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बनारस की गलियों में 'खुशहाली' के दीप जलाते एक डॉक्टर, तैयार कर रहे हैं 'हैप्पीनेस आर्मी'

'खुशहाली गुरु' के नाम से मशहूर हैं प्रोफेसर संजय गुप्ता....अपने शिविर में अब तक हजारों लोगों का कर चुके हैं इलाज...लोगों को देते हैं खुशहाली के मंत्र...

31st Mar 2016
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ऊपरवाले का दिया उनके पास सब कुछ है. देश के प्रतिष्ठित बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में वो प्रोफेसर हैं. अच्छी तनख्वाह पाते हैं. समाज में शोहरत है. घर परिवार से वो संपन्न हैं. उनके पास वो सब कुछ है जिसकी हसरत एक आम आदमी अपनी जिंदगी में पाले रखता है. इसके बाद भी कोई अगर कोई गैरों के चेहरे पर मुस्कान के लिए अपने कार्य क्षेत्र को विस्तार दे, अपने फुर्सत के पलों को दूसरों पर निसार कर जिंदगियां संवार दे तो भला ऐसी शख्सियत को कोई क्या नाम देंगे. यह कोई पहेली नहीं बल्कि ऐसे ही हैं मनोचिकित्सक डॉ प्रोफेसर संजय गुप्ता. यानि खुशहाली गुरु. बनारस और उसके आसपास के जिलों में लोग उन्हें इसी नाम से पुकारे हैं. आप कभी भी तनाव में रहिए. किसी भी बात को लेकर टेंशन में हों. बस एक बार खुशहाली गुरु से मिल लीजिए. फिर देखिए. यकीन मानिए मिनटों में टेंशन को टाटा बोल देंगे आप. ना दवा ना महंगा इलाज. बस खुशहाली गुरु की संगत में कुछ पल बिताइए. और नतीजा देखिए. 

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कैसे बने 'खुशहाली गुरु' ?

दरअसल आधुनिकता के इस दौर में हर कोई आपाधापी में जी रहा है. हजारों ख्वाहिशें हैं. आगे निकलने की होड़ में खुशियां पीछे छूट रही हैं. नतीजा आदमी परेशान रहने के साथ धैर्य खोता चला जाता है. बीएचयू आईएमएस के मनोचिकित्सा विभाग में तैनात डॉक्टर संजय गुप्ता ने लोगों की इन्हीं परेशानियों को समझा. उन्होंने देखा अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीज जितना परेशान हैं. उससे कहीं ज्यादा मरीज के साथ आने वाला तीमारदार तनाव में है. उन्होंने महसूस किया कि तमाम लोग बिना किसी रोग-व्याधि के बेहद परेशान हैं. इन लोगों की लिस्ट में छात्र-छात्राओं के साथ ही विभिन्न आयु आय वर्ग के नौकरीपेशा और व्यापारियों के नाम हैं. डॉक्टर संजय गुप्ता ने पाया है कि हजारों लोग ऐसे हैं जिन्हें किसी तरह की बीमारी नहीं है. फिर भी परेशान हैं. मानसिक रुप से अस्वस्थ हैं. लोगों की इन परेशानियों पर संजय गुप्ता ने लंबे समय तक अध्ययन किया. देश के बड़े-बड़े विशेषज्ञों के साथ अपने छात्रों के साथ भी वार्ता की. बाद में उन्हें आभास हुआ कि हमारे हेल्थ सिस्टम में ही कमी है, जिसे दुरुस्त करने की जरुरत है. उन्होंने ये तय किया कि कई बीमारियों का सबसे बड़ा कारण तनाव है. इसलिए बीमारियों को जड़ से उखाड़ने के लिए उन्होंने तनाव को मिटाना होगा. उन्होंने पाया कि अगर तनाव को हटाना है तो लोगों के मन में अंधियारी कोठरी में खुशहाली के दीपक जलाना पड़ेगा. संजय गुप्ता ने एक ऐसे समाज का सपना देखा जिसमें लोग बेवजह तनाव से दूर खुशहाली की जिंदगी जीयें. अपने मिशन को पूरा करने के लिए मार्च 2005 में 'खुशहाली' नाम के एक अभियान की शुरुआत की. बाद में संजय गुप्ता खुशहाली गुरु के नाम से जाने लगे.


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लोगों को देते हैं 'खुशहाली मंत्र'

लोगों के चेहरे पर खुशहाली लाने के लिए उन्होंने मुहिम छेड़ दी. कुछ ही दिनों बाद ये मुहिम एक जुनून में तब्दील हो गई. पैसों की परवाह किए बगैर संजय गुप्ता समाज को एक नई दिशा देने में जुट गए. उनके कंधे पर बीएचयू में छात्रों को पढ़ाने के साथ ही मरीजों के इलाज का भी जिम्मा था. लेकिन संजय ने अपने व्यस्त शिड्यूल के बीच अपने अभियान के लिए वक्त निकालना शुरू कर दिया. अपने कुछ साथियों को लिया और बनारस की गलियों में खुशहाली का दीपक जलाने निकल पड़े. अभियान ने जोर पकड़ा. देखते ही देखते इस अभियान ने आंदोलन का शक्ल ले लिया. प्रोफेसर संजय गुप्ता प्रत्येक रविवार को शहर के अलग अलग कोने में शिविर लगाते हैं. मानसिक रुप से परेशान लोगों के बीच वक्त गुजारते हैं. उनसे संवाद करते हैं. उनकी परेशानियों को समझते हैं और फिर अपने तरीके से उसका इलाज करते हैं.

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काम करने का तरीका

यकीनन संजय गुप्ता बीएचयू जैसे प्रतिष्ठित अस्पताल में मनोवैज्ञानिक हैं, लेकिन उनके काम करने का तरीका बेहद अलहदा है. वो दूसरे डॉक्टरों की तरह महंगे इलाज या फिर किसी तरह की थेरैपी में विश्वास नहीं करते. बल्कि लोगों की परेशानियों को दूर करने के लिए उन्होंने एक अलग तरह की पद्धति को अपनाया. 'खुशहाली' शिविर में पहुंचने वाले लोगों का संजय गुप्ता एक खास तरह से इलाज करते हैं. वो लोगों को दो तरह के एक्सरसाइज बताते हैं. इसमें एक है वायु शक्ति अभ्यास और दूसरा है मन शक्ति अभ्यास. वायु शक्ति में जहां नकारात्मक ऊर्जा को घटाने पर जोर दिया जाता है वहीं मन शक्ति में संगीत और ध्यान के जरिए इलाज किया जाता है. यही नहीं 'खुशहाली गुरु' लोगों के साथ बातचीत कर उनकी मनोदशा को समझते हैं और अपने स्तर से बदलाव करने की कोशिश करते हैं. संजय गुप्ता खुशहाली के सात मंत्रों के जरिए लोगों के तनाव को कम करने की कोशिश करते हैं. ये मंत्र बेहद सामान्य होते हैं. अपने शिविर में वो लोगों से खुला संवाद करते हैं. यही नहीं प्रो. गुप्ता ने खुशहाली शिविर में आने वाले लोगों के लिए खुशहाली साफा भी तैयार करवाया है जिसका रंग उगते सूरज का है. प्रो. गुप्ता का मानना है कि जिस प्रकार उगता सूरज लोगों के शरीर को स्फूर्ति प्रदान करने वाली उर्जा देता है ठीक उसी प्रकार उनके शिविर के माध्यम से लोगों में खुशियां बांटने का प्रयास किया जाता है. योर स्टोरी से बात करते हुए प्रो. गुप्ता कहते हैं, 

"इस अभियान के माध्यम से लगाये जाने वाले शिविरों में तनाव से दूर रहने व खुशमिज़ाजी को अपने व्यवहार में लाने के गुण बताये जाते हैं. जब व्यक्ति खुश होगा तो वह एक खुशहाल समाज का निर्माण करेगा जिससे समाज में फैली विकृतियां और कुरीतियां अपने आप समाप्त हो जायेंगें ''


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अभियान से जुड़े चुके हैं हजारों लोग

आलम ये है कि खुशहाली अभियान से देशभर के लगभग 25 हज़ार लोग जुड़ चुके हैं. 'खुशहाली गुरु' बनारस के अलावा उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, केरल, दिल्ली, हरियाणा व राजस्थान सहित कई अन्य राज्यों में इस अभियान के तहत 700 से भी अधिक शिविर आयोजित कर चुके हैं. सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी खुशहाली गुरु का डंका बजता है. जर्मनी, अमेरिका सहित कई देशों में वो व्याख्यान देने जाते हैं. अपने अभियान को तेज करने के लिए खुशहाली गुरु टेक्नेलॉजी का भी सहारा ले रहे हैं. आने वाले दिनों में संजय गुप्ता एप्प के जरिए लोगों से सीधे जुड़ेंगे और ऑनलाइन लोगों की समस्याओं को दूर करने की कोशिश करेंगे. योर स्टोरी से बात करते हुए संजय गुप्ता बताते हैं, 

"आने वाले दिनों में हैप्पीनेस ऑर्मी बनाने जा रहे हैं, इसका मकसद हर शहर में मानसिक रुप से परेशान और तनावग्रस्त लोगों की मदद करना है."
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आसान नहीं थी खुशहाली की ये राह

ऐसा नहीं है कि समाजसेवा की ये राह खुशहाली गुरु के लिए आसान थी. अमेरिका में प्रारंभिक शिक्षा लेने वाले संजय गुप्ता का परिवार बनारस के सुखी संपन्न लोगों में है. अपने माता पिता के इकलौते संतान संजय गुप्ता शुरु से ही बेहद मेधावी छात्रों में थे. बारहवीं की पढ़ाई के बाद एक साथ देश के सात मेडिकल कॉलेजों में उन्होंने इंट्रेंस एक्जाम में क्वालीफाई किया. लेकिन उन्होंने बीएचयू को चुना और बाद में इसी को अपनी कर्मस्थली बना ली. आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले संजय गुप्ता का मन शुरू से ही समाजसेवा में लगता था. हालांकि बीएचयू में काम करने के दौरान जब उन्होंने समाजसेवा करने की ठानी तो लोगों ने उनकी काफी खिल्ली उड़ाई, लेकिन संजय अपने इरादे पर डटे रहे. प्रो. गुप्ता के प्रयास का यह प्रभाव रहा कि 2013 में संयुक्त राष्ट्र ने 20 मार्च की तिथि को वर्ल्ड हैप्‍पीनेस डे के रूप में घोषित कर दिया और यह माना कि एक अच्छे समाज के लिए खुशहाली का होना बेहद जरूरी है. प्रो. संजय गुप्ता के लिए ये एक बड़ी जीत की तरह है.

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