संस्करणों
विविध

रिफ़त मसूदी के क्रिकेट बैट की बल्ले-बल्ले

कश्मीर चाहे जितना अशांत हो, वहां के उद्यमी पुरुष ही नहीं, लड़कियां और महिलाएं भी तमाम विपरीत माहौल के बावजूद अपनी सफलता का उत्साहजनक प्रदर्शन कर रही हैं...

23rd Jul 2018
Add to
Shares
200
Comments
Share This
Add to
Shares
200
Comments
Share

आतंकवाद प्रभावित कश्मीर की खूबसूरती, कला-साहित्य तो विश्व-चर्चाओं में रहते ही हैं, एक और बात, जो यहां की नयनाभिराम वादियों की रूह में खिलखिलाती रहती है, वो है महिला क्रिकेटर और दस करोड़ के सालाना टर्नओवर वाला क्रिकेट बैट बनाने का कारोबार। बुर्का-हिजाब पहनकर लड़कियां पिच पर दौड़ रही हैं तो सफल उद्यमी के रूप में रिफ़त मसूदी क्रिकेट बल्ले का बिजनेस परवान चढ़ा रही हैं।

रिफत मसूदी

रिफत मसूदी


क्रिकेट प्लेयर एवं अपनी छह बहनों में एक महनाज़ कहती हैं कि कई बार परीक्षा के दौरान उन्हे क्रिकेट टूर्नामेंट में शामिल होना पड़ा। उनके स्कूलवालों ने उन्हे कभी रोका नहीं, बल्कि पहले वह टूर्नामेंट खेलतीं, उसके बाद परीक्षा में बैठती थीं लेकिन इस वजह से उनकी पढ़ाई पर असर ज़रूर पड़ा। 

कश्मीर चाहे जितना अशांत हो, वहां के उद्यमी पुरुष ही नहीं, लड़कियां और महिलाएं भी तमाम विपरीत माहौल के बावजूद अपनी सफलता का उत्साहजनक प्रदर्शन कर रही हैं, वो चाहे बुर्का और हिजाब पहनकर क्रिकेट की पिच पर उतरीं महनाज़, फ़रख़ंदा, हनान मक़बूल हों अथवा क्रिकेट के बैट बना रही कामयाब बिजनेस मैन रिफ़त मसूदी। ऐसा हो भी क्यों नहीं, कश्मीर में क्रिकेट का जादू जो महिला क्रिकेटर्स के भी सिर चढ़ कर बोल रहा है। जम्मू-कश्मीर में महिलाओं की एक दर्जन से अधिक टीमें अपने हुनर का प्रदर्शन कर रही हैं। जिस भी महिला खिलाड़ी से बात करो, उसके हौसले चट्टान की तरह सख्त दिखते हैं।

क्रिकेट प्लेयर एवं अपनी छह बहनों में एक महनाज़ कहती हैं कि कई बार परीक्षा के दौरान उन्हे क्रिकेट टूर्नामेंट में शामिल होना पड़ा। उनके स्कूलवालों ने उन्हे कभी रोका नहीं, बल्कि पहले वह टूर्नामेंट खेलतीं, उसके बाद परीक्षा में बैठती थीं लेकिन इस वजह से उनकी पढ़ाई पर असर ज़रूर पड़ा। पापा की मौत हुई तो उनके घर में पांच महीनों तक एक भी पैसा नहीं था। घऱ वाले कई महीनों तक खाने का सामान लाकर रखते थे। उनके पास स्पोर्ट्स के लिए जूते नहीं थे और फिर उनके जीजाजी वो लाए। वह समय उनकी जिंदगी का सबसे कठिन दौर था, जिसे भूलना आसान नहीं है। इसी तरह की प्लेयर फ़रख़ंदा छक्के और चौके मार रही हैं। जब उन्होंने खेलना शुरू किया था तो उन्हें पता नहीं था कि एक दिन उन्हें बड़े मैदान में खेलने को मिलेगा।

वह कहती हैं कि कुछ साल पहले जब उन्हे क्रिकेट खेलने का शौक हुआ तो उनको हेल्पर के तौर पर रखा जाता था। फिर एक दिन जब उनकी टीम का एक खिलाड़ी बीमार पड़ा तो उसकी जगह उन्हे खेलने का मौक़ा मिला। वह उनका पहला मैच था। उस दिन उन्होंने 39 रन बनाए। तब से ओपनर के तौर पर टीम में उन्हे जगह मिल गई। आज वह भारत के कई राज्यों में खेल चुकी हैं। श्रीनगर के करननगर की रहने वाली हनान मक़बूल बीते चौदह सालों से क्रिकेट खेल रही हैं। शुरू-शुरू में वो लड़कों के साथ खेलती थीं। वह कहती हैं कि आज महिला क्रिकेट टीमें हैं। शुरू में उनको लड़कों के साथ खेलना पड़ता था। उस समय लड़कियों का क्रिकेट खेलना पसंद नहीं किया जाता था। पूरी तरह नहीं, लेकिन, अब तो सोच में बदलाव आ गया है। हनान कहती हैं कि कश्मीर में ख़राब हालात का असर उनके गेम पर भी पड़ता है। जब काफ़ी समय तक कश्मीर बंद रहता है तो खिलाड़ी प्रैक्टिस नहीं कर पाते हैं। इसका सीधा असर क्रिकेटरों के प्रदर्शन पर पड़ता है।

कश्मीर में क्रिकेट के बैट बनाने के सैकड़ों कारखाने हैं। उन्ही में एक है महिला बिजनेसमैन रिफ़त मसूदी का कारखाना। श्रीनगर में रहने वाली रिफ़त मसूदी कश्मीर में औरतों के लिए नया ट्रेंड बना रही हैं। वह पिछले 17 साल से क्रिकेट बैट बना रही हैं। शुरुआत में लोगों ने उनके घर से निकलने पर सवाल उठाए, लेकिन अब उनकी कामयाबी के किस्से कहे जाते हैं। रिफ़त बताती हैं कि गृहिणी होने के कारण शुरुआत में वह इस व्यवसाय को लेकर व्यक्तिगत तौर पर कत्तई उत्साहित नहीं थी लेकिन उनके पति शौक़त मसूदी ने प्रेरित किया। अपने पिता के निधन के बाद वह पूरा समय अपने बैट बनाने के धंधे को देने लगीं। अब उनकी फैक्ट्री में हर साल दस हजार बैट बनते हैं। उनके बैट्स की मुख्य रूप से केरला को सप्लाई होती है। उनके बैट का सबसे बड़ा बाजार मुंबई है।

वैसे आम तौर पर भी कश्मीर के लोगों को क्रिकेट से हमेशा उम्मीद बंधी रहती है क्योंकि इससे यहां के क्रिकेट बैटों का कारोबार चमक उठता है। कश्मीरी विलो से बनने वाले बैटों की मांग बढ़ जाती है। कारीगरों का मानना है कि अचानक काम बढ़ने की वजह हमेशा आईपीएल और विश्व कप होते हैं। कश्मीर के अनंतनाग जिले में क्रिकेट बैट बनाने की लगभग 200 फैक्टरियां हैं, जिनकी सालाना आमदनी 10 करोड़ से ज्यादा है। यहां से रोजाना करीब 20 हजार क्रिकेट बैट देश के दूसरे शहरों को निर्यात किए जाते हैं। क्रिकेट बैट तैयार करने वाले कश्मीर के हुलमुला गांव की कथा भी यही है। सत्तर वर्षीय हाजी गुलाम रसूल आज कश्मीर में बैट उद्योग का बादशाह कहलाते हैं। अब उनका बेटा मुश्ताक सारे कामकाज की देखभाल करता है।

कश्मीर में बैट बनाने का उनका कारखाना सबसे बड़ा है, जिसमें 150 कारीगर काम करते हैं। यहां 30-40 बैट प्रतिदिन बन जाते हैं। डोगरा शासनकाल में जब कश्मीर में बैट बनाने की शुरूआत हुई थी तब से लेकर अब तक इसमें जमीन आसमान का अंतर आ चुका है। जहां कभी सारा काम हाथों से करना पड़ता था क्योंकि कोई भी आरा मिल यहां नहीं होती थी। सफेदे की लकड़ी को बैट के आकार में काटने से लेकर उन्हें विभिन्न प्रकार के बैटों में तब्दील करने का कार्य भी हाथों से करना पड़ता था। तब एक बैट को अपनी सूरत में पहुंचाने के लिए कई दिन लग जाते थे। और उनको लगाए जाने वाले हैंडलों को आयात किया जाता था। सिर्फ यही नहीं तब इन हैंडलों के लिए बैटों में बनाए जाने वाले गड्डे सही नहीं बन पाते थे। आज सब कुछ बदल चुका है। आज नई तकनीक के कारण बैट का निर्माण आसान हो गया है। कश्मीर के सफेदे की लकड़ी ब्रिटेन के सफेदे की लकड़ी का मुकाबला करती है और बैट तैयार करने वाले श्रमिक किसी जादूगर से कम नहीं हैं। यहां के उम्दा बैट डेढ़ हजार रुपए तक में बिक जाते हैं।

कश्मीर घाटी में बल्ला बनाने वाली पंजीकृत और गैर पंजीकृत इकाइयों का सालाना व्यापार 10 करोड़ से ऊपर का है। विदेशी खिलाड़ियों में भी यहां के बने बल्लो की डिमांड बढ़ी है। इससे बिक्री में जबर्दस्त उछाल आया है। पिछले तीन सालों में क्रिकेट के बल्ले के निर्माताओं ने कोलकाता, हैदराबाद और जयपुर जैसे शहरों में सीधे तौर पर अपने कारोबार का विस्तार किया है। पहले ये कारोबार दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों तक सीमित था, लेकिन अब बड़ौदा और इंदौर जैसे शहरों से भी उनके पास डिमांड आ रही है। आए भी क्यों नहीं, अब तो कश्मीर की बेटियां भी बुर्का और हिजाब पहनकर क्रिकेट की पिच पर उतर रही हैं। इन बेटियों ने सिर्फ मैदान पर अपने प्रतिद्वंद्वियों को ही नहीं, बल्कि समाज और मजहब की कई बेड़ियों को भी चुनौती दी है।

कश्मीर में तैयार हो रहे क्रिकेट बैट के बाजार की दास्तान औरों से जरा हटकर है। इन दिनो, जबकि दुनिया भर में बिकने वाले अस्सी फीसदी क्रिकेट बैट बनाने वाली पंजाब और मेरठ की फैक्ट्रियां कच्‍चे माले की कमी से गंभीर संकट से जूझ रही है, वही जम्‍मू-कश्मीर सरकार द्वारा क्रिकेट बैट की लकड़ी कश्‍मीर-विलो के राज्‍य से बाहर जाने पर रोक लगा रखी है। कश्‍मीर विलो तीन से पांच गुना तक महंगी लकड़ी होती है। इस लकड़ी का बाहर निर्यात थम जाने से जम्‍मू और कश्‍मीर में बैट इंडस्‍ट्री की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है।

श्रीनगर के बैट निर्माता लियाकत अली बेग बताते हैं कि भारत, पाकिस्‍तान, श्रीलंका, बांग्‍लादेश, नेपाल के अलावा ऑस्‍ट्रेलिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में कश्‍मीर विलो से तैयार सस्‍ते क्रिकेट बल्ले की जबर्दस्‍त मांग है। भारतीय क्रिकेट बैट इंडस्‍ट्री की पहचान ही कश्‍मीर विलो लकड़ी से है। यह लकड़ी इंग्लिश विलो के मुकाबले कहीं सस्‍ती और सामान्‍य लकड़ी के अधिक मजबूत और लचीली होती है। कश्‍मीर सरकार ने लोकल इंडस्‍ट्री की मदद के लिए राज्‍य से बाहर जाने पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। साठ से अधिक बड़े बैट निर्माता यहां श्रीनगर, बारामुला, अवंतीपुर में शिफ्ट हो चुके हैं। यद्यपि बीते वर्षों में बाढ़ से कई इकाइयां बर्बाद हो गई थीं।

यह भी पढ़ें: मिलिए भारत में समलैंगिकता पर कानून बदलने के लिए काम कर रहे वकीलों से

Add to
Shares
200
Comments
Share This
Add to
Shares
200
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें