए उपग्रह का उपयोग किया था. उत्सर्जन की गणना के लिए उपग्रह का इस्तेमाल अपेक्षाकृत एक नया तरीका है, क्योंकि अभी तक गैसों के निरीक्षण करने के लिए स्थानीय सरकारी आंकड़े ही एकमात्र स्त्रोत होते थे. उपग्रह के उपयोग से स्वतंत्र संगठन ग्रीनहाउस गैसों पर नज़र रखी  जा सकती है, और बड़े उत्सर्जक की पहचान की जा सकती है.

कितना घातक है मीथेन?

जब भोजन, लकड़ी या कागज जैसे जैविक वेस्ट सड़ जाते हैं, तो यह हवा में मीथेन उत्सर्जित करता है. तेल और गैस प्रणालियों और कृषि के बाद लैंडफिल विश्व स्तर पर मीथेन उत्सर्जन का तीसरा सबसे बड़ा स्रोत है. शोध में सामने आया कि लैंडफिल से होने वाला मीथेन उत्सर्जन वैश्विक मानव-जनित उत्सर्जन का लगभग 18 प्रतिशत है.


मीथेन हमारे लिए कितना खतरनाक है इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उत्सर्जित मीथेन हवा में लगभग एक दर्जन वर्षों तक रहता है, और यह कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में वातावरण में 80 गुना अधिक गर्मी उत्पन्न करता है.


लैंडफिल में आग लग जाने की घटनाएं हम अक्सर सुनते हैं. इस साल भारत में कम से कम तीन लैंडफिल आग की सूचना मिली है. दिल्ली के लैंडफिल में आग लगने पर कई दिनों तक इसका धुंआ बना रहा.


पिछले साल के संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में, 104 देशों ने 2020 के स्तर की तुलना में 2030 तक मीथेन उत्सर्जन को 30% तक कम करने की प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर किए. भारत और चीन दोनों हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं. अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी द्वारा हाल ही में किए गए एक विश्लेषण के अनुसार चीन, भारत और रूस दुनिया के सबसे बड़े मीथेन प्रदूषक हैं.

क्या हैं उपाय?

वैश्विक तापमान वृद्धि (global warming) को रोकने के लिए कुछ ठोस कदम उठाये जाने होंगे. वैज्ञानिकों के अनुसार, मीथेन का वातावरण में केवल 10 वर्षों का जीवनकाल होता है, इसलिए यदि अभी से इस काम को किया जाए तो जल्द ही ग्लोबल वार्मिंग के कम होने के परिणाम दिखेंगे. मीथेन उत्सर्जन  को कम करने के साथ-साथ हमें हमें सीओ2 (CO2) को भी सीमित करने की जरूरत है, लेकिन मीथेन को कम कर लेना  निकट अवधि में ग्लोबल वार्मिंग की गति को धीमा ज़रूर कर देगा.