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डॉ. कलाम को सबसे ज्यादा पसंद था मां के हाथ का खाना

जय प्रकाश जय
15th Oct 2017
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देश के 11वें राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जीवन में विपरीत परिस्थितियों के होते हुए भी उस शिखर तक पहुंचे, जहां तक पहुंचने वाले दुनिया में कम ही होते हैं। वह हमेशा अपने सपनों पर विश्वास करने की बात कहते थे। उन्हें अपने सपनों पर अटूट भरोसा रहता था।

साभार: ट्विटर

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वह कहते थे कि सपने व नहीं होते, जो आप सोने के बाद देखते हैं, सपने वो होते हैं, जो आपको सोने नहीं देते। जिस तरह मेरी नियति ने आकार ग्रहण किया, उससे किसी ऐसे गरीब बच्चे को सांत्वना अवश्य मिलेगी, जो किसी छोटी सी जगह पर सुविधाहीन सामजिक दशाओं में रह रहा हो।

अपनी मां से उनका सबसे ज्यादा जुड़ाव था। मां आशियम्मा के हाथ का बना खाना उनको सबसे पसंद रहा था। मां के साथ उनका बहुत गहरा रिश्ता था। केले के पत्ते पर मां के हाथ की बनी नारियल की चटनी के साथ चावल और सांभर खाना उन्हें जीवन भर नहीं भूला।

देश के 11वें राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जीवन में विपरीत परिस्थितियों के होते हुए भी उस शिखर तक पहुंचे, जहां तक पहुंचने वाले दुनिया में कम ही होते हैं। वह हमेशा अपने सपनों पर विश्वास करने की बात कहते थे। उन्हें अपने सपनों पर अटूट भरोसा रहता था। वह कहते थे कि सपने व नहीं होते, जो आप सोने के बाद देखते हैं, सपने वो होते हैं, जो आपको सोने नहीं देते। जिस तरह मेरी नियति ने आकार ग्रहण किया, उससे किसी ऐसे गरीब बच्चे को सांत्वना अवश्य मिलेगी, जो किसी छोटी सी जगह पर सुविधाहीन सामजिक दशाओं में रह रहा हो। सबके जीवन में दुख आते हैं, बस इन दुखों में सबके धैर्य की परीक्षा ली जाती है। जीवन में सुख का अनुभव तभी प्राप्त होता है जब इन सुखों को कठिनाइओं से प्राप्त किया जाता है। 

शिखर तक पहुंचने के लिए ताकत चाहिए होती है, चाहे वह माउन्ट एवरेस्ट का शिखर हो या कोई दूसरा लक्ष्य। अगर हमें अपने सफलता के रास्ते पर निराशा हाथ लगती है इसका मतलब यह नहीं है कि हम कोशिश करना छोड़ दें क्योंकि हर निराशा और असफलता के पीछे ही सफलता छिपी होती है। इंतजार करने वालों को केवल उतना ही मिलता है, जितना कोशिश करने वाले छोड़ देते हैं। वह कहते हैं कि देश का सबसे अच्छा दिमाग क्लासरूम के आखिरी बेंचों पर मिल सकता है। यदि आप विकास चाहते हैं तो देश में शांति की स्थिति होना आवश्यक है।

भारतरत्‍न डॉ. कलाम को मिसाइलमैन के नाम से भी जाना जाता है। वह देश के पहले ऐसे राष्ट्रपति रहे, जिन्होंने आखिरी वक्त तक युवाओं और आम लोगों के दिलों पर राज किया। उनका जन्म तमिलनाडु के मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई सेंट जोसेफ कॉलेज, तिरुचिरापल्ली से की थी। उन्हें वर्ष 2002 में भारत का राष्ट्रपति बनाया गया। पांच वर्ष की अवधि पूरी होने के बाद वह पुनः शिक्षा, लेखन और सार्वजनिक जीवन में लौट गए थे। आज उन्हीं की मेहनत का परिणाम है कि भारत एक परमाणुशक्ति संपन्न राष्ट्र है। उन्होंने मुख्य रूप से एक वैज्ञानिक के रूप में चार दशकों तक रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में काम किया, साथ ही इसरो को भी सम्भाला और देश में सैन्य मिसाइल के विकास के प्रयासों में भी शामिल रहे। 

डॉ. कलाम ने सपने सिर्फ देखना नहीं, उन्हें पूरा करना भी सिखाया। एक साधारण परिवार से होने के बावजूद अपनी मेहनत और समर्पण के बल पर बड़े से बड़े सपनों को साकार करने की वह एक जिंदा मिसाल रहे हैं। उनकी बातें हर किसी को नई दिशा दिखाती रही हैं। उन्होंने करोड़ों आंखों को बड़े सपने देखना सिखाया। उनके विचारों से प्रेरणा लेकर आज भी हम जिंदगी के हर इम्तेहान को पास कर सकते हैं।

उनका कहना था कि युवा चाहें तो पूरा देश बदल सकते हैं। उन्होंने एक बार कहा था कि अपना कार्यकाल राष्ट्रपति भवन से शुरू किया, तब वह अपने साथ दो सूटकेस लेकर आए थे और अपना कार्यकाल पूरा होने के बाद वह वापस भी उन्हीं दो सूटकेस के साथ गए। वरिष्ठ पत्रकार शेखर गुप्त ने जब उनसे एक बार पूछा था कि इन दो सूटकेस में क्या था? डॉ. कलाम ने जवाब दिया था, अगर मैं कहीं एक-दो दिन के लिए जा रहा हूं, तो इससे मेरी दो दिन की जरूरतें पूरी हो जाएंगी। इसमें एक नई प्रकाशित बुक, कभी-कभी मेरा कंप्यूटर, मेरा टेप-रिकोर्डर और दो दिन के कपड़े हैं। उनके जीवन में एक ऐसा भी मोड़ आया था, जब उन्हें परिवार की मदद के लिए अखबार बांटने का काम भी करना पड़ा था। उनके शुरुआती दिन संघर्ष से भरे रहे थे। 

उन्होंने एक बार कहा था कि अगर कोई सूरज की तरह चमकना चाहता है, तो उसे सूरज की तरह जलना भी होगा और वास्तव में। अपनी मां से उनका सबसे ज्यादा जुड़ाव था। मां आशियम्मा के हाथ का बना खाना उनको सबसे पसंद रहा था। मां के साथ उनका बहुत गहरा रिश्ता था। केले के पत्ते पर मां के हाथ की बनी नारियल की चटनी के साथ चावल और सांभर खाना उन्हें जीवन भर नहीं भूला। जब तक मां आशियम्मा रहीं, वह उनके साथ रसोई में ही खाना खाया करते थे। 

ये भी पढ़ें: भारतीय सेना के रौबीले ऑफिसर कुलमीत कैसे बने एडोब इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर

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