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जिंदगीनामा लिखकर कामवाली बाई से मशहूर राइटर बनीं बेबी हालदार

जय प्रकाश जय
16th May 2018
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दुनिया के मशहूर रसियन राइटर मक्सिम गोर्की ने अपनी जिंदगी पर तीन किताबें लिखी थीं- 'मेरा बचपन', 'मेरे विश्वविद्यालय' और 'जीवन की राहों पर'। तीनों पुस्तकें विश्व साहित्य की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार हैं। गुड़गांव में मुंशी प्रेमचंद के पौत्र प्रोफेसर प्रबोध कुमार के घर बाई का काम करने वाली बेबी हालदार ‘आलो आंधारि’ नाम से अपना जिंदगीनामा लिखकर आज दुनिया की मशहूर लेखिकाओं में शुमार हो चुकी हैं।

बेबी हालदार

बेबी हालदार


दुल्हन बनते समय हालदार ने अपनी सहेली से कहा था - ' चलो, अच्छा हुआ, मेरी शादी हो रही है। अब कम से कम पेट भरकर खाना तो मिलेगा।' लेकिन उनका यह सोचना भी कितना दुर्भाग्यपूर्ण रहा था। 

‘आलो आंधारि’ किताब लिखकर बेबी हालदार देश-दुनिया की मशहूर लेखिकाओं में शुमार हो गई हैं। ‘आलो आंधारि’ उनका खुद का एक दर्दनाक जिंदगीनामा है। वह बताती हैं - 'बचपन में मैं अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाई। घर के हालात ऐसे थे कि छठवीं क्लास के बाद मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। मेरा 12वां साल लगा था कि मेरी शादी कर दी गई। पति उम्र में मुझसे 14 साल बड़ा था। शादी के तीन–चार दिन बाद उसने मेरे साथ बलात्कार किया। वह मुझे अक्सर मारता–पीटता। कम उम्र में मेरे तीन बच्चे पैदा हुए लेकिन एक दिन ऐसा आया, जब मुझे लगा, अब बहुत हो गया। मैंने अपने तीनों बच्चों को साथ लिया और घर छोड़कर निकल पड़ी। तीन साल पहले मुझे गुड़गाँव के एक प्रोफेसर प्रबोध के घर में काम मिल गया। उन्हें पढ़ने का शौक था। उनके घर में बहुत सी किताबें थीं। झाड़ू-पोंछा करते वक्त मैं उन किताबों को गौर से देखा करती। एक दिन प्रबोध जी मेरे लिए कॉपी-पेंसिल लेकर आए। बोले, ‘अपने बारे में लिखो, गलती हो तो कोई बात नहीं। बस लिखती जाओ।’ मेरा इतना मन लगने लगा कि मैं लिखती गई। रसोई घर में मैं सब्जी काटना छोड़कर लिखने बैठ जाती। खाना बनाते समय भी कॉपी बगल में रखती। बच्चों को सुलाने के बाद भी मैं देर रात तक लिखती रहती। मेरे मन की बातें शब्दों का रूप लेने लगीं। लिखने से मेरा दिल हल्का होने लगा। प्रबोध जी मेरी लिखी कॉपियां लगातार पढ़ते रहते। आखिर मैंने अपनी पूरी कहानी लिख डाली। प्रबोध जी ने मेरी कहानी का बांग्ला से हिंदी में अनुवाद किया। इसके बाद उसे छपवा कर 'आलो आंधारी' किताब का रूप दे दिया। मेरे पिता कहते हैं कि मैंने उनका नाम ऊंचा कर दिया। 'आलो आंधारी' छपने के बाद से जैसे जिन्दगी में रौशनी आ गई है। अब मैं रोज लिखती हूँ। लिखे बिना अब रहा भी नहीं जाता। अपनी आपबीती को मैं शब्दों में उतार सकी, इस बात की मुझे खुशी है।'

बेबी हालदार एक घरेलू कामगार हैं, जिन्होंने आजीवन गरीबी और घरेलू हिंसा के बीच अपना दुखद अतीत काटा है। मूल रूप से बंगाली में लिखा गया उनका खुद का जिंदगीनामा पहले हिंदी में ही प्रकाशित हुआ। सीधी-सादी भाषा-शैली में लिखी जब यह किताब बाजार में आई, इसका पहला ही संस्करण हाथोहाथ बिक गया। प्रकाशक ने दूसरा, फिर तीसरा संस्करण भी प्रकाशित कर दिया। कुछ वर्ष बाद उर्वशी बुटालिा ने उसे अंग्रेजी में 'अ लाइफ लेस्स ऑर्डिनरी' नाम से अनूदित कर दिया। इसके बाद तो फिर इस किताब का कई भारतीय एवं विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो गया और बेबी हालदार काम वाली बाई से दुनिया की मशहूर लेखिका बन गईं। न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनकी आत्मकथा को 'Angela's Ashes' का भारतीय संस्करण लिखा है।

सन् 1996 में अमेरिकी राइटर फ्रैंक मिकोरट की आत्मकथा 'Angela’s Ashes' ने तहलका मचा दिया था। वर्ष 2008 में हालदार की किताब का जर्मन भाषा में अनुवाद हुआ। अब तक इसका दो दर्जन भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। अब तक उनकी कुल चार किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। वह दुनिया के कई देशों में लिट्रेचर फेस्टिवल अटेंड कर चुकी हैं। तमाम देशों के पत्रकार उनका आए दिन इंटरव्यू लेते रहते हैं। बेबी का जिंदगीनामा किसी को आंखें नम कर लेने के लिए विवश कर देता है। वह मूलतः कश्मीर की रहने वाली हैं। अपनी मां के निधन के बाद सौतेली मां के कहने पर पिता उनको लेकर दुर्गापुर (प.बंगाल) में जा बसे। जब वह चार साल की थीं, तभी मां चल बसी थीं। घर में सौतेली माँ का आतंक दिनोदिन बढ़ता गया। उसके ही इशारे पर पिता ने एक क्रूर पति से उनकी 12 साल की उम्र में ही शादी रचा दी।

दुल्हन बनते समय हालदार ने अपनी सहेली से कहा था - ' चलो, अच्छा हुआ, मेरी शादी हो रही है। अब कम से कम पेट भरकर खाना तो मिलेगा।' लेकिन उनका यह सोचना भी कितना दुर्भाग्यपूर्ण रहा था। शादी की रात पति ने उनके साथ रेप किया। तेरहवें साल में ही वह एक बच्चे की मां बन गईं। पंद्रह की उम्र होते-होते दो और बच्चे पैदा हो गई। कमोबेश रोजाना ही वह उम्रदराज पति की गालियां सुनतीं, उसके हाथों पिटती रहतीं। जिंदगी नर्क हो चली। एक दिन पति ने गांव के किसी आदमी से बात करते देखकर उनके सिर पर पत्थर मारकर लहूलुहान कर दिया। उनकी जेठानी ने समझाया कि औरत मर्द के सहारे जीवन काटती है। वह उस घटना को भूल जाए और घर छोड़कर कहीं न जाए लेकिन हर वक्त उनका यही जी करता कि ससुराल छोड़कर वह कहीं भाग जाएं। इस तरह बर्दाश्त बाहर गुजर-बसर करते उनके ससुराल में ढाई दशक बीत गए। आखिरकार, वर्ष 1999 में एक दिन वह अपनी अज्ञात मंजिल की राह निकल ही पड़ीं। तीनो बच्चों को साथ लेकर वह रेलवे स्टेशन पहुंचीं और एक ट्रेन के शौचालय में बैठे-बैठे दिल्ली, फिर वहां से गुड़गांव पहुंच गईं।

गुड़गांव में उनका कोई भी परिचित नहीं। अब क्या करें। अपना और बच्चों को कैसे पेट पालें। आंखों के आगे अंधेरा पसरा हुआ था। एक झोपड़ी में दिन काटती हुई घर-घर जाकर काम वाली बाई का काम करने के लिए कुंडियां खटकाने लगीं। एक दिन उन्होंने उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के प्रौत्र एवं रिटायर्ड प्रोफेसर प्रबोध कुमार के दरवाजे पर दस्तक दी। यही वो दस्तक थी, जिसने उनके जीवन की दिशा मोड़ दी। यहां से वह उस मंजिल की ओर कूच करने वाली थी, जिसका सपने में भी उन्हें कयास नहीं रहा होगा। वैसे तो वह मामूली पढ़ी-लिखी थीं, किसी तरह किताबें पढ़ लिया करती थीं। एक दिन प्रबोध कुमार ने उनको तसलीमा नसरीन की एक किताब पढ़ने के लिए दी। जब वह पूरी किताब पढ़कर खत्म कर चुकीं तो प्रबोध कुमार ने उनसे कहा कि तुम्हारे ऊपर अब तक जो कुछ बीता है, उसे धीरे-धीरे लिख डालो। यह बात पहले तो उनको बड़ी अटपटी लगी लेकिन जब कलम उठा लिया तो इस काम में उनको मजा आने लगा।

बांग्ला में वह अपना ही लिखा पढ़कर रोती रहतीं। यह उनके जीवन का चमत्कृत कर देने वाला अनुभव था। स्कूल के दिनों के बाद उन्होंने दूसरी बार कलम थामा था। वह कहती हैं- 'जब मैंने हाथ में पेन थामा तो घबरा गई थी। मैंने स्कूली दिनों के बाद कभी पेन नहीं थामा था। जैसे ही मैंने लिखना शुरू किया तो मुझमें नई ऊर्जा आ गई। किताब लिखना अच्छा एक्सपीरियंस रहा।' बाद में प्रबोध कुमार ने स्वयं उनकी रचना को बांग्ला से हिंदी में अनूदित किया। बताया जाता है कि अनुवाद करते समय वह भी बार-बार रोए। आखिरकार वर्ष 2002 में किताब छपने चली गई।

आलोचक बेबी हालदार की इस किताब को एक साहित्यिक रचना बताते हुए कहते हैं कि 'इस बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि लेखिका ने ज़िंदगी के पारंपरिक ढब बड़ी खूबसूरती से कलम बंद किए हैं। इसमें उन कठिनाइयों का उल्लेख किया है, जिनसे एक महिला गुज़रती है, साथ ही पुरुषों के नकारात्मक व्यवहार को भी उत्कृष्टता से कलम बंद किया है।' इस समय उनका बड़ा बेटा जवान हो चुका है। वह पढ़ाई कर रहा है। हालदार ने किताबों की रॉयल्टी से अब तो अपना खुद का बसेरा भी बना लिया है, लेकिन प्रबोध कुमार की चौखट से उनका आज भी नाता टूटा नहीं है। वह कहती हैं - 'मैं आज भी अपने आप को प्रबोध कुमार की मासी समझती हूँ। मैं उनका घर और अपने हाथों से झाड़ू कभी नहीं छोडूंगी। साथ ही लगातार लिखती रहूंगीं। प्रबोध कुमार की बदौलत ही तो मैंने खुद को पहचाना है।'

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