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'मीटू' की गिरफ्त में बॉलीवुड हस्तियां, मंत्री-पत्रकार भी

posted on 16th October 2018
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सख्त कानूनी ढांचे के बावजूद महिलाओं के प्रति अपने व्यवहार में बदलाव लाने में अभी भारतीय समाज को लंबा सफर तय करना पड़ सकता है। अब भी तमाम नियोक्ता कानून का पालन नहीं कर रहे हैं। 'मीटू' कैंपेन को राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी गंभीरता से लिया है। आयोग इस अभियान के बारे में आधिकारिक बयान 17 अक्तूबर को जारी करेगा। इस अभियान की जद में बॉलीवुड की कई हस्तियां तो हैं ही, मंत्री और पत्रकार भी आ गए हैं।

सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर


हमारे देश में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न एक आम समस्या बन चुकी है। कामकाजी महिलाओं का ऐसा उत्पीड़न एक घिनौना व्यवहार है, जो उसे अंदर तक झकझोर कर रख देता है। 

'मीटू' कैंपेन को अब राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी गंभीरता से अपने संज्ञान में ले लिया है। राष्ट्रीय महिला आयोग के एक अध्ययन के मुताबिक करीब 46.58 प्रतिशत महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, जबकि 25.17 प्रतिशत महिलाओं के साथ अवांछित व्यवहार होता है। जहां तक कार्यस्थल पर महिला कर्मचारियों को माहौल देने और यौन उत्पीड़ के मामलों में विकल्प चुनने का सवाल है तो इसमें सार्वजनिक और निजी कंपनियों में कुछ अंतर है। यौन उत्पीड़न के मामले में रोकथाम के लिए काम कर रहे एक विशेषज्ञ के मुताबिक यौन उत्पीड़न की शिकायत के समाधान के बाद महिलाओं के सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में काम जारी रखने की संभावना है। देश-दुनिया में आज मीटू कैंपेन के तहत लाखों लड़कियां आगे आकर आपबीती सुना रही हैं।

सोशल मीडिया पर इस पूरे आंदोलन में स्वयं के उत्पीड़न के सैकड़ों महिलाओं के खुलासे ने राष्ट्रीय महिला आयोग को बोलने के लिए विवश कर दिया है। आयोग ने कहा है कि वह उन सभी पीड़ित महिलाओं से बात करेगा और उनके साथ हुई घटना की पूरी जाकारी लेगा, जिन्होंने सोशल मीडिया पर अपने दर्द को साझा किया है। आयोग का कहना है कि वह मीडिया के जरिए सामने आने वाले विभिन्न यौन उत्पीड़न के आरोपों की विस्तृत जानकारी इकट्ठा करने के साथ ही पीड़ितों से खुद संपर्क भी कर रहा है। आयोग का कहना है कि इस अभियान या आंदोलन के बारे में आधिकारिक बयान आयोग 17 अक्तूबर को जारी करेगा। इस अभियान की जद में बॉलीवुड की कई हस्तियां तो हैं ही, मंत्री और पत्रकार भी आ गए हैं।

प्राइवेट अथवा सरकारी कंपनियों में बड़ी संख्या में महिलाएं भी काम करती हैं। प्रबंधन प्रायः उनकी ऐसी दिक्कतों को दरकिनार रखने की कोशिश करता है। एक 'बिज़नेस रिस्पॉन्सिबिलिटी रिपोर्ट' के मुताबिक जब एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय कंपनी में काम करने वाली महिला ने यौन शोषण मामले की शिकायत की तो दोषी व्यक्ति को सजा हुई लेकिन पीडि़त को भी इसका खमियाजा भुगतना पड़ा। पूरे ऑफिस में उसके बारे में कानाफूसी शुरू हो गई और कई मौकों पर तो उसे यह आभास कराया गया गया कि वह दोषी की नौकरी लेने की कसूरवार है। भारतीय कंपनियों में इस तरह की घटनाओं का खमियाजा अधिकतर महिलाओं को ही भुगतना पड़ रहा है। इन कंपनियों में यौन शोषण की 500 से कम शिकायतें मिलीं, जबकि इन कंपनियों में महिला कर्मचारियों की संख्या लगभग सवा चार लाख बताई जाती है। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक जिन पचास से अधिक कंपनियों के तीन साल से अधिक आंकड़े उपलब्ध हैं, उनमें प्रति दस हजार महिला कर्मचारी करीब एक दर्जन शिकायतें पाई गई हैं लेकिन कार्यस्थलों पर महिलाओं के साथ यौन शोषण को लेकर हुए अध्ययनों में सामने आए आंकड़ों की तुलना में ये शिकायतें बहुत कम मानी गई हैं।

हमारे देश में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न एक आम समस्या बन चुकी है। कामकाजी महिलाओं का ऐसा उत्पीड़न एक घिनौना व्यवहार है, जो उसे अंदर तक झकझोर कर रख देता है। एक महिला के साथ बॉस, सहकर्मियों अथवा पर्यवेक्षकों द्वारा यौन उत्पीड़न या किसी भी प्रकार का शारीरिक, मानसिक तथा व्यवहारिक उत्पीड़न एक दंडनीय अपराध है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इस संबंध में कई कानून लागू किए गए हैं। कार्यस्थल पर एक महिला के उत्पीड़न का मतलब है कि उसकी समानता, जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार के साथ खिलवाड़ करना। यह कार्य एक शत्रुतापूर्ण कामकाजी वातावरण पैदा करता है, जो महिलाओं को भलीभाँति अपने काम से हतोत्साहित करता है और इससे समाज में महिलाओं का विकास भी प्रभावित होता है।

संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के अनुसार, समानता पर बल देने और लिंग, धर्म, जाति या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव करने पर रोक लगाई गई है। अनुच्छेद 19 के अनुसार, सभी नागरिकों चाहे वह पुरुष हो या महिला, उनको किसी व्यवसाय को चुनने या कार्य करने और किसी भी व्यापार, व्यवसाय या पेशे को शुरू करने का समान अधिकार है। अनुच्छेद 21 के अनुसार, प्रत्येक नागरिक को गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने का अधिकार है। सभी लोगों को महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर आदर, सभ्यता और गरिमा के साथ व्यवहार करना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय के 'विशाखा' दिशा-निर्देशों के मुताबिक नियोक्ता द्वारा कार्यस्थल पर एक शिकायत समिति का गठन किया जाना चाहिए। सभी नियोक्ताओं को कानूनों से अवगत होना चाहिए और किसी भी रूप से उत्पीड़न को रोकना चाहिए। कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए कोई प्रतिकूल वातावरण नहीं होना चाहिए। उत्पीड़ित व्यक्ति अपने स्थानान्तरण या दोषी व्यक्ति के स्थानान्तरण के लिए कह सकता है। कार्यस्थल पर महिलाओं के उत्पीड़न को थामने के लिए रोकथाम, निषेध और निवारण अधिनियम, 2013 भी बनाया गया है। इस अधिनियम द्वारा 2013 में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित विशाखा दिशा निर्देशों को अधिक्रमित कर दिया गया। महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए लोकसभा द्वारा 3 सितंबर 2012 को और राज्यसभा द्वारा 26 फरवरी 2013 को यह अधिनियम पारित किया गया था। यह अधिनियम 9 दिसंबर 2013 को लागू हुआ था, लेकिन इस अधिनियम को राष्ट्रपति की सहमति 23 अप्रैल 2013 को मिली थी।

अधिनियम में प्रावधान किया गया है कि सभी कार्यालयों में 10 से अधिक कर्मचारियों के लिए, वहाँ की शिकायतों से निपटने हेतु एक अनिवार्य शिकायत समिति होनी चाहिए। कर्मचारियों के बीच के दो सदस्यों को सामाजिक कार्य या कानूनी ज्ञान का अनुभव होना चाहिए। साथ ही शिकायत समिति का एक सदस्य यौन उत्पीड़न से संबंधित मुद्दों से संबंधित गैर-सरकारी संगठनों से होना चाहिए। नामांकित सदस्यों में से पचास प्रतिशत महिलाएं होनी चाहिए। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामलों को 90 दिनों के अंदर वहाँ की शिकायत समितियों द्वारा हल करना होगा अन्यथा जुर्माना लगाया जाएगा, जिससे कार्यालय का पंजीकरण या लाइसेंस रद्द हो सकता है। यौन उत्पीड़न के आरोपी व्यक्ति को बरखास्त किया जा सकता है। इसके अलावा अगर आरोप झूठे साबित होते हैं, तो शिकायतकर्ता को इसी तरह की सजा का सामना करना पड़ सकता है।

अधिनियम के तहत उनकी भूमिका और कर्तव्यों का उल्लंघन करने के मामले में दोषी व्यक्ति पर 50 हजार रुपये जुर्माना लगाया जा सकता है। दंड के रूप में 1 से 3 वर्ष तक का कारावास या जुर्माना हो सकता है। पीड़िता को अपराधियों की रिपोर्ट करनी चाहिए। 'तहलका' मैग्जीन के फाणेष मूर्ति और तरुण तेजपाल जैसे उच्च प्रोफाइल वाले यौन उत्पीड़न के कुछ मामलों को देखते हुए, कई संगठनों का मुख्य भय प्रतिष्ठा का नुकसान है। यह एक बेहतर कदम साबित हो सकता है, क्योंकि इससे कंपनियाँ प्रतिष्ठा और एक वित्तीय पतन जैसे नुकसान का सामना करने की बजाय, कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न की रोकथाम पर ध्यान केंद्रित करेंगी। सवाल है कि क्या ऐसे कठोर प्रावधानों के बावजूद यह भरोसा किया जा सकता है कि सभी कानूनों के विपरीत, यह प्रावधान महिलाओं को स्वतंत्रता दिला सकता है?

स्नेहा फाउंडेशन में प्रीवेंशन ऑफ वायलेंस अगेंस्ट वीमन ऐंड चिल्ड्रन की प्रोग्राम डायरेक्टर नायरीन दारूवाला का कहना है कि कंपनियां केवल गंभीर मामलों में ही कार्रवाई करती हैं। संभव है कि इससे पीड़ित को भी अपनी शिकायत को नजरअंदाज करना पड़ता है। छोटे-मोटे मामलों की शिकायज दर्ज नहीं होती है। ऑक्सफैम इंडिया और सोशल ऐंड रूरल रिसर्च इंस्टीट्यूट द्वारा कराए गए अध्ययन 'सेक्सुअल हरासमेंट ऐट वक्र्सप्लेसेज इन इंडिया' के मुताबिक सत्रह प्रतिशत महिलाओं को कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। अगस्त, 2010 में कराए गए एक अन्य अध्ययन (द रॉयटर्स/इप्सॉस पोल ऑन असॉल्ट ऐंड हरासमेंट इन द वर्कप्लेस) के मुताबिक यह आंकड़ा छब्बीस प्रतिशत का रहा। इसका एक कारण यह भी माना जाता है कि लोग सरकारी नौकरी से जुड़ी रोजगार सुरक्षा को हाथ से नहीं जाने देना चाहते, इसीलिए कॉरपोरेट जगत में महिलाओं को इस तरह की स्थिति से बचाने के कई तरह के उपायों के बावजूद ऐसे मामले सामने आने की संख्या बहुत कम है।

शोध से यह बात भी सामने आ चुकी है कि शिक्षित महिलाओं के यौन और शारीरिक हिंसा की शिकायत करने की संभावना ज्यादा रहती है। दिसंबर 2017 में सरकार समर्थित राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में उन महिलाओं को शामिल किया गया था जिन्होंने शारीरिक और यौन हिंसा झेली थी। बारह या उससे अधिक वर्षों तक स्कूल में रहीं महिलाओं के शिकायत करने की संभावना उन महिलाओं से ज्यादा होती है, जो कभी स्कूल नहीं गईं या पांच साल से कम स्कूल गईं। यह अनुपात अब भी बहुत कम है। उधर, सख्त कानूनी ढांचे के बावजूद अब भी तमाम नियोक्ता कानून का पालन नहीं कर रहे हैं। लोगों को महिलाओं के प्रति अपनी सोच और व्यवहार में बदलाव लाने के लिए जागरूक करने में अभी लंबा समय लग सकता है।

यह भी पढ़ें: ‘संवाद’ से एक IAS अधिकारी बदल रहा है सरकारी हॉस्टलों की सूरत

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