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उपेक्षितों और बेसहारों का सहारा, 'जीवन ट्रस्ट'

अनुभव गुप्ता ने 2010 में रखी 'जीवन ट्रस्ट ' की नीव... एलबनिज़म डिसऑडर के लिए चलाया जागरुकता अभियान और किन्नरों की निकाला एलबम...भविष्य में कई और समाज कल्याण के कार्य करने की है योजना 

17th Aug 2015
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हमारा कोई भी काम किसी दूसरे के दिल को तभी छूता है, जब हमारी भावनाएँ भी उस काम से जुड़ी होती हैं। या यूं कहें कि वह काम हमने बहुत ही मन से किया होता है, तभी वे दूसरे के मन को छूता है। यदि हमारे उस काम में मानवता भी जुड़ी हो तो वह कार्य काफी बड़ा हो जाता है और कई लोगों को प्रेरणा भी देता है। ऐसा ही एक कार्य किया 32 वर्षीय अंकुश गुप्ता ने। अंकुश ने 2010 में 'जीवन ट्रस्ट ' की नींव रखी और समाज कल्याण से जुड़े कार्यों में लग गये। अनुभव गुप्ता एक मीडिया प्रोफेशनल हैं, जिनका मीडिया में काफी सफल करियर रहा है। अनुभव हमेशा से कोई ऐसा कार्य करना चाहते थे, जिससे समाज में कुछ सकारात्मक बदलाव लाया जा सके। आज उनकी संस्था जीवन ट्रस्ट इसी कार्य में लगी हुई है। अनुभव ने दो प्रमुख कार्य किए जिसके कारण आज देश भर में उनके कार्यों को सराहा जा रहा है पहला कार्य एलबनिजम यानि रंगहीनता से ग्रसित लोगों की मदद और दूसरा किन्नरों के लिए काम करना।

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एलबनिज़म एक ऐसा डिसऑडर है, जिससे ग्रसित व्यक्ति के शरीर में सफेद के अलावा कोई रंग नहीं होता इसे रंगहीनता भी कहते हैं। अमूमन लोग इसे लीकोडर्मा समझते हैं, लेकिन यह उससे अलग डिसऑडर है। एलबनिज़म से ग्रसित लोगों की दृष्टि भी काफी कमज़ोर होती है। ऑफिसों व अन्य स्थानों में इन लोगों से हर कोई परहेज करता है। इनके साथ खाना नहीं खाते। काफी दूरी बनाए रखते हैं। लोग इनसे हाथ मिलाने व इन्हें टच तक करने से परहेज करते हैं, लेकिन सबसे पहली बात तो यह है कि यह डिसऑडर छूने से नहीं फैलता। दूसरी बात यह कि इस बीमारी का सफाई से कोई लेना देना नहीं है। यानी यदि कोई व्यक्ति इन्हें टच करे तो वह गंदा नहीं हो जाएगा या उसे यह डिसऑर्डर नहीं होगा। एलबनिज़म में शरीर में रंग नहीं बनता जिसके कारण शरीर के हर हिस्से का रंग सफेद रह जाता है। एलबनिज़म से ग्रसित बच्चों को स्कूलों में काफी दिक्कतें होती हैं। कई बच्चे उनके साथ नहीं रहते न ही उनके साथ खेलते हैं। फिर बच्चों के माता पिता ही अपने बच्चों को इन बच्चों से दूर रहने के लिए कहते हैं, जोकि काफी गलत है। लोगों को यह समझना चाहिए कि यह भी किसी के बच्चे हैं या यह बीमारी किसी भी बच्चे के साथ हो सकती है।

 यह बस एक डिसऑडर ही तो है। इसमें किसी की कोई गलती नहीं है और न ही यह फैलने वाला रोग है। ऐसे में लोगों को जागरूक करने की जरूरत है और यही काम किया अनुभव गुप्ता ने शुरु किया। उन्होंने विभिन्न अवेयरनेस कार्यक्रम चलाए। कई स्कूलों में जाकर वे वर्कशॉप्स करते हैं। लोगों से मिलते हैं और उनको इन रोगों की वास्तविक्ता बताते हैं। विभिन्न मीडिया संस्थानों द्वारा भी अंकुश ने एक कैंपेन चलाया ताकि लोगों में जागरुकता आए।
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भक्ति तलाटी जो खुद इस डिसऑडर से पीडि़त हैं, वे खुद मीडिया कर्मी हैं भक्ति कई जगह कॉलम लिखती हैं। वे बताती हैं कि जब वे कहीं जा रही होती हैं तो बच्चे ही नहीं बड़े लोग भी उनकी तरफ काफी अजीब तरह से देखते हैं हालांकि इस चीज का उन्हें कोई फरक नहीं पड़ता, लेकिन यह इस बात को दर्शाता है कि लोगों को एलबनिज़म के बारे में कुछ भी ज्ञान ही नहीं है। वे कहती हैं कि उन्हें इस बीमारी के कारण आजतक कभी भी न तो पढ़ाई के दौरान और न ही नौकरी के दौरान कोई दिक्कत आई। 

जब उन्हें पता चला कि ऐसे कई लोग हैं, जिनको इस कारण काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है तब भक्ति ने तय किया कि वे इस क्षेत्र में काम करेंगीं। भक्ति भी अब जीवन ट्रस्ट को अपना पूरा सहयोग दे रही हैं। जीवन ट्रस्ट अब तक 300 एलबनिज़म से ग्रसित लोगों के साथ है व उनकी हर संभव मदद कर रहा है। अनुभव बताते हैं कि यूनाइटिड नेशन 13 जून को विश्व एलबनिज़म दिवस के रूप में मना रहा है। इससे लोगों को बहुत फायदा मिलेगा उनका ट्रस्ट यूएन के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रहा है।
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अनुभव का दूसरा प्रोजेक्ट किन्नरों का जीवन सुधार रहा है। जब वे छोटे थे तो खुशी के मौके पर जब किन्नर आते और गाना गाते तो उनको हमेशा लगता कि कई किन्नरों की आवाज बहुत अच्छी होती है और वे फिल्मों में गाना आखिर क्यों नहीं गाते। क्यों उन्हें आगे बढऩे का मौका नहीं मिलता। बड़े होते-होते उन्हें इसका कारण समझ आ गया कि किन्नरों की हालत समाज में काफी बुरी है। कई लोग तो उन्हें समाज का हिस्सा तक नहीं समझते। उन्हें लोगों के घरों में नाच-गा कर अपनी जिंदगी चलानी होती है। कोई उनको नौकरी नहीं देता। न ही कोई उनके साथ सही व्यवहार करता है। अनुभव ने तय किया कि वे किन्नरों के टेलेन्ट को दुनिया के सामने लाएंगे, ताकि दुनिया उन्हें टेलेन्ट के आधार पर जाने और उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाए। काम बेहद मुश्किल था और इस काम में उन्हें 17 महीने का समय लगा उन्होंने तय किया कि वे एक एलबम निकालेंगे, जिसमें सुरीली आवाज के धनी किन्नरों से गाने गवाएँगे। और उसके बाद दुनिया के सामने इन आवाजों को लेकर जाएंगे। ताकि दुनिया भी उनके टेलेंट को देखे। जो एलबम अनुभव ने लॉच किया उसमें नौ किन्नरों ने गाया। यह सभी अलग-अलग राज्यों से थे। अलग-अलग भाषाओं में 13 गाने रिकॉड किए गए। इस एल्बम में 6 कंपोजर्स ने काम किया। लगभग 17 महीनों की कड़ी मेहनत के बाद एलबम बन तो गई लेकिन इसे लांच नहीं किया जा सका क्योंकि मामला फंड पर आकर अटक गया। इस एलबम के लिए कोई फंड देने वाला ही नहीं था। काफी मेहनत के बाद एलबम लांच की गई। 

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इस प्रोजेक्ट को यूएनडीपी इंडिया और प्लैनेट रोमियो फॉउंडेशन, नीदरलैंड का सपोर्ट मिला। एलबम के माध्यम से कई अच्छी आवाज़ के धनी इन किन्नरों को एक मंच मिला। 40 साल की अंकुरा काफी अच्छा गाती हैं, लेकिन उनका गाना केवल लोगों के घरों तक सीमित था लेकिन आज अनुभव के प्रयासों से उनके गाने को एक मंच मिला और दुनिया भर के लोग उनके गानों को सुन सकते हैं। अनुभव मानते हैं कि उनके इस प्रयास से समाज में किन्नरों का मान बढ़ेगा लोग उन्हें उनके टेलेन्ट की वजह से उन्हें जानेंगे।

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