संस्करणों
विविध

जां निसार के बिना उर्दू अदब की तवारीख़ अधूरी

सिर्फ गज़लें ही नहीं नज़्में, रूबाइयाँ और फिल्मी गीत भी समान जोश-ओ-जुनून के साथ लिखने वाले अख़्तर साहब...

14th Feb 2018
Add to
Shares
23
Comments
Share This
Add to
Shares
23
Comments
Share

हिंदी-उर्दू साहित्य में दुनिया भर में मशहूर रहे मरहूम जाँ निसार अख़्तर का जन्म 18 फरवरी 1914 को हुआ था। मशहूर शायर जावेद अख्तर मरहूम जां निसार अख्तर साहब के बेटे हैं। उनके परदादा ’फ़ज़्ले हक़ खैराबादी’ ने मिर्ज़ा गालिब के कहने पर उनके दीवान का संपादन किया था। बाद में 1857 में ब्रिटिश सरकार के ख़िलाफ़ ज़िहाद का फ़तवा ज़ारी करने के कारण उन्हें ’कालापानी’ की सजा दी गई। जाँ निसार अख्तर के पिता ’मुज़्तर खैराबादी’ भी एक प्रसिद्ध शायर थे।

जां निसार अख्तर (फोटो साभार- यूट्यूब)

जां निसार अख्तर (फोटो साभार- यूट्यूब)


जां निसार खा़नदान के योगदान के बग़ैर उर्दू अदब की तवारीख़ अधूरी लगती है। वह न सिर्फ़ गज़लें लिखते थे, बल्कि नज़्में, रूबाइयाँ और फिल्मी गीत भी उसी जोश-ओ-जुनून के साथ लिखा करते थे। उनमें वतनपरस्ती कूट-कूट कर भरी थी।

सन् 1943 में जाँ निसार अख्तर की शादी ख्यात शायर ’मज़ाज लखनवी’ की बहन ’सफ़िया सिराज़ुल हक़’ से हुई। उन्हीं से जावेद अख्तर का जन्म हुआ था। दंगों के दौरान वह ग्वालियर से भोपाल चले गए। वहां के हमीदिया कालेज में वह और साफिया, दोनो अध्यापन करने लगे। वह उनके संघर्ष के दिन थे। सन् 1949 में वह फिल्मों में काम की तलाश में बम्बई पहुंच गए, जहाँ कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई, मुल्कराज आनंद, साहिर लुधियानवी आदि से उनका याराना हुआ। इस दौरान उन्हें भोपाल से सफ़िया से भी आर्थिक मदद मिलती रही। सन् 1953 में कैंसर से सफ़िया की मौत हो गई। इसके बाद उन्होंने 1956 में ख़दीजा तलत से शादी रचा ली। फिल्मी दुनिया में सन् 1955 में फिल्म 'यासमीन' से उनकी नई पहचान उजागर हुई। फिर तो उन्होंने हिंदी सिनेमा को एक से एक लाजवाब गीत दिए - 'आँखों ही आँखों में इशारा हो गया', 'ग़रीब जान के हमको न तुम दगा देना', 'ये दिल और उनकी निगाहों के साये', 'ऐ दिले नादाँ', 'आप यूँ फासलों से गुज़रते रहे' आदि...। फिल्म 'रज़िया सुल्तान' के लिए उन्होंने आखिरी गीत लिखा।

वह मुंबई में रहने तक साहिर लुधियानवी के अतिथि शायर बने रहे। कहा जाता है कि अपनी ज़िन्दगी के सबसे हसीन साल साहिर लुधियानवी के साथ दोस्ती में गर्क कर दिए। वो साहिर के साए में ही रहे और साहिर ने उन्हें उभरने का मौका नहीं दिया लेकिन जैसे वो ही साहिर की दोस्ती से आज़ाद हुए, उनमें और उनकी शायरी में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ। उसके बाद उन्होंने जो लिखा, उससे उर्दू शायरी के हुस्न में कई गुणा ईजाफा हुआ। सन् 1976 में उनको साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। 19 अगस्त 1976 को मुंबई में ही उनका इंतकाल हो गया। जिंदगी के बारे में उनके सवालात और खयालात कुछ इस तरह के रहे -

फ़ुरसत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारों

ये न सोचो के अभी उम्र पड़ी है यारों

अपने तारीक मकानों से तो बाहर झाँको

ज़िन्दगी शम्मा लिये दर पे खड़ी है यारों

उनके बिन जी के दिखा देंगे चलो यूँ ही सही

बात इतनी सी है के ज़िद आन पड़ी है यारों

फ़ासला चंद क़दम का है मना लें चल कर

सुबह आई है मगर दूर खड़ी है यारों

किस की दहलीज़ पे ले जाके सजाऊँ इस को

बीच रस्ते में कोई लाश पड़ी है यारों

जब भी चाहेंगे ज़माने को बदल डालेंगे

सिर्फ़ कहने के लिये बात बड़ी है यारों

रेहान फ़ज़ल लिखते हैं - जाँनिसार अख़्तर एक बोहेमियन शायर थे। अगर ये कहा जाए कि तरक्कीपसंद शायरी के स्तंभ कहे जाने के बावजूद वो बुनियादी तौर पर एक रूमानी लहजे के शायर थे तो शायद गलत नहीं होगा। हो सकता है कि उन्होंने वक्त के तकाज़ों और सोहबत के असर में कुछ नारेबाज़ी भी कर ली हो लेकिन वो बहुत ही मामूली हिस्सा है उनकी शायरी का। उनकी शायरी में जो रोमांस है, वो ही उसका सबसे अहम पहलू है। वास्तव में रोमांस जाँनिसार अख़्तर का ओढ़ना बिछौना था। बहुत सारे बिखरे काले सफ़ेद बाल, उनको सुलझाती हुई उनकी उंगलियाँ, होठों के बीच दबी सुलगती सिगरेट, सड़क पर घिसटता हुआ चौड़े पांएचे का पाजामा और उस पर टंगी हुई किसी मोटे कपड़े की जवाहर जैकेट, ये थे दूर-दूर के बहुत सारे जाँनिसार अख़्तर! तरक्कीपसंद जनाब अख्तर साम्प्रदायिक सौहार्द के भी कट्टर हिमायती थे। समय-समय पर उनके ऐसे उदगार उनकी रचनाओं में भी नुमाया होते रहे-

एक है अपना जहाँ, एक है अपना वतन

अपने सभी सुख एक हैं, अपने सभी ग़म एक हैं

आवाज़ दो हम एक हैं

ये वक़्त खोने का नहीं, ये वक़्त सोने का नहीं

जागो वतन खतरे में है, सारा चमन खतरे में है

फूलों के चेहरे ज़र्द हैं, ज़ुल्फ़ें फ़ज़ा की गर्द हैं

उमड़ा हुआ तूफ़ान है, नरगे में हिन्दोस्तान है

दुश्मन से नफ़रत फ़र्ज़ है, घर की हिफ़ाज़त फ़र्ज़ है

बेदार हो, बेदार हो, आमादा-ए-पैकार हो

आवाज़ दो हम एक हैं

ये है हिमालय की ज़मीं, ताजो-अजंता की ज़मीं

संगम हमारी आन है, चित्तौड़ अपनी शान है

गुलमर्ग का महका चमन, जमना का तट गोकुल का मन

गंगा के धारे अपने हैं, ये सब हमारे अपने हैं

कह दो कोई दुश्मन नज़र उट्ठे न भूले से इधर

कह दो कि हम बेदार हैं, कह दो कि हम तैयार हैं

आवाज़ दो हम एक हैं

उट्ठो जवानाने वतन, बांधे हुए सर से क़फ़न

उट्ठो दकन की ओर से, गंगो-जमन की ओर से

पंजाब के दिल से उठो, सतलज के साहिल से उठो

महाराष्ट्र की ख़ाक से, देहली की अर्ज़े-पाक से

बंगाल से, गुजरात से, कश्मीर के बागात से

नेफ़ा से, राजस्थान से, कुल ख़ाके-हिन्दोस्तान से

आवाज़ दो हम एक हैं!

असग़र वजाहत कहते हैं - 'जाँ निसार अख़्तर को समझने के लिए सफ़िया अख़्तर को समझना ज़रूरी है। कल्पना कीजिए, 1942-43 में एक मुसलमान जवान ख़ातून किस क़दर गहराई से अपने आप को अपने रिश्ते को देखती हैं और एनालाइज़ करती हैं अपने माशरे को। इस स्तर की इंटेलेक्चुअल किस क़दर बेपनाह, बेतहाशा मोहब्बत करने लगीं जाँनिसार से, उससे लगता है कि उनमें ज़रूर कुछ रहा होगा।' डॉ. गोपीचन्द्र नारंग लिखते हैं कि जां निसार खा़नदान के योगदान के बग़ैर उर्दू अदब की तवारीख़ अधूरी लगती है। वह न सिर्फ़ गज़लें लिखते थे, बल्कि नज़्में, रूबाइयाँ और फिल्मी गीत भी उसी जोश-ओ-जुनून के साथ लिखा करते थे। उनमें वतनपरस्ती कूट-कूट कर भरी थी। वह जिंदगी भर देश के जवानों को जिंदगी की सही राह दिखाते, जगाते, आगाह करते रहे -

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

जो शाने तग़ावत का अलम लेकर निकलते हैं,

किसी जालिम हुकूमत के धड़कते दिल पे चलते हैं,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

जो रख देते हैं सीना गर्म तोपों के दहानों पर,

नजर से जिनकी बिजली कौंधती है आसमानों पर,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

जो आज़ादी की देवी को लहू की भेंट देते हैं,

सदाक़त के लिए जो हाथ में तलवार लेते हैं,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

जो पर्दे चाक करते हैं हुकूमत की सियासत के,

जो दुश्मन हैं क़दामत के, जो हामी हैं बग़ावत के,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

भरे मज्मे में करते हैं जो शोरिशख़ेज तक़रीरें,

वो जिनका हाथ उठता है, तो उठ जाती हैं शमशीरें,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

वो मुफ़लिस जिनकी आंखों में है परतौ यज़दां का,

नज़र से जिनकी चेहरा ज़र्द पड़ जाता है सुल्तां का,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

वो दहक़ां खि़रमन में हैं पिन्हां बिजलियां अपनी,

लहू से ज़ालिमों के, सींचते हैं खेतियां अपनी,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

वो मेहनतकश जो अपने बाजुओं पर नाज़ करते हैं,

वो जिनकी कूवतों से देवे इस्तिबदाद डरते हैं,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

कुचल सकते हैं जो मज़दूर ज़र के आस्तानों को,

जो जलकर आग दे देते हैं जंगी कारख़ानों को,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

झुलस सकते हैं जो शोलों से कुफ्ऱो-दीं की बस्ती को,

जो लानत जानते हैं मुल्क में फ़िरक़ापरस्ती को,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

वतन के नौजवानों में नए जज़्बे जगाऊंगा,

मैं उनके गीत गाता हूं, मैं उनके गीत गाता हूं!

संगीतकार उमर ख़य्याम कहते हैं कि जाँ निसार अख़्तर में अल्फ़ाज़ और इल्म का खज़ाना था। एक-एक गीत के लिए वह कई-कई मुखड़े लिखते थे, धीमे-धीमे गुफ़्तगू करते थे। दरअसल, वह मुशायरे के शायर नहीं थे। फैज अहमद फैज की तरह उनका भी तरन्नुम अच्छा नहीं होता था। अपने संघर्ष के दिनो में मरहूम शायर निदा फ़ाज़ली ने अपनी तमाम शामें उनके साथ बिताई थीं। दोनो आसपास रहते थे। निदा के शब्दों में 'साहित्य में लगाव होने के कारण मैं जाँनिसार के करीब आ गया था और मेरी हर शाम कमोबेश उनके ही घर पर गुज़रती थी। मेरे जाने का रास्ता उनके घर के सामने से गुज़रता था।

जब मैं सोचता था कि उनके यहाँ न जाऊँ क्योंकि रोज़ जाता हूँ तो अच्छा नहीं लगता, तो अक्सर अपनी बालकनी पर खड़े होते थे और मुझे गुज़रता देख कर पुकार लेते थे। वो दिन जाँनिसार अख़्तर के मुश्किल दिन थे। साहिर लुधियानवी का सिक्का चल रहा था। साहिर को अपनी तन्हाई से बहुत डर लगता था। जाँनिसार इस ख़ौफ़ को कम करने का माध्यम थे जिसके एवज़ में वो हर महीने 2000 रूपये दिया करते थे। ये जो अफ़वाह उड़ी हुई हैं कि वो साहिर के गीत लिखते थे, ये सही नहीं है लेकिन ये सच है कि वो गीत लिखने में उनकी मदद ज़रूर करते थे।' जिंदगी पर उनकी एक और मशहूर रचना, जिसे लोग आज भी गुनगुनाया करते हैं -

ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो

कुछ न कुछ हमने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो

कू-ए-क़ातिल की बड़ी धूम है चलकर देखें

क्या ख़बर, कूचा-ए-दिलदार से प्यारा ही न हो

दिल को छू जाती है यूँ रात की आवाज़ कभी

चौंक उठता हूँ कहीं तूने पुकारा ही न हो

कभी पलकों पे चमकती है जो अश्कों की लकीर

सोचता हूँ तिरे आँचल का किनारा ही न हो

ज़िन्दगी एक ख़लिश दे के न रह जा मुझको

दर्द वो दे जो किसी तरह गवारा ही न हो

शर्म आती है कि उस शहर में हम हैं कि जहाँ

न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो

यह भी पढ़ें: 11 वर्ष की उम्र में प्रथमा परीक्षा प्रथम श्रेणी में और 16 वर्ष की आयु में शास्त्री की उपाधि लेने वाले साहित्यकार

Add to
Shares
23
Comments
Share This
Add to
Shares
23
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें