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कल तक जिन साहूकारों से कर्ज लेती थी, आज वही महिलाएँ उन साहूकारों को दे रही हैं कर्ज़

Harish Bisht
14th Mar 2016
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समाज भले ही महिलाओं को मिलने वाले हक को देने में आनाकानी करे, लेकिन आज की सबल महिला अपने हक को लेना जान गई है। तभी तो वाराणसी में रहने वाली महिलाएं जो कभी साहूकारों के जाल में उलझ कर उनकी चाकरी करने को मजबूर होती थीं, आज जरूरत पड़ने पर उन साहूकारों को कर्ज देती हैं जो कभी छोटी सी रकम देने के एवज में उनसे बड़ा सूद वसूलते थे। ये तस्वीर बदली है माधुरी सिंह ने। जो आज चालीस से ज्यादा गांव में रहने वाली महिलाओं को स्वाभिमान से जीना और उनको आत्मनिर्भर बनना सीखा रही हैं।


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माधुरी सिंह का जन्म बिहार में हुआ था, स्नातक की पढ़ाई के बाद उनकी शादी वाराणसी में हो गई। शादी के बाद माधुरी साल 1997 में डाक्टर रजनीकांत की संस्था ‘वूमन वेलफेयर एसोसिएसन’ के साथ जुड़ गई। यहां करीब 5 साल तक उन्होंने गांवों में परिवार नियोजन का काम किया। लेकिन एक घटना ने उनके जीवन को ही बदल दिया। वो बताती हैं कि 

"शंकरपुर गांव में एक महिला ने प्रसव के समय साहूकार से 10 प्रतिशत की दर से 500 रूपये कर्ज लिए थे। ब्याज ज्यादा होने के कारण 10 साल बाद वो रकम 7 हजार हो गई, जबकि वो 8 सौ रूपये पहले ही लौटा चुकी थी। पैसा चुकता ना करने के कारण वो साहूकार उसे बंधुआ मंजदूर बनाना चाहता था। तभी मेरे दिमाग में एक ऐसी संस्था बनाने का विचार आया जिसके माध्यम से गरीबों का जीवन बेहतर किया जा सके।"


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इसके बाद 12 महिलाओं के साथ माधुरी ने ‘महिला शक्ति’ संस्था की स्थापना की। उन्होंने महिलाओं से कहा कि वे एक समय खाना न खायें और उससे जो पैसा जमा होगा उससे वे उस साहूकार का पैसा लौटाएं। माधुरी बताती हैं,

"शुरूआत में एक मुट्ठी चावल से हुई, फिर हर हफ्ते 5 रूपये जमा करने लगे और कुछ समय बाद इस रकम को 20 रूपये महीना कर दिया गया। माधुरी और दूसरी महिलाओं ने सबसे पहले साहूकार से बात की और थाने में रिर्पोट कर के उससे पैसों को कम करा कर 17 सौ रुपये में हिसाब बराबर कर उस महिला को ऋण मुक्त किया। धीरे धीरे उनकी संस्था का दायरा बढ़ने लगा और उनके 12 समूह हो गये।"


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साल 2000 में माधुरी ने इंग्लैंड से आई एक संस्था से गरीब बैंक के काम की बारीकियां सीखी। उसके बाद उन्होने परिवार नियोजन के काम को छोड़ कर पूरे तरीके से इसी काम में लग गयीं। आज उनके इस काम का विस्तार 40 गांवों में हो चुका है और इसमें करीब 200 समूह हैं। अब तक इनके पास 6 करोड़ का फंड जमा हो चुका है। आज ये लोग अपने सदस्यों के अलावा दूसरे लोगों को भी पैसा ब्याज में देते हैं।


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माधुरी और इनकी संस्था के काम से प्रभावित होकर आज कई बैंक अफसर इनके पास आते हैं, ये जानने के लिए कि कैसे वो अपनी इस संस्था को चलाती हैं। ये सब जानने के बाद बैंको ने इनके जरिये कई लोगों को ऋण दिया है। माधुरी की कोशिशों के कारण ही नौ सौ भूमिहीन किसानों ने 25 हजार का ऋण 4 प्रतिशत के हिसाब से लिया है। 80 किसानों को मुद्रा लोन मिला है, ये 10 प्रतिशत की दर से मिलता है। इसमें कुछ ने 50 हजार रुपये ऋण के रूप में लिये हैं।


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अपने 6 करोड़ के फंड के बारे में इनका कहना है कि ये पैसा समूह और दूसरे लोगों में बंटा हुआ है। माधुरी बताती हैं, 

"अगर कोई हमारा खाता जांचे तो उसे हजार दो हजार रुपये ही मिलेगें क्योंकि सारा पैसा बंटा हुआ है। समूह और समूह के बाहर सभी को 2 प्रतिशत की दर से ही पैसा दिया जाता है। इन बाहरी लोगों में वो साहूकार भी शामिल हैं जिनके पास ये महिलाएं कभी कर्ज लेने जाती थीं लेकिन आज अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए उन साहूकारों को इनके दरवाजे में आना पड़ता है। अब तक करीब हर संस्था के पास 3 से 5लाख रूपये के बीच ब्याज बन चुका है और करीब 35सौ महिलांए उनके ‘महिला शक्ति’ समूह से जुड़ी हुई हैं।"


लोन देने के तरीके के बारे में माधुरी बताती हैं कि वे लोगों को उनकी जरूरत के हिसाब से ही पैसा देती हैं। पैसा भी वह यह जांचने के बाद देती हैं कि कौन कब कितना पैसा लौटा सकता है। माधुरी कहती हैं 

“अगर कोई खेती के लिए लोन लेता है तो हम उससे पूछते हैं कि कितनी जमीन में कौन सी फसल वो बो रहा है, खाद कितनी डालेगा, खेत उसके अपने हैं या उसने पट्टे पर लिये हैं। इसके बाद हम 1 साल ही किस्त बनाकर उन्हें पैसा देती हैं।” 

वे कहती हैं कि अगर लोन देते समय जांच पड़ताल न करें तो ऐसे हालात में पैसा वसूलने में दिक्कत हो सकती है।


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माधुरी का समूह ‘महिला शक्ति’ में हर समूह अलग अलग पैसे जमा करता है। ये रकम 50 रुपये से 200रुपये तक है। ब्याज से मिलने वाला पैसा सभी लोगों में बराबर बंटता हैं चाहे वो लोन ले या न ले। इसके अलावा अगर किसी महिला के पास गाय-भैंस है और वह दूध बेचकर पैसा कमा रही है तो वह उस पैसे को समूह को लोन देने में कर सकती है इसमें उसे ब्याज भी ज्यादा मिलता है।


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भविष्य की योजना के बारे में उनका कहना है कि वे अपने समूह का और विस्तार कर फंड बढ़ाना चाहती हैं। वे बताती हैं कि जो किसान पहले थोड़ी सी जमीन पर खेती कर रहा था आज वही किसान बीघे में खेती कर रहा है। अब वे बैंको से समूह लोन के लिए भी बातचीत करना चाहती हैं। ताकि समूह के लोगों का ज्यादा से ज्यादा विकास हो। साथ ही वे लोगों से अपनी बचत का दायरा बढ़ाने के लिए भी कह रहीं हैं। 

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