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टूटे टूकड़ों को समेटकर फिर से ज़िंदगी जीने का नाम है 'अनु अग्रवाल'

मशहूर अभिनेत्री अनु अग्रवाल की आत्मकथाकिताब का नाम ‘अनयूजवल : मेमोइर ऑफ ए गर्ल हू केम बैक फ्रॉम डेड’ योग की बदौलत अनु को मिली नई ज़िंदगी6 साल में 6 फिल्में की अनु अग्रवाल ने1990 में आई 'आशिकी ' अनु अग्रवाल की पहली फिल्म

16th Aug 2015
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कहते हैं मारने वाले से बड़ा है रक्षा करने वाला-जाको राखे साईंया मार सके ना कोय। ये बात फिल्म अभिनेत्री और एक समय युवाओं के दिलों पर राज करने वाली अनु अग्रवाल पर पूरी तरह सच साबित होती है। वर्ष 1990 में आई फिल्म ‘आशिकी’ में अनु का किरदार निभाने वाली दिल्ली की अनु अग्रवाल 29 दिन कोमा में रहीं। उनके अपनों ने आस छोड़ दी थी। अनु अग्रवाल के परिजनों ने अस्पताल में कई बार ज़िंदगी और मौत को क़रीब से देखा। लेकिन कहते हैं जबतक सांसे हैं उसे कोई नहीं छीन सकता। ज़िंदगी जीत गई। मौत के मुंह से वापस आने की दास्तां और अपनी अंतरंग जिंदगी से जुड़े कई अहम राज को अनु अग्रवाल ने आत्मकथा के माध्यम से उजागर किया है।


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‘अनयूजवल : मेमोइर ऑफ ए गर्ल हू केम बैक फ्रॉम डेड’ के बारे में अनु का कहना है कि यह कहानी उस लड़की है जिसकी जिंदगी कई टुकड़ों में बंट गई थी और बाद में उसने खुद से उन टुकड़ों को इकट्ठा कर जिंदगी को फिर से गूंथा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा बच्चों के एक पहेली वाले खेल में बिखरे हुए टुकड़ों को फिर से जोड़ना होता है।

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अनु दिल्ली से मुंबई गईं। वहां एक अंतरराष्ट्रीय मॉडल बनीं और फिर फिल्मों में काम किया। 6 साल और 6 फिल्में। जब ये चेहरा फिल्मी परदे पर आया तो जमाने को उससे आशिकी हो गई। मासूम चेहरा, छरहरा लंबा कद, सांवली सलोनी सूरत वाली सीधी-सादी सी अनु अग्रवाल ने सिल्वर स्क्रीन पर सनसनी मचा दी थी। लेकिन परदे से गायब हो गई वो हीरोइन। इसके पीछे एक खौफनाक हादसा है। अनु के पुनर्जन्म की कहानी है, मौत के मुंह से बचकर आई रियल लाइफ की हीरोइन की दिल दहला देने वाली दास्तां है। मुंबई में एक रात अनु अग्रवाल पार्टी से लौट रही थीं। तभी अचानक उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई। दुर्घटना में अनु बुरी तरह जख्मी हो गई। अनु के चेहरे और बदन पर गंभीर चोट आई। वो कोमा में चली गई थी और अगले 29 दिनों तक वो कोमा में रहीं। घर वालों ने अनु की ज़िंदगी की आस लगभग छोड़ दी थी। लेकिन एक चमत्कार हुआ और अनु को नई ज़िंदगी मिली। पर ज़िंदगी ऐसी जिसकी किसी को आस नहीं थी। अनु का आधा शरीर पैरालाइज हो गया। वो अपनी याददाश्त खो चुकी थीं। अनु की जान बच गई लेकिन वो ऐसी हो गईं जिसे दुनियादारी के बारे में कुछ भी पता नहीं था। ये अनु अग्रवाल का पुनर्जन्म था।

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हादसे से उबरने के लिए अनु अग्रवाल बिहार के मुंगेर चलीं गईं। मुंगेर के विश्वप्रसिद्ध योग साधना केंद्र को अनु ने अपना घर बनाया। अनु को तलाश थी खुद की वो कौन हैं, कहां से आईं और उनका नाम क्या है। अनु अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी उलझन को सुलझाने की कोशिश कर रही थीं। अनु की इस अनसुलझी जिंदगी को योग से मदद मिली। इसी योग साधना के दौर एक वक्त ऐसा भी आया जब इस हिरोइन को अपना अतीत याद आ गया लेकिन तब तक वक्त फिसल चुका था। फिल्मों में काम करने, संन्यास लेने और फिर एक योग गुरू के रूप में वापस आने की उनकी इस दास्तां को हार्पर कॉलिन्स ने ‘अनयूजवल : मेमोइर ऑफ ए गर्ल हू केम बैक फ्रॉम डेड' के रूप में प्रकाशित किया है।

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अनु खुद को सौभाग्यशाली मानती हैं क्योंकि उनका मानना है कि ज़िंदगी में सही समय पर सही फैसला ही सबसे बड़ा हथियार है। जीवन चलने से ज्यादा सही समय पर सही काम करने का नाम है। उम्मीद जिंदगी है और उसे पाने की कोशिशें ही जीवन की सार्थकता है। हौसले बुलंद हों तो हर मौत के मुंह से भी निकला जा सकता है। 

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अनु का मानना है कि योग की बदौलत जो चमत्कार उनके जीवन में आया उसे शब्दों में उतारना बहुत ही कठिन है।

http://www.anusual.org/

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