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वीवीपैट से खुल गया वोटिंग मशीनों की गड़बड़ी का भेद!

9th Jun 2018
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अगर बहुत अधिक तापमान की वजह से वीवीपैट का सेंसर सिस्टम खराब हो जा रहा है तो सवाल गैरवाजिब नहीं कि अगले साल लोकसभा चुनाव गर्मी में होने पर क्या पूरी मतदान व्यवस्था संदेह के घेरे में नहीं आ जाएगी! जो सवाल अब तक इवीएम को लेकर उठाए जा रहे थे, वीवीपैट में खराबी की तकनीकी वजह सामने आने के बाद अब विपक्ष के निशाने की दिशा बदल गई है लेकिन इसका ठोस समाधान क्या होगा, जवाब नदारद है।

वीवीपैट मशीन

वीवीपैट मशीन


कैराना लोकसभा उप चुनाव के बाद न सिर्फ ईवीएम बल्कि वीवीपैट भी विपक्ष के निशाने पर हैं। कैराना में 375 और नूरपुर विधानसभा में 113 वीवीपैट बदलने पड़े। इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एल वेंकटेश्वर लू ने कहा है कि तीन ईवीएम और 384 वीवीपैट खराब होने की शिकायत मिली थी। 

पहले ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन), और अब वीवीपैट (वोटर वेरीफ़ाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) देश के सियासी निशाने पर आ गई है। सवाल उठ रहे हैं कि ईवीएम की विश्वसनीयता कायम रखने के लिए बनाई गई वीवीपैट भी कैसे विवादों में आ गई है? सियासत में बस एक सिरा पकड़ने की देर हो ती है, बात निकलकर दूर-दूर तक पहुंच जाती है। हमारे देश में वोटिंग मशीनों की गड़बड़ी को लेकर लंबे समय से गैरभाजपाई पार्टियों के नेता लगातार चुनाव आयोग को निशाने पर लिए हुए हैं। पंजाब में तो भाजपा के नेता भी वोटिंग मशीनों को लेकर तोहमत लगाने लगे हैं। इस बीच गत दिवस जब अलग-अलग राज्यों में चार लोकसभा और दस विधानसभा सीटों के उपचुनाव के लिए मतदान हुआ तो इसी से सम्बंधित एक नए विवाद ने जन्म ले लिया।

मतदान के दौरान कई जगह ईवीएम मशीनों में खराबी पकड़ में आ गई। इसे लेकर खबरें वायरल होने लगीं। तरह-तरह की बहस छिड़ गई। उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में दर्जनों पोलिंग बूथों पर ईवीएम मशीनों में खराबी आने और इसकी वजह से मतदान बाधित रहा। सोशल मीडिया में इस खबर के चलते भाजपा विरोधियों ने पार्टी पर ईवीएम मशीनों के साथ छेड़छाड़ का आरोप उछाल दिया। टिप्पणियां की जाने लगीं कि ‘हम भाजपा को ईवीएम के साथ चुनावपूर्व गठबंधन नहीं करने दे सकते। इस गठबंधन को हराना तो नामुमकिन होगा।’ किसी ने लिखा कि कैराना उपचुनाव में दोनों ही पक्ष ईवीएम की गड़बड़ी से न सिर्फ वाक़िफ़ हैं बल्कि परेशान भी। ऐसे में क्यों ना चुनाव रद्द कर दिया जाए? अगले साल लोकसभा का आम चुनाव होने जा रहा है। ऐसे में उस गड़बड़ी का जोखिम नहीं उठाया जा सकता, जिसमें मशीन की गड़बड़ी पूरे देश की वोटिंग संदिग्ध बना दे।

कैराना लोकसभा उप चुनाव के बाद न सिर्फ ईवीएम बल्कि वीवीपैट भी विपक्ष के निशाने पर हैं। कैराना में 375 और नूरपुर विधानसभा में 113 वीवीपैट बदलने पड़े। इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एल वेंकटेश्वर लू ने कहा है कि तीन ईवीएम और 384 वीवीपैट खराब होने की शिकायत मिली थी। गर्मी के कारण तकनीकी खराबी आई है। इस संबंध में रिपोर्ट तलब गई है। शामली के डीएम इंद्र विक्रम सिंह ने भी वोटिंग के दिन कहा था कि खराबी ईवीएम में नहीं, वीवीपैट मशीनों में थी। बहुत अधिक तापमान की वजह से इसके सेंसर में खराबी आ रही है। अब अधिक गर्मी में वीवीपैट के सेंसर सिस्टम में खराबी की बात ने ही तूल पकड़ लिया है। पूछा जा रहा है कि अगले साल आम चुनाव भी गर्मी में होने वाले हैं, तो क्या इसी तरह उसमें भी मशीनें खराब होंगी? चुनाव आयोग के सलाहकार केजे ऐसी बातों पर विश्वास न करने की सलाह देते हैं।

अब आइए, जरा लोकतांत्रिक मतदान व्यवस्था में ईवीएम और वीवीपैट की जोड़ीदारी की दास्तान जान लेते हैं। ईवीएम और वीवीपैट का निर्माण भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बंगलूरू (कर्नाटक) और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड, हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) में होता है। चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया है, जिसमें उसने वीवीपैट प्राइवेट सेक्टर से खरीदने की सलाह दी है। ईवीएम पर उठ रहे सवालों ने वीवीपैट का जन्म दिया। इसे ईवीएम मशीन के साथ जोड़ा जाता है। हर ईवीएम के दो हिस्से होते हैं। एक बैलेटिंग यूनिट का, मतदाताओं के लिए और दूसरा कंट्रोल यूनिट का, जो पोलिंग अफसरों के लिए होता है। ईवीएम के दोंनो हिस्से एक पांच मीटर लंबे तार से जुड़े रहते हैं। बैलेट यूनिट ऐसी जगह रखी होती है, जहां कोई एक मतदाता दूसरे मतादाता को वोट डालते समय देख न सके।

ईवीएम पर एक बार में अधिकतम 64 प्रत्याशी तक दर्शाए जा सकते हैं। ईवीएम चिप आधारित मशीन है, जिसे केवल एक बार प्रोग्राम किया जा सकता है। उसी प्रोग्राम से तमाम डेटा को स्टोर किया जा सकता है लेकिन इन डेटा की कहीं से किसी तरह की कनेक्टिविटी नहीं है, लिहाजा, ईवीएम में किसी तरह की हैकिंग या रीप्रोग्रामिंग मुमकिन ही नहीं है। इसलिए यह पूरी तरह सुरक्षित है। वीवीपैट एक प्रिंटर मशीन है, जो ईवीएम की बैलेट यूनिट से जुड़ी होती है। ये मशीन बैलेट यूनिट के साथ उस कक्ष में रखी जाती है, जहां मतदाता गुप्त मतदान करने जाते हैं। मतदान के वक्त वोटर विजुअली सात सेकंड तक देख सकता है कि उसने किसे वोट किया है, यानी कि उसका वोट उसके अनुसार ही पड़ा है। वीवीपैट व्यवस्था के तहत ईवीएम में मतदान के तुरंत बाद काग़ज़ की एक पर्ची बनती है। इस पर जिस उम्मीदवार को वोट दिया गया है, उनका नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है।

यह व्यवस्था इसलिए है कि किसी तरह का विवाद होने पर ईवीएम में पड़े वोट के साथ पर्ची का मिलान किया जा सके। ईवीएम में लगे शीशे के एक स्क्रीन पर यह पर्ची सात सेकंड तक दिखती है। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड ने यह मशीन 2013 में डिज़ायन की। सबसे पहले इसका इस्तेमाल वर्ष 2013 में नागालैंड के चुनाव में हुआ। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपैट बनाने और इसके लिए पैसे मुहैया कराने के आदेश केंद्र सरकार को दिए। चुनाव आयोग ने जून 2014 में तय किया है कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सभी मतदान केंद्रों पर वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाएगा। आयोग ने इसके लिए केंद्र सरकार से 3174 करोड़ रुपए की मांग की थी। बीईएल ने वर्ष 2016 में 33,500 वीवीपैट बनाईं थीं। इसका इस्तेमाल गोवा के चुनाव में 2017 में किया गया। इसके बाद हाल ही में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में 52,000 वीवीपैट का इस्तेमाल किया गया।

देश में कुल 16 लाख ईवीएम का लोकसभा चुनावों में इस्तेमाल होता है और आगामी लोकसभा चुनावों में इतनी ही वीवीपैट मशीनें चाहिए। वीवीपैट के भारी बजट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के बीच पत्राचार के हालात पैदा कर दिए। अब तक केवल करीब 58000 वीवीपैट ही खरीदी जा सकी हैं। आयोग का कहना है कि वीवीपैट हर बूथ पर लगाने के लिए उसे कुल 3174 रुपये चाहिए। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है और उच्चतम न्यायालय ने आयोग से चरणबद्ध तरीके से हर ईवीएम के साथ वीवीपैट जोड़ने को कहा है। चुनाव आयोग का कहना है कि वीवीपैट के लिये केंद्र सरकार से लगातार रकम की मांग की जा रही है और अगर पूरा पैसा मिल जाये तो 30 महीने के अंदर पर्याप्त वीवीपैट आ जाएंगी।

पिछले दिनों एक एक मीडिया सर्वे में जब पूछा गया कि क्या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में आने वाली खराबी की खबरों का असर मतदाताओं के विश्वास पर भी पड़ता है? कुल 4460 लोगों ने इस सर्वे-पोल में हिस्सा लिया। 66.88 फीसदी (2983) ने माना कि ईवीएम में आने वाली खराबी की खबरों का असर मतदाताओं के विश्वास पर भी पड़ता है, जबकि 33.12 फीसदी (1477) का कहना था कि इवीएम खराबी का असर मतदाताओं के विश्वास पर नहीं पड़ता है। राजनीतिक दल अब तक कई बार ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठा चुके हैं, जबकि चुनाव आयोग दावा करता है कि ईवीएम सुरक्षित और सही है। विपक्षी पार्टियां कहती हैं कि मुस्लिम मतदाताओं को वोट डालने से रोकने के लिए मुस्लिम बहुल इलाकों में जान बूझकर मशीनें खराब कर दी जाती हैं। हाल ही में महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी भी ईवीएम पर सवाल उठा चुकी हैं।

कहा जा रहा है कि मतदाताओं को वोट डालने से रोकने की साजिश के तहत ईवीएम और वीवीपैट को खराब कर दिया जाता है। अगर बहुत अधिक तापमान की वजह से वीवीपैट के सेंसर सिस्टम में खराबी आ रही है तो सवाल गैरवाजिब नहीं कि अगले साल लोकसभा चुनाव गर्मी में होने पर क्या पूरी मतदान व्यवस्था संदेह के घेरे में नहीं आ जाएगी। जो सवाल अब तक इवीएम को लेकर उठाए जा रहे थे, वीवीपैट में खराबी की तकनीकी वजह सामने आने के बाद अब विपक्ष के निशाने की दिशा बदल गई है लेकिन इसका ठोस समाधान क्या होगा, जवाब नदारद है।

यह भी पढ़ें: कैनवॉस में जिंदगी के रंग: पैरों के सहारे पेंटिंग बनाने वाले नि:शक्तजन

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