संस्करणों
प्रेरणा

'अति' हमेशा बुरी होती है, मर्यादा और संयम में रहकर जीवन में खुशियां बढ़ाना सीखें-आशुतोष

योरस्टोरी टीम हिन्दी
3rd Oct 2015
Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share
image


‘‘शराब का एक पीपा जो चमत्कार कर सकता है वह संतो से भरा एक चर्च भी नहीं कर सकता।’’

यह एक बहुत पुरानी इतालवी कहावत है। ज़रूरी नहीं कि यह कहावत पूरी तरह से सही हो, पर ज़रूरी यह भी नहीं कि यह कहावत पूरी तरह से ग़लत हो। हर चीज़ को देखने के दो तरीके होते हैं। एक अच्छा और दूसरा ख़राब। आप उपरोक्त कहावत को ही लीजिए। शराब के साथ कई मिथक तरह के जुड़े हुए हैं, जिनमें से एक यह भी है कि शराब के इस्तेमाल पर लगाम लगाई जा सकती है और इसका सेवन रोका जा सकता है। 

आइए शराब से जुड़ी एक सच्चाई से आपको रू-ब-रू कराता हूं। एक नौसखिये संवाददाता की तरह मुझे वर्ष 1990 में श्रीनगर जाने का मौका मिला था और उस समय घाटी में आतंकवाद अपने चरम पर था। कश्मीर का माहौल बहुत खराब था। मैं डल लेक के किनारे पर स्थित सेंटूर होटल में ठहरा हुआ था। सुबह के पहले पहर में मैंने रिसेप्शन पर एक अजीब से वाकया देखा। रिसेप्शन पर मौजूद मैनेजर को मैंने डर के मारे कांपते हुए लगभग बेहोश होने वाली हालत में पाया। मैंने दूसरों से इस बात की ताकीद की तो पता चला कि अभी-अभी एक आतंकी यहां आया और उसने शराब की एक बोतल मांगी। वह आतंकी होटल में एक पर्यटक का रूप धारण कर आया था। वह शराब के लिये बार-बार जोर डालता रहा और जब उसे इस बात का भरोसा हा गया कि उसे यहां शराब की बोतल नहीं मिलेगी तो उसने अपनी पिस्टल बाहर निकाली और मैनेजर के माथे पर सटाते हुए उससे बोला, ‘‘आज तुमने अपनी जान बचा ली है। अगर तुमने मुझे शराब की बोतल दे दी होती तो अबतक तुम मार दिये गए होते।’’

इतना सुनने के बाद मैंने तुरंत उस होटल से अपना सामान उठाया और पास के एक दूसरे नामचीन होटल में चला गया। मेरे भीतर का युवा उस समय दूसरों के बीच होने वाली गोलीबारी का निशाना बनकर अपना जीवन नहीं गंवाना चाहता था। मुझे उम्मीद थी कि दूसरे होटल का माहौल थोड़ा सही होगा क्योंकि वह शहर के बीचोंबीच स्थित था। सूरज के ढलने के साथ ही मैं अपना काम निबटाकर होटल के अपने कमरे में आ गया और तभी मैंने अपने दरवाजे पर एक दस्तक सुनी। मैंने देखा कि होटल के रिसेप्शन से एक युवा कर्मचारी मेरे दरवाजे पर खड़ा है और उसने मुझसे बड़ी विनम्रता से पूछा कि क्या मुझे बोतल चाहिये। यह सुनते ही मेरा रोम-रोम कांप गया। मुझे एकदम महसूस हुआ कि कहीं यह मुझे और अधिक डरावने और भयानक अंत की ओर ले जाने के लिये कोई चाल तो नहीं है। मैंने क्षणभर गंवाए बिना उसे मना किया और दरवाजा बंद कर लिया। इस बात को कुछ ही देर हुई थी कि दोबारा किसी ने मेरे दरवाजे पर दस्तक दी। इस बार दरवाजे पर एक वरिष्ठ पत्रकार थे और वे अपने लिये हमप्याला साथी तलाश रहे थे। मैंने उन्हें भीतर आने दिया। उन्होंने पूछा, ‘‘क्या तुम पीते हो?’’ और मेरे जवाब का इंतजार किये बिना उन्होंने रिसेप्शन को फोन मिला दिया। मैं यह देखकर काफी डर गया कि तुरंत ही हमारे सामने शराब की एक बोतल पेश थी। मैं इस बात को लेकर काफी डरा हुआ था कि अब हमारे साथ कुछ बहुत ही बुरा होने वाला है लेकिन उन वरिष्ठ पत्रकार ने मुझे शांत करते हुए कहा, ‘‘डरो मत। आतंकियों द्वारा शराब पर प्रतिबंध सिर्फ कश्मीरियों के लिये है। दूसरों के लिए यह आसानी से उपलब्ध है और किसी बाहरी के पीने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं होती है। तुम्हें कोई आकर छूएगा तक नहीं।’’

इसके बाद मुझे कई बार कश्मीर जाने का मौका मिला और अपनी पसंद की शराब पीना कभी भी समस्या या चुनौती नहीं रही। हर ब्रांड बड़ी आसानी से उपलब्ध थी। इसके अलावा मैं गुजरात भी गया जो ड्राई स्टेट के रूप में पहचाना जाता है और पूरे राज्य में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध है। लेकिन आप वहां के किसी भी नागरिक से पूछिये तो वह दौरा करने वाले किसी भी पत्रकार के सामने खुलकर कहानी सुनाएगा कि कैसे इस राज्य में प्रतिबंध के बावजूद दुनिया की बेहतरीन ब्रांड की शराब आसानी से उपलब्ध है और तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के कथित प्रशासनिक कौशल के बावजूद करोड़ों रुपये से भी अधिक का एक समानांतर व्यवसाय संचालित हो रहा है। मोदी जी अमरीका के दौरे पर थे और यहां दिल्ली में इस बात को लेकर एक बहस छिड़ गई है कि क्या शराब पीने की आयु को 25 वर्ष से कम करके 18 वर्ष कर देना चाहिये। यहां तक कि मुझे भी यह जानकर काफी अचंभा हुआ कि आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा जो वोट देते हुए मतपत्र के माध्यम से देश के भाग्य का फैसला करने का अधिकार रखता है उसे इतनी भी आजादी नहीं है कि वह अपनी मर्जी से अपना गला तर कर सके। यह मेरे लिये एक बहुत बड़ी खबर थी कि 25 वर्ष से कम आयु के युवाओं के शराब पीने की अनुमति नहीं है।

एक नौजवान के रूप में मेरा लालन-पालन एक ऐसे माहौल में हुआ जिसमें शराब पीना सामाजिक बुराई का एक प्रतीक था। मेरे पिता कभी-कभार शराब का सेवन करने वालों में से थे और एक तरह से उन्होंने इस बात को दुनिया से छिपाकर रखा था। वे साल में सिर्फ एक या फिर दो बार ही पीते थे। जेएनयू में दाखिला लेने के बाद मेरा सामना एक बिल्कुल ही अलग वास्तविकता से हुआ। यहां पर पीने को वर्जित या फिर पाप नहीं माना जाता था। यहां तक कि सबसे अच्छे दिमाग और शिष्ट कहे जाने वाले छात्र और प्रोफेसर भी खुलेआम मदिरापान करते देखे जा सकते थे। यहां तक कि लड़कियां भी अपनी पसंद के पेय के बारे में खुलकर बात करने में पीछे नहीं रहती थी। सामने आने वाला कोई भी अवसर सामूहिक रूप से पीने-पिलाने का एक बहाना बन जाता था। ऐसे माहौल में मैं भी धीरे-धीर खुलने लगा। लेकिन इसके बावजूद मैं एक ‘‘अच्छा लड़का’’ था जो अपनी पारंपरिक सोच और रूढ़िवादी परवरिश के बीच कहीं फंसा हुआ था। मुझे इस बात का अहसास था कि यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम अपने लिये क्या चुनते हैं और मैंने अपने लिये बीच का रास्ता चुना। मैंने अपने आप से वादा किया कि मैं कभी अपने पिता के पैसों को शराब पर खर्च नहीं करूंगा। जिस दिन मुझे अपनी पहली कमाई के 300 रुपये मिले मैंने अपने एक दोस्त के साथ ओल्ड माँक की एक बोतल का आनंद लिया।

इस जादूई पेय के साथ मेरा प्रथम परिचय बहुत ही बेहतरीन रहा। मुझे बहुत अच्छी नींद आई अगली सुबह मैं तरोताजा और फिट उठा। मुझे अपने इस कृत्य पर कोई शर्मिंदगी नहीं थी और मैं यह नहीं समझ पा रहा था कि क्यों धर्म इसे पाप समझता है। इसके अलावा मैं इस सवाल से भी दो-चार हुआ कि क्यों समाज व्याकुल होता है ? किसी व्यक्ति या संस्कृति की नैतिक रूपरेखा को तय करने वाले ये कौन होते हैं? यह कड़वे स्वाद की कुछ ऐसी बूंदें हैं जो भीतर एक सनसनी पैदा करती हैं और कुछ देर के लिये हमें एक बिल्कुल दूसरी दुनिया में ले जाती हैं! ऐसे में मुझे एक बहुत पुराना शेर याद आता है - मुल्ला शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर, या वो जगह बता जहां खुदा नहीं।

आज मैं पीता हूं। मैं बिना किसी अपराधबोध या शर्मिंदगी के अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों के साथ मदिरा का आनंद लेता हूं। और जब मैं तमाम टीवी चैनलों पर इस बात को लेकर बहस होते देखता हूँ कि दिल्ली सरकार द्वारा इस बात पर सिर्फ चर्चा की पहल की गई है कि शराब पीने की उम्र को घटाकर 18 वर्ष कर दिया जाए तो मुझे नैतिकता के उपदेश देने वाले उन कथित बुद्धिजीवियों पर दया आती है जिनका यह मानना है कि इसे समाज अधिक बिगड़ेगा और अपराध के ग्राफ में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी।

दिल्ली में युवाओं को पीने के लिये किसी कानून की जरूरत नहीं है। नई पीढ़ी पहले से ही काफी तेज है। उन्हें अपनी ड्रिंक से प्यार है और उनके लिये कोई रोक मायने नहीं रखती। अगर सिलिकाॅन वैली दिल्ली में होती तो एप्पल रिवाॅल्यूशन के तमाम प्रणेता आज जेल में सड़ रहे होते और यह दुनिया निश्चित ही इस क्रांति से महरूम होती क्योंकि इस तकनीकी क्रांति से जुड़े लोग कहीं न कहीं इसके साथ जुड़े हुए हैं। मेरे प्यारे मित्रों, यह सब सिर्फ अपनी ड्रिंक पर पकड़ बनाये रखने के बारे में है। परेशानी तब आती है जब व्यक्ति नियंत्रण खो देता है, समाज आंखें मूंद लेता है अपना डंडा चलाना भूल जाता है। अगर शराब का सेवन डाॅक्टर की सलाह के अनुसार किया जाए तो यह दवा का काम करती है लेकिन जब यह पीने वाले को ही पीने लगे तो यह नर्क और पाप का रूप धारण कर लेती है। पंजाब में इसने एक पूरी पीढ़ी को बर्बाद कर दिया है जबकि दूसरी तरफ सिलिकाॅन वैली में यह एक क्रांति की वाहक बनी। अब चुनाव आपका स्वयं का है।

(यह लेख मूलतः अंग्रेजी में लिखा गया है और इसके लेखक पत्रकार से आम आदमी पार्टी के नेता बने आशुतोष हैं। लेख में प्रस्तुत सभी विचार लेखक के निजी हैं। इससे सम्बन्धित सारी टिप्पणी और सवालोंं के जवाब आशुतोष ही देंगे। )

Add to
Shares
0
Comments
Share This
Add to
Shares
0
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags