संस्करणों
प्रेरणा

एम्बुलेंस के जाम में फंसने और मरीज की मौत ने बना दिया एक डॉक्टर को ट्रैफिक मैन

6th May 2016
Add to
Shares
88
Comments
Share This
Add to
Shares
88
Comments
Share

आमतौर पर किसी सार्वजनिक समस्या को दूर करने या उसका हल निकालने में आम इंसान कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता हैं। समस्या में फंसने के बाद लोग इसकी जिम्मेदारी सरकार या स्थानीय प्रशासन पर डालकर उसे कोसते हुए आगे निकल जाते हैं। वह उस दिशा में तबतक कुछ करना या सोचना नहीं चाहते जबतक कि व्यक्तिगत तौर पर उनका कोई नुकसान न हुआ हो। शायद, ‘मुझे क्या पड़ी है’ कि बीमारी लोगों को ऐसे किसी पचड़े में पड़ने से रोकती होगी। लेकिन समाज में ऐसे भी कुछ लोग हैं, जो बिना किसी व्यक्तिगत नफा-नुकसान के किसी सार्वजनिक समस्या और असुविधा का समाधान करने निकल पड़ते हैं। वह किसी को मुश्किल में घिरा देखकर उससे सहानुभूति जताने के बजाए उसकी परेशानियों से समानुभूति स्थापित कर लेते हैं। ऐसे लोगों को आप सच्चे देशवासी कहें या इंसानियत के पैरोकार, लेकिन दुनिया उन्हें सम्मान से सैल्यूट करती है। लोग उनसे प्रेरणा लेकर आगे बढ़ते हैं। हम आपको ऐसे ही एक शख्स से मिलवा रहे हैं, जो ट्रैफिक सिग्नल पर यात्रियों की परेशानी देखकर खुद ट्रैफिक संभालने लगा। वह भी किसी लोभ या लालच में पड़ कर नहीं बल्कि खुद का नुकसान उठाकर। पेशे से डॉक्टर, नोएडा के कृष्णा कुमार यादव पिछले छह सालों से ये काम करते आ रहे हैं। उन्होंने योरस्टोरी से साझा किया कि आखिर कैसे उन्हें ट्रैफिक सम्भालने की मिली प्रेरणा।

image


अच्छे इंसान से ही अच्छे समाज और राष्ट्र का निर्माण

उत्तरप्रदेश के मऊ जिले के रतनपुरा गांव के निवासी डॉ विजय यादव नौकरी की तलाश में वर्ष 2005 में मऊ से नोएडा आ गए थे। तभी से वह अपने माता-पिता, पत्नी और दो बच्चों के साथ नोएडा में रहते हैं। यहीं उनका क्लिनिक भी है। बीएएमएस डॉ विजय आयुर्वेदिक पद्धति से मरीजों का इलाज करते हैं। वह कई बीमारियों के एक्सपर्ट हैं। दो शिफ्टों में खुलने वाली उनकी क्लिनिक पर मरीजों की काफी भीड़ लगी रहती है। दूर-दूर से लोग उनके पास इलाज कराने आते हैं। इलाज को वह अपना धर्म मानते हैं। डॉक्टरी के अलावा वह कई सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों और सरोकारों पर अपनी बेबक राय रखते हैं। वह चाहते हैं कि इंसानी बिरादरी में पैदा होने वाला हर शख्स जिंदगी के आखिरी लम्हे तक इंसान ही बना रहे, क्योंकि अच्छे इंसान से ही अच्छे समाज और एक अच्छे राष्ट्र का निर्माण होता है। 

image


यूं मिली प्रेरणा

29 अक्टूबर 2011 को रोजाना की तरह डॉ. कृष्णा यादव सुबह अपने घर से क्लिनिक के लिए निकले थे। घर से निकलते है सेक्टर 12-22 मंदिर चौराहे पर लगे ट्रैफिक जाम में वह फंस गए। उनके ठीक सामने एक एम्बुलेंस भी जाम में फंसी थी और एम्बुलेंस के अंदर एक मरीज बुरी तरह से तड़प रहा था। एम्बुलेंस के अंदर के कर्मचारी उसके उपचार में लगे थे, और मरीज की तीमारदार बदहवासी के हालत में बाहर निकलकर जाम हटाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। इस तरह के हालात लगभग घंटे भर तक बने रहे। कछुए की गति से सरकते हुए ट्रैफिक के साथ जब डॉ. यादव चौराहे तक पहुंचे तो पता चला कि चौराहे का ट्रैफिक सिगनल खराब था, और शायद इसलिए ट्रैफिक चोरों दिशाओं से आकर आपस में गुत्थम-गुत्था होकर जाम में तब्दील हो गई थी। वहां से निकलने के बाद डॉ. यादव रास्ते भर एम्बुलेंस के उस मरीज के बारे में सोचते रहे। अगले दिन उन्होंने एक अखबार में खबर पढ़ी कि ट्रैफिक जाम में फंसने से एम्बुलेंस के एक मरीज की मौत हो गई। ये वही मरीज था जिसे डॉ. यादव ने एक दिन पहले एम्बुलेंस के अन्दर तड़पते हुए अपनी आंखों से देखा था, और जिसके बारे में वह रात भर सोचते रह गए थे। इस खबर ने डॉ. यादव को अंदर तक झकझोर दिया था। उस रात वह सो नहीं पाए। वह इन सवालों में उलझे थे कि मरीज की मौत का जिम्मेदार आखिर किसे ठहराया जाए। अगर वह समय पर अस्पताल पहुंच जाता तो शायद उसकी जान बचाई जा सकती थी। इसी उधेड़-बुन में सुबह रात से सुबह हो चुकी थी। डॉ. यादव कहते हैं, 

"मुझे एक अपराध बोध ने घेर रखा था कि मैं एक डॉक्टर होते हुए भी उस मरीज के लिए कुछ नहीं कर पाया। बस! अगले दिन सुबह मेरे कदम खुद ब खुद उस चौराहे की तरफ बढ़े चले जा रहे थे, जहां उस भीषण जाम में फंसकर मरीज की मौत हुई थी। मैं चौराहे पर पहुंच चुका था। संयोग से उस दिन वहां एक ट्रैफिक कर्मी भी खड़ा था। शायद प्रशासन ने एम्बूलेंस में मरीज की मौत की खबर के बाद उसे यहां यातायात नियंत्रण के लिए तैनात किया था। मैं उस ट्रैफिक कर्मी के साथ हो लिया।"

 वह उसके काम में मदद करने लगे। इस तरह ये सिलसिला शुरू हो गया। बाद में उन्होंने व्हिसिल और लाउडस्पीकर भी खरीद लिया ताकि ये काम और अच्छे से किया जा सके, ताकि फिर किसी मरीज की मौत ट्रैफिक में फंसने के कारण न हो जाए।

image


बीमारियों के अलावा करते हैं ट्रैफिक का इलाज 

डॉ कृष्ण कुमार यादव को शहर के लोग उनके डॉक्टरी पेशे के अलावा एक अन्य नाम से भी जानते हैं। लोग उन्हें ट्रैफिक मैन कहकर बुलाते हैं। डॉ यादव पिछले छह सालों से नोएडा में भीड़-भाड़ वाले ट्रैफिक पुलिस रहित चौराहों पर ट्रैफिक संभालने का काम करते हैं। वह रोज़ाना सुबह दो घंटे, 8 से 10 बजे तक ट्रैफिक नियंत्रित करते हैं। नोएडा के व्यस्तम चौराहों में से दो चौराहे डॉ विजय के घर के पास है। लगभग 500 मीटर के फासले पर सेक्टर 12-22 और सेक्टर 55-56 के चौराहों पर रोजाना डॉ यादव को गले में छोटा लाउडस्पीकर और होठों के बीच व्हिसिल दबाए ट्रैफिक कंट्रोल करते आसानी से देखा जा सकता है। रोड सेफ्टी का संदेश लिखे एप्रेन में कृष्णा यादव को ट्रैफिक संभालते हुए देखकर राहगीर अकसर ठिठक जाते हैं। नीली पैंट और सफेद शर्ट के बजाए फॉर्मल ड्रेस पर डॉक्टर के लबादे में मुसाफिरों को ट्रैफिक नियमों के पालन का संदेश देते देख कर बरबस लोगों का ध्यान उस तरफ खिंच जाता है। लेकिन लोग कुछ समझ पाएं इसके पहले ही ट्रैफिक की रेलमपेल में वह आगे निकल जाते हैं। 

image


कहीं भी जाते हैं, व्हिसिल और लाउडस्पीकर होता है साथ 

डॉ कृष्णा न सिर्फ अपने घर के पास का ट्रैफिक संभालते हैं, बल्कि ये काम अब उनकी आदतों में शुमार हो गया है। वह कहीं भी जाते हैं, उनकी कार में लाउडस्पीकर और पॉकेट में व्हिसिल हमेशा उनके साथ होता है। जाम देखते ही वह सक्रिय हो जाते हैं। ट्रैफिक में फंसने के बाद वह इसे दूर करने की कोशिश में लग जाते हैं। अगर उनके साथ कोई दूसरा आदमी गाड़ी में मौजूद होता है, तो वह फौरन कार की स्टीयरिंग उसे थमा कर गाड़ी से बाहर आकर ट्रैफिक कंट्रोल में लग जाते हैं। जब दोपहर में वह अपने बच्चे को स्कूल से लाने जाते हैं, तो वहां भी उन्हें ट्रैफिक कंट्रोल करना पड़ता है।

पम्फलेट बांटकर करते हैं लोगों को जागरुक

डॉ यादव की यातायात नियमों के प्रति समर्पण सिर्फ ट्रैफिक कंट्रोल करने तक ही सिमित नहीं है। वह लोगों को यातायात नियमों के प्रति जागरुक भी करते हैं। ट्रैफिक नियमों से संबंधित संदेश लिखवाकर पर्चे भी बांटते हैं। सुबह-सुबह चौराहों पर लोगों को पम्फलेट बांटते हैं। यहां तक कि अपने क्लिनिक में आने वाले मरीजों और उनके तीमारदारों को भी वह ये पर्चा देते हैं। डॉ यादव कहते हैं कि देश में सालाना लाखों लोगों की मौत सडक़ दुर्घटना में होती है। अगर लोग यातायात नियमों का ठीक से पालन करें तो इन मौतों को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही ट्रैफिक जाम की समस्या से भी बहुत हद तक बचा जा सकता है। हर किसी को भागने की जल्दी होती है, जिससे लोग ट्रैफिक नियमों की अवहेलना करते हैं और खुद भी जाम में फंसकर घंटों अपना समय बर्बाद कर देते हैं। डॉ. यादव कहते हैं, 

"लोगों में ट्रैफिक सेंस डेवलप करना बहुत जरूरी है। इसके बिना ट्रैफिक नियंत्रण के हर तरह के सरकारी प्रयास विफल साबित होंगे। मेरी योजना भविष्य में स्कूलों और कॉलेजों में जाकर छात्रों को यातायात नियमों की जानकारी देने की है।" 

ट्रैफिक पुलिस और आम लोगों से मिलता है सहयोग 

डॉ यादव के इस काम को ट्रैफिक महकमा भी सलाम करता है। शहर की तमाम ट्रैफिक पुलिसकर्मी यादव के इस कार्य की सराहना करते हैं। आम लोग भी उनके काम की प्रशंसा करते हैं। इस कार्य के लिए नोएडा के कई सामाजिक संगठनों ने उनका सम्मान किया है। शुरूआती दौर में उनके घर वाले इस काम का विरोध करते थे, लेकिन अब उनकी पत्नी और बच्चे भी उनका सहयोग करते हैं।

डॉ. यादव कहते हैं, 

"कुछ लोग मेरे इस काम की आलोचना भी करते हैं, लेकिन मैं उनकी परवाह नहीं करता हूं। इंसान को जिस काम से संतोष मिलता हो, उसे करने में किसी की आलोचना आड़े नहीं आती है। वैसे शहर में आलोचकों से ज्यादा मेरे प्रशंसक हैं, जो इस काम को करते रहने के लिए हौसला देते हैं।"

ऐसी ही और प्रेरणादायक कहानियाँ पढ़ने के लिए हमारे Facebook पेज को लाइक करें

अब पढ़िए ये संबंधित कहानियाँ: 

जो सुन और बोल नहीं सकते उनके लिए फरिश्ता हैं ज्ञानेंद्र पुरोहित, मूक-बधिर के अधिकारों की लड़ाई के लिए ठुकरा दी बड़ी नौकरी

राजस्थान के एक छोटे से गांव की अनपढ़ महिलाएं पूरी दुनिया में फैला रही हैं रोशनी, सीखाती हैं सोलर प्लेट्स बनाने के गुर

शिक्षा में स्टार्टअप के लिए AIIMS से डॉक्टरी पढ़ने और IAS करने वाले 24 साल के रोमन सैनी ने छोड़ी नौकरी

Add to
Shares
88
Comments
Share This
Add to
Shares
88
Comments
Share
Report an issue
Authors

Related Tags

Latest Stories

हमारे दैनिक समाचार पत्र के लिए साइन अप करें