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उर्दू की बदौलत एक हिन्दू गांव की बदल गई तक़दीर,अबतक मिली 100 को सरकारी नौकरी

Ruby Singh
5th Jan 2016
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जयपुर के टोंक जिले में एक गांव की उर्दू ने बदली तक़दीर...

100 लोगों को अब तक मिल चुकी है सरकारी नौकरी...

सरकारी नौकरी 30 फीसदी लड़कियों को मिली है...

गांव में सिर्फ मीणा समाज के लोग रहते हैं....


कहते हैं एक ईमानदार कोशिश बहुत बार कई ज़िंदगियों के लिए कुछ ऐसा कर जाती है जिसका अंदाजा किसी को नहीं होता। इसके लिए ज़रूरी है पहला कदम बढ़ाने की। ऐसा ही एक पहला कदम बढ़ाया जयपुर से 100 किलोमीटर दूर टोंक ज़िले के सेंदड़ा गांव के मीणा समाज के लोगों ने। और आज हालत ये है कि गांव के सौ से ज्यादा लोग सरकारी नौकरी में हैं। 

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टोंक जिले के सेंदड़ा गांव के सरकारी स्कूल में ग्यारहवीं और बारहवीं के बच्चों को बैठने के लिए बेंच तक नही है। पीने के लिए पानी की व्यवस्था तक नही है, लेकिन स्कूल में बच्चों की भीड़ लगी रहती है। इसकी वजह हैं कि यहां के उर्दू शिक्षक। सरकार ने इस सरकारी स्कूल में उर्दू शिक्षक की व्यवस्था की है। बच्चों की भीड़ हो भी क्यों न। उर्दू पढ़ना रोज़गार की गांरटी बन चुका है। सबसे बड़ी बात यह है कि दूर-दूर तक कोई अल्पसंख्यक आबादी नही हैं लेकिन पूरा गांव उर्दू की पढ़ाई में लगा है। नतीजा यह है कि 2000 की आबादी वाले गांव के हर घर में उर्दू की बदौलत कोई न कोई नौकरी कर रहा है। 

उर्दू पढ़ने वालों में लड़कियों की संख्या भी उत्साहजनक है। गांव की एक लड़की सीमा ने योरस्टोरी को बताया,

हमारे गांव में उर्दू पढ़कर बहुत लोगों को नौकरी लगी है। इसलिए हमनें सोचा कि हम भी उर्दू पढ़ें ताकि हमारी भी नौकरी लग जाए.
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इस बदलाव के पीछे गांव के कुछ लोग हैं जिनकी नज़र उर्दू के ज़रिए अनुसूचित जाति और जनजाति को मिलने वाली नौकरी के इश्तेहार पर गई। फिर क्या था। लोगों ने अपने गांव के स्कूल में उर्दू शिक्षक के लिए सरकार से अनुरोध करना शुरू किया। लोगों के अनुरोध पर सरकार ने ध्यान दिया और शुरू में ग्यारहवीं से उर्दू की पढ़ाई के लिए शिक्षक की अस्थाई नियुक्ति कर दी गई। इस सरकारी स्कूल में संस्कृत की पढ़ाई होती थी। लेकिन उर्दू शिक्षक के आने के बाद से अब गांव के सभी बच्चों ने वैकल्पिक विषय के तौर पर संस्कृत के बदले उर्दू को चुना। उर्दू के शिक्षक रोजाना 60 कि.मी. दूर से पढ़ाने आते हैं। बच्चों के उर्दू पढ़ने की ऐसी ललक है कि इन्हें एक्सट्रा क्लासेज करनी पड़ती है। चूंकि उर्दू की पढ़ाई ग्यारहवीं-बारहवीं में ही होती है इसलिए शिक्षकों को बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। उर्दू पढ़ाने वाले शिक्षक महमूद ने योरस्टोरी को बताया, 

यहां तो लेक्चरार का पोस्ट है लेकिन कोई उर्दू का लेक्चरार नही मिला तो हमें जूनियर टीचर को ही लगा दिया है लेकिन बच्चों के उर्दू पढ़ने की ललक को देख कर हम टोंक से एक्सट्रा क्सास लेने के लिए जल्दी आ जाते हैं।

स्कूल के प्रिंसिपल नाथूलाल मीणा को इस बात की खुशी है कि बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है। उनका कहना है, 

"स्कूल में कोई सुविघा नही है लेकिन यहां उर्दू पढ़ने की ललक ऐसी है कि उर्दू की भर्ती में गांव के सारे बच्चे पास हो जाते हैं. ये बच्चे उर्दू की क्लास कभी मिस नही करते.तीन साल पहले गांव वालों के अनुरोध पर यहां संस्कृत हटाकर उर्दू पढ़ाया जाने लगा है. इसकी वजह भी खास है. महज 2000 की अबादी वाले इस सेंदड़ा गांव की तकदीर उर्दू ने बदल दी है. उर्दू पढ़ना रोजगार की गारंटी बन गया है. गांव में करीब हर घर में एक व्यक्ति को उर्दू की बदौलत पर सरकारी नौकरी मिली है. बच्चों को देखिए किस तरह से क्लास में उर्दू पढ़ रहे हैं. आंखो को सुकून देनेवाली बात है कि इनमें ज्यादातर लड़कियां है।"

उर्दू की बदौलत नौकरी पाकर लेक्चरार बनने वाले गोपाल मीणा बताते हैं, 

हमारे गांव से एक शहर जाकर उर्दू पढ़कर सरकारी नौकरी पाई तब हमने भी सोचा कि उर्दू में रोजगार की संभावना ज्यादा है तो हमने उर्दू की पढ़ाई शुरु की और मेरी इस साल राजस्थान सरकार में उर्दू के लेक्चरार की नौकरी लग गई है। खुशी की बात यह है कि हमारे साथ गांव के 14 लोगों को लेक्टरार की नौकरी लगी है।
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हालांकि कई बच्चे उर्दू पढ़ने के दौरान होने वाली दिक्कतों से आहत रहते हैं। उन बच्चों का कहना है कि उर्दू पढने में उन्हें कोई दिक्कत नही होती है। पर वो 11 वीं क्लास से पढ़ते हैं इसलिए थोड़ी परेशानी है। उनका कहना है कि अगर सरकार पहली क्लास से उर्दू पढ़ाने की व्यवस्था करा दे तो बहुत अच्छा होगा। लेकिन कई बच्चों का यह भी मानना है कि थोड़ी मुश्किल ज़रूर होती है पर अच्छी बात यह है कि इसको पढ़ने के बाद नौकरी मिल जाती है।


जिस गांव में एक भी अल्पसंख्यक समाज के लोग नहीं हैं वहां बड़े चाव से बच्चे उर्दू पढ़ रहे हैं, इससे साफ होता है कि भाषा का न तो कोई मजहब होता है और न ही उसपर किसी का एकाधिकार है।सिर्फ उर्दू की बदौलत गांव में अबतक 100 से ज्यादा लोगों को मेडिकल, भाषा, शिक्षा और समाज कल्याण विभाग में नौकरी लगी है। गांव के बच्चों का कहना है कि उनके गांव के लोग अकेले उर्दू के सभी रिक्त पदों पर नौकरी पाएंगे। एक गांव जहां पहले बेहद गरीबी थी, सरकारी नौकरी दूर की कौड़ी लगती थी, आज उसी गांव में एक उत्साह है, खुशहाली है। और इस खुशहाली की वजह सिर्फ उर्दू है।

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