समय के साथ बदलता करोड़ों डाॅलर का आईवियर का बाजार

    By Pooja Goel
    November 20, 2015, Updated on : Thu Sep 05 2019 07:19:23 GMT+0000
    समय के साथ बदलता करोड़ों डाॅलर का आईवियर का बाजार
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    वाईएस टीमहिंदी

    लेखकः ज़ुबिन मेहता

    अनुवादः निशांत गोयल


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    दृष्टिदोष आज की व्यस्त दिनचर्या के चलते आम हो चुका है और दुनिया के विकसित देशों में रहने वाले प्रत्येक दस में से 6 लोग या तो चश्मे पहनते हैं या फिर वे आंखों में काॅन्टेक्ट लैंस का प्रयोग करते हैं या फिर कभी न कभी वे अपनी आंखों की सुधारात्मक शल्य चिकित्सा करवा चुके हैं।

    अगर विकासशील विश्व की बात करें तो वहां भी विकसित दुनिया की ही तरह प्रत्येक 10 में से 6 लोग किसी न किसी प्रकार के दृष्टिदोष से पीडि़त हैं लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि नेत्र चिकित्सा और देखभाल या फिर चश्मों तक इनकी पहुंच बहुत सीमित है (सूत्र)। अगर हम वैश्विक जनसंख्या के अनुपात में देखें तो ये बहुत ही चैंकाने वाले आंकड़े हैं।

    आखिर इतनी बड़ी मात्रा में चश्मे कौन तैयार करता है? आईवियर उद्योग से जुड़े हुए किसी भी व्यक्ति का जवाब एकदम से ‘लक्सोटिका’ होगा लेकिन आम लोगों के लिये यह एक अबूझ पहेली जैसा है। लेकिन प्राडा, जिर्योजियो अरमानी, वर्साचे, लेंसक्राफ्ट इत्यादि ऐसे नाम हैं जिनसे लगभग हर कोई वाकिफ है। लक्सोटिका या तो इन ब्रांडों का स्वामी है या फिर वह धूप के चश्मे बनाने के अलावा उनके लिये निर्देशित फ्रेम तैयार करता है। लक्सोटिका समूह मूलतः वर्ष 1961 में स्थापित एक इटैलियन आईवियर कंपनी है जो दुनियाभर के प्रमुख आईवियर ब्रांडों में से 80 प्रतिशत से भी अधिक पर प्रभुत्व रखती है। यह समूह रे-बैन, पर्सोल, लेंसक्राफ्टर्स, पर्ले विजन इत्यादि का स्वामित्व रखता है। इसके अलावा ये चानल, प्राडा, जिर्योजियो अरमानी, बर्बरी, वर्साचे, डोल्से और गबाना सहित कई अन्य डिजाइनर ब्रांडों के लिये धूप के चश्में और निर्देशित फ्रेम भी तैयार करते हैं। लक्सोटिका के 7000 से भी अधिक खुदरा स्टोर हैं और 2014 में इनका ईबीआईडीटीए 1.7 बिलियन डाॅलर का था। लक्सोटिका के अलावा साफिलो, मार्कहाॅन और डेरिगो इस क्षेत्र के अन्य बड़े और जानेमाने नाम हैं।

    बाजार का आॅनलाइन कोण

    अगर हम आॅनलाइन क्षेत्र पर एक नजर डालें तो वारबे पार्कर सबसे अग्रणी दिखाई देता है। वारबे पार्कर एक ऐसा आॅनलाइल आईग्लास विक्रेता है जो उपभोक्ताओं तक आॅनलाइन पहुंच बनाने के अलावा अमरीका में भौतिक स्टोरों के माध्यम से भी उनकी सेवा करता है। कई चरणों में 215 मिलियन डाॅलर का निवेश पाने के बाद अप्रैल में इसका मूल्य 1.2 बिलियन डाॅलर आंका गया। इस कंपनी ने 100 डाॅलर से भी कम कीमत में डिजाइन फ्रेम तैयार करके बेचकर खुद को एक ब्रांड के रूप में स्थापित किया है। इसके अलावा ये अमरीका में बिकने वाले अपने चश्मे के प्रत्येक जोड़े के बदले विकासशील देशों को एक जोड़ी दान करने के माॅडल पर काम कर रहे हैं। हालांकि इस कंपनी का काफी अच्छा मूल्यांकन किया गया है लेकिन फिर भी यह लक्सोटिका के मुकाबले सिर्फ एक अंशमात्र ही है।

    अगर भारतीय बाजार की बात करें तो जीकेबी आॅप्टिकल यहां पर आॅप्टिकल उत्पादों का सबसे बड़ा विक्रेता है जो देशभर में अपने कई स्टोर्स के माध्यम से धूप के चश्मे, नजर के चश्मे, काॅन्टेक्ट लेंस और अन्य एक्सेसरीज बेचता है। कोलकाता स्थित मुख्यालय से संचालित होने वाले इस स्टोर के पूरे भारतभर में 60 स्टोर हैं और यह 600 से भी अधिक लोगों को अपने यहां रोजगार प्रदान करता है। इसके अलावा हाल-फिलहाल के समय में कई आॅप्टिकल रिटेल चेन भी लगातार सामने आ रही हैं जिनमें से हाल ही में 40 करोड़ रुपये का निवेश पाने वाली बेल फ्रेंकलिन प्रमुख है। अगर आॅनलाइन बाजार की बात करें तो वेल्यू के अंतर्गत वर्ष 2010 में संचालन प्रारंभ करने वाली प्रमुख कंपनी लेंसकार्ट के अलावा ज्वेल्सकार्ट, बैग्सकार्ट और वाचकार्ट प्रमुख नाम हैं। इस कंपनी ने वर्ष 2015 के जनवरी में 135 करोड़ रुपये का निवेश पाने के बाद सिर्फ लेंसकार्ट के संचालन का फैसला करते हुए अन्य पोर्टल्स को बंद करने का फैसला किया। आॅनलाइन चैनलों के अलावा लेंसकार्ट के देशभर के 66 शहरों में 100 से भी अधिक स्टोर हैं और यह अपनी आॅफलाइन उपस्थिति बढ़ाने की दिशा में ध्यान लगा रहे हैं।

    नई खोज और नए उद्यम

    लेंसकार्ट ने हाल ही में अपनी वेबसाइट पर ‘3डी ट्राई आॅन’ नामक एक सुविधा प्रारंभ की है जहां पर उपभोक्ता विभिन्न प्रकार के चश्मों को वर्चुअली पहनकर देख सकते हैं। यह टूल उपयोगकर्ता को फ्रंट कैमरे का प्रयोग करते हुए अपने चेहरे का विवरण दर्ज करवाने के लिये आदेशित करता है। इसके बाद उपयोगकर्ता मौजूद विभिन्न फ्रेमों में से कुछ को लगाकर स्क्रीन पर परिणाम देख सकता है।

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    इसके अलावा इस क्षेत्र में कुछ नये नाम भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के प्रयास में लगे हुए हैं। ग्लासिक और जाॅर्जआई ने बीते वर्ष ही आॅनलाइन क्षेत्र में अपना कदम रखा है।

    ग्लासिक के संस्थापकों, कैलाश और देवेश निचानी का इरादा आॅनलाइन माध्यम से अपने पुश्तैनी आॅप्टिकल उपकरणों के व्यापार को अधिक विस्तार देना है। फिलहाल यह कंपनी सिर्फ आॅनलाइन क्षेत्र में संचालित हो रही है और यह वर्चुलन ट्राई आॅन फीचर से भी लैस है। कैलाश कहते हैं, ‘‘अबतक हमें अपनी वेबसाइट, उत्पादों और सेवाओं को लेकर काफी सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिली हें और अभी तक हमारे द्वारा बेचा गया कोई भी उत्पाद वापस नहीं आया है।’’

    केशव और निधी गुप्ता के दिमाग की उपज जाॅर्जआई, इस क्षेत्र में स्थापित होने वाला एक अन्य स्टार्टअप है। यह कंपनी महीने-दर-महीने 45 प्रतिशत की दर से वृद्धि कर रही है। निधी कहती हैं, ‘‘हमारे संचालन प्रारंभ करने के मात्र चार महीनों के भीतर ही हमनें अपनी सीटीआर को 1.8 प्रतिशत से बढ़ाकर वर्तमान की 3.2 प्रतिशत पर लाने में सफलता पाई है। हम सिर्फ 30 माॅडलों के साथ प्रारंभ करने के बाद अपने डिजाइनर संग्रह को 100 से भी अधिक माॅडलों तक बढ़ा चुके हैं। इसके अलावा हम सनग्लास और पावर सनग्लास को भी अपनी उत्पाद श्रृंखला का एक हिस्सा बनाने की प्रक्रिया में हैं।’’ जार्जआई का इरादा वर्ष 2015 के अंत तक प्रतिमाह 1000 आॅर्डरों की संख्या को पार करते हुए प्रतिमाह 10 लाख रुपये के राजस्व के लक्ष्य को पाने का है।

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    भविष्य

    आईवियर का उद्योग कई दशकों तक सिर्फ चुनिंदा लोगों के ही हाथों की कठपुतली बना रहा लेकिन अब स्थितियां बदल रही हैं। जिस तरीके से प्रौद्योगिकी और तकनीक ने अन्य क्षेत्रों में अपना प्रभाव दिखाया है वैसे ही यह क्षेत्र भी पारंपरिक दिग्गजों को पीछे छोड़ते हुए नए हाथों की ओर जाने के प्रयास कर रहा है। इन नए हाथों का इरादा इन उत्पादों की पहुंच में सुधार करते हुए उपभोक्ताओं को बेहतर अनुभव प्रदान करवाने का है।

    विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में करोड़ों लोग आईकेयर से बिल्कुल अनजान हैं या फिर यह उनकी पहुंच से बाहर है और ऐसे में स्टार्टअप उनकी समस्याओं को हल करने की दिशा में अपने कदम आगे बढ़ा रहे हैं। जैसे फोरस का एक प्रमुख उत्पाद त्रिनेत्र अपने आप में एक एकीकृत, बुद्धिमान, सस्ता और पोर्टेबल आई स्क्रीनिंग डिवाइस है जो आंखों की सामान्य सी समस्याओं को मात्र 5 मिनट से भी कम समय में पहचान सकता है। आईवियर के क्षेत्र में संचालन करने वाली कंपनियों के लिये देश में और वैश्विक स्तर पर एक बहुत बड़ा और बिल्कुल अछूता बाजार खुला है जहां वे वास्तव में अपना सकारात्मक प्रभाव छोड़ सकते हैं।

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