पर्यावरण संरक्षण के लिए इस चतुर्थी पर इको-फ्रेंडली चॉकलेट बप्पा और ट्री गणेशा

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"इस बार गणेश चतुर्थी पर पर्यावरण संरक्षण को लेकर सजग श्रद्धालुओं में इको फ्रेंडली गणेश मूर्तियों की मांग सौ फीसदी तक बढ़ गई है, जबकि पीओपी के गणपति की मांग 40 फीसदी तक कम हो गई है। दिव्यांग महिलाओं और कैदियों ने भी इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं बनाई हैं। चॉकलेट बप्पा, ट्री गणेशा की खूब जयजयकार है।"

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सांकेतिक फोटो (Shutterstock)



सोमवार, 02 सितंबर से लगातार 11 दिनो तक इस बार मनाई जा रही गणेश चतुर्थी पर घरों, पंडालों, बाजारों, देवालयों में इको फ्रेंडली चॉकलेट बप्पा और ट्री गणेशा विराज रहे हैं। प्लॉस्टर ऑफ पेरिस से बने गणपति की मांग बाजार में चालीस फीसदी तक कम हो गई है। मुंबई के ओम क्रिएशन ट्रस्ट की 56 दिव्यांग महिलाओं से लेकर महाराष्ट्र की जेलों में कैदियों तक ने पर्यावरण सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए गणेश की इको फ्रेंडली मूर्तियां रची हैं।


मंगलुरु के नितिन वाज ने भगवान गणेश की ऐसी मूर्ति बनाई है, जो पौधे में विकसित होती है। ये इको-फ्रेंडली मूर्ति पेपर-पल्प और बीजों से बनाई गई है। तमाम सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों की ओर से इस बार एहतियातन संदेश दिए जा रहे हैं कि पारंपरिक मूर्तियां जल प्रदूषण फैलाती हैं। इसलिए इको फ्रेंडली मूर्तियां पर्यावरण को सुरक्षित रखने मदद करती हैं। ऐसी छोटी-छोटी कोशिशों से पर्यावरण को साफ-सुथरा रखा जा सकता है। 


ओम क्रिएशन ट्रस्ट की 56 दिव्यांग महिलाओं ने गणपति बप्पा की इको फ्रेंडली मूर्तियां बनाई हैं। ये महिलाएं डाउन सिंड्रोम से पीड़ित हैं, जिसमें शरीर का ठीक से विकास नहीं हो पाता है। ये एक ऐसी जेनेटिक एबनॉर्मिलिटी है, जिसके कारण शरीर के ज्वाइंट्स कमजोर हो जाते हैं। इन महिलाओं ने 9-24 इंच तक की इको फ्रेंडली गणेश प्रतिमाएं बनाई हैं। विसर्जन के बाद इन मूर्तियों से तुलसी के पौधे उग जाएंगे।





डूंगरपुर (राजस्थान) में प्रथम आराध्य भगवान गजानन का जन्मोत्सव 2 सितंबर को इको फ्रेंडली मूर्तियों के साथ मनाया जा रहा है। डूंगरपुर जिले में भी 10 दिवसीय गणेश महोत्सव को लेकर शहरों सहित गांव-गांव में गणेश भक्तों में उल्लास है। इस बार जिले की गेपसागर झील को घातक रसायनों से मुक्ति दिलाने के लिए शहर के विभिन्न गणेश मंडलों ने मिट्टी की गणेश प्रतिमाओं की पहल की है। 


बेक अमोर से यशिका अग्रवाल द्वारा चॉकलेट मॉडलिंग के साथ बनाई गई गणेश प्रतिमाएं पूरी तरह से इडेबल और इको फ्रेंडली हैं। इसे आसानी से दूध में विसर्जत कर प्रसाद के रूप में लिया जा सकता है। इतना ही नहीं, इससे पर्यावरण को भी किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचता है। ये सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद हैं। मिठी होने के कारण इसमें कैलोरी अधिक है। इन गणेश प्रतिमाओं में ब्लैक-व्हाइट चॉकलेट का इस्तेमाल किया गया है। इसे डेकोरेट करने के लिए सुगर बॉल्स का इस्तेमाल किया हुआ है। प्रतिमा को कलर फुल बनाने के लिए चॉकलेट में ईडेबल कलर मिक्स किए गए हैं। 





गणेश पूजन के लिए विश्व विख्यात महाराष्ट्र में लाखों करोड़ों के गहने, ऊंची-ऊंची मूर्तियों के बीच कुछ लोग इस पर्व के साथ पर्यावरण बचाने में जुटे हुए हैं। इनमें खासोआम शामिल है। यही वजह है कि इस बार पर्यावरण को लेकर जागरूकता बढ़ने से मिट्टी से बनी गणपति प्रतिमाओं की मांग सौ फीसदी तक बढ़ गई है।


मूर्तिकार दत्ताद्री कोथुर ने लाल मिट्टी और जैविक खाद से ट्री गणेशा बनाई है। कोथुर बताते हैं कि जब उन्होंने इस निर्माण पर वीडियो बनाया था तो उम्मीद थी कि 2000 लोग उसे देखेंगे, लेकिन लाखों ने देखा। उसके बाद उनको पांच हजार से ज्यादा मूर्तियों के ऑर्डर मिले, लेकिन वह चार सौ से ज्यादा नहीं बना पाए।


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