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मिलिए उस इलस्ट्रेटर से जिसने आदिवासी बच्चों को इंग्लिश पढ़ाने के लिए छोड़ दी याहू की नौकरी

आदिवासी बच्चों को इंग्लिश पढ़ाने के लिए रूचि शाह  ने छोड़ दी याहू की नौकरी...

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19th Jun 2018
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रुचि अभी वैंकूवर के द वॉकिंग स्कूल बस और भारत के प्रथम बुक्स संस्थान के साथ काम कर रही हैं। प्रथम बुक्स के साथ छपने वाली उनकी किताब पूरी तरह से हिमालयन पब्लिक स्कूल उत्तराखंड के बच्चों द्वारा तैयार की जाएगी।

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मुंबई में पली बढ़ी रुचि शाह के घर में ही प्रिंटिंग प्रेस हुआ करता था। उनके माता-पिता भी आर्टिस्ट थे, इस वजह से शुरू से ही उनकी दिलचस्पी पेंटिंग और आर्ट में थी।

मुंबई में पली बढ़ी रुचि शाह के घर में ही प्रिंटिंग प्रेस हुआ करता था। उनके माता-पिता भी आर्टिस्ट थे, इस वजह से शुरू से ही उनकी दिलचस्पी पेंटिंग और आर्ट में थी। अपने इस इंट्रेस्ट को करियर में बदलने के लिए उन्होंने आईआईटी बॉम्बे के इंडस्ट्रियल डिजाइन सेंटर से पढ़ाई की। कॉलेज से निकलते ही उन्हें याहू में बतौर डिजाइनर नौकरी मिल गई। याहू में कुछ दिन नौकरी करने के बाद उन्हें बेंगलुरु के 'प्रथम बुक्स' संस्थान से बुलावा आ गया। यहां काम करने के दौरान ही उन्हें 2012 में यूके के कैंबरवेल कॉलेज से विजुअल आर्ट्स में स्कॉलरशिप करने का मौका मिल गया।

उन्होंने यूके में एक साल तक इलस्ट्रेशन में महारत हासिल कर ली। 2013 में वह लंदन से वापस आ गईं और यहां उन्हें अवलोकितेश्वर ट्रस्ट ने लद्दाख के दूरस्थ इलाकों के स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए बुलाया। उन दिनों को याद करते हुए बताती हैं, 'लद्दाख में लमायुरू मॉनेस्ट्री में वॉलंटियर करते वक्त मुझे लगा कि क्लासरूम में मुझे एक खाली दीवार मिली। क्लास को जीवंत बनाने के लिए मैंने दीवार पर गांव का भित्ति-चित्र बना दिया। इस दीवार पर पेंटिंग करते वक्त मुझे आइडिया आया कि आर्ट के माध्यम से बच्चों को बेहतर तरीके से पढ़ाया जा सकता है। '

स्कूल की इस पेंटिंग को फ्रेशडेस्क की टीम ने देखा और उन्होंने अपने ऑफिस की दीवार को पेंट करने के लिए रुचि को बुलाया। अगले चार सालों तक रुचि ने फ्रेशडेस्क के लिए 20 से भी ज्यादा दीवारें पेंट की। उनके काम को काफी सराहना भी मिली और देसी क्रिएटिव, पोल्का कैफे जैसे प्लेटफॉर्म में उनको प्रकाशित भी किया गया। इसी दौरान रुचि को आईडीसी द्वारा एक किताब का इलस्ट्रेशन करने का मौका मिला। यह किताब बहुप्रसिद्ध भारतीय लेखक महाश्वेता देवी की थी। उन्होंने अगले तीन सालों तक बच्चों की कई किताबों के लिए इलस्ट्रेशन किया। इसमें कई सारे खूबसूरत संदेश छिपे होते थे।

रुचि अभी वैंकूवर के द वॉकिंग स्कूल बस और भारत के प्रथम बुक्स संस्थान के साथ काम कर रही हैं। प्रथम बुक्स के साथ छपने वाली उनकी किताब पूरी तरह से हिमालयन पब्लिक स्कूल उत्तराखंड के बच्चोों द्वारा तैयार की जाएगी। अपनी चुनौतियों के बारे में बात करते हुए रुचि बताती हैं, "हालांकि स्थानीय ग्रामीण मेरे काम की सराहना करते हैं, लेकिन उन्हें मेरे अकेले सफर करने पर आश्चर्य होता है। दूरस्थ इलाके के स्कूलों में अधिकतर पुरुष होते हैं इसलिए वहां जाकर काम करना थोड़ा चुनौतीपूर्ण भी होता है।"

यह भी पढ़ें: छत्तीसगढ़ में 'नेकी का पिटारा' से भूखों को मिलता है मुफ्त भोजन

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