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इस गुजराती लड़की ने आदिवासियों की मदद करने के लिए पीछे छोड़ दिया IAS बनने का सपना

मिलें आईएएस बनने का सपना छोड़ आदिवासियों के लिए काम करने वाली मित्तल पटेल से...

16th Jan 2018
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कुछ ऐसे भी होते हैं, जो सोचते तो आईएएस बनने की है, लेकिन वक्त के साथ उन्हें लगता है कि उनके लिए ये नौकरी सही नहीं होगी या उनका मन बदलता है और वे कुछ और बन जाते हैं। 

मित्तल पटेल (दाएं) फोटो साभार, फेसबुक

मित्तल पटेल (दाएं) फोटो साभार, फेसबुक


गुजरात के एक गांव में पली बढ़ीं मित्तल पटेल की कहानी बड़ी अनोखी है। मित्तल ने अपने ग्रैजुएशन के दिनों में IAS बनने का सपना देखा था लेकिन ऐसा क्या हुआ उनकी ज़िंदगी में, कि वो सब छोड़छाड़ निकल पड़ीं आदिवासियों के लिए काम करने...

भारत के युवाओं में आईएएस की नौकरी करने को एक अलग ही क्रेज होता है। अधिकतर युवा अपनी पढ़ाई के दौर में एक न एक बार इस सर्विस में जाने के बारे में सोचते हैं। बहुत से युवा तो इसकी तैयारी में भी जुट जाते हैं, लेकिन काफी कम लोग ही सेलेक्ट हो पाते हैं। वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं, जो सोचते तो आईएएस बनने की है, लेकिन वक्त के साथ उन्हें लगता है कि उनके लिए ये नौकरी सही नहीं होगी या उनका मन बदलता है और वे कुछ और बन जाते हैं। गुजरात के एक गांव में पली बढ़ीं मित्तल पटेल की कहानी कुछ ऐसी है। उन्होंने भी अपने ग्रैजुएशन के दिनों में आईएएस बनने के सपने देखे थे, लेकिन किस्मत ने उन्हें आदिवासियों के लिए काम करने वाला कार्यकर्ता बना दिया।

मित्तल मेहसाणा जिले के संखालपुर की रहने वाली हैं और उनके माता-पिता खेती का काम कर रहे हैं। 35 वर्षीय मित्तल पिछले 10 सालों से गुजरात के 28 घुमक्कड़ी आदिवासियों और 12 नोटिफाइड (NT-DNT) आदिवासियों के लिए काम कर रही हैं। उनकी बदौलत ही इन आदिवासियों को भारत के नागरिक के रूप में चिह्नित किया गया और तब जाकर उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पाया। आदिवासियों के अधिकारों के लिए काम कर रहीं मित्तल कभी आईएएस बनने का सपना लेकर अहमदाबाद आई थीं। लेकिन इसी बीच उन्होंने गुजरात विद्यापीठ में पत्रकारिता में दाखिला ले लिया। यह उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट था। इसी दौरान उन्हें चरखा फाउंडेशन के साथ दो महीने की फेलोशिप करने का मौका मिला।

फोटो साभार, फेसबुक

फोटो साभार, फेसबुक


हालांकि मित्तल का सफर अभी खत्म नहीं हुआ है और वे अभी भी आदिवासी अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। वे कहती हैं कि अभी काफी सफर तय करना है। मित्तल अपने कॉलेज के दिनों में गोल्ड मेडलिस्ट रह चुकी हैं और उन्हें सीएनन-आईबीएन की ओर से रियल हीरोज का अवॉर्ड भी मिला था। चरखा फेलोशिप के दौरान उन्हें गुजरात के कई दूरस्थ इलाकों में जाने का मौका मिला। एक दिन वह गन्ना उगाने वाले आदिवासियों से मिलीं। उन्हें पता चला कि ये आदिवासी कितने मुश्किलों में अपनी जिंदगी जी रहे हैं। यहां तक कि उन्हें नागरिक के रूप में चिह्नित नहीं किया गया था जिस वजह से उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा था।

रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी उन्हें मदद की आस रखनी पड़ती थी। क्योंकि सरकारी रिकॉर्ड में उनका कहीं नाम ही नहीं था। मित्तल ने उन आदिवासियों के लिए काम करने के बारे में सोचा और उन्हें काफी संघर्ष का भी सामना करना पड़ा। इसके लिए उन्होंने अपनी नौकरी भी छोड़ दी। इसके बाद लगातार दो सालों तक उन्होंने इन आदिवासियों के साथ बिताए और उनकी समस्याओं को करीब से समझा। इतने करीब से उनके साथ मित्तल को कई सारी बातें पता चलीं। उन्हें मालूम चला कि इन आदिवासियों की जिंदगी में कितनी समस्याएं हैं। महिलाओं के शारीरिक उत्पीड़न सहना पड़ता था और उनके बच्चे बदतर जिंदगी जीने को मजबूर थे।

आदिवासी महिलाएं, फोटो साभार, फेसबुक

आदिवासी महिलाएं, फोटो साभार, फेसबुक


मित्तल के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन आदिवासियों को मुख्यधारा वाले समाज में लाने की थी। जिससे कि वे भी बाकी भारतीय नागरिकों की तरह सरकारी योजनाओं का लाभ उठा सकें। इसके लिए मित्तल ने विचारता समुदाय समर्थन (VSSM) नाम से एक एनजीओ की शुरुआत की। इसके जरिए बच्चों की पढ़ाई का भी प्रबंध किया गया और उन्हें टेंट बनाकर पढ़ाया गया। मित्तल के संगठन ने इनके वोटर कार्ड बनवाने के लिए संघर्ष किया और सरकारी अधिकारियों से मदद की गुहार लगाई। आज इस आदिवासी समूह के लगभग 20,000 लोगों के वोटर आईडी कार्ड बन गए हैं और लगभग 5,000 लोगों को किसी न किसी तरह रोजगार मिल गया है।

वह बताती हैं, '2007-09 के दौरान हमने रात-रात जाकर काम किया था। हमारी प्राथमिकता में इन आदिवासियों के लिए काम करना लिखा था।' उन्होंने बताया कि इस साल चुनाव के पहले 90 प्रतिशत आदिवासियों के नाम वोटर लिस्ट में जुड़ गए। इससे पहले सिर्फ 1,000 लोगों के ही वोटर कार्ड बने थे। मित्तल का संगठन NT-DNT समुदाय के लोगों को सपोर्ट कर रहा है और उन्हें नागरिता के अधिकार दिलाने के साथ ही, शिक्षा स्वास्थ्य और अच्छा जीवन देने के लिए मिशन पर है। इस संगठन को 2006 में बनाया गया था, लेकिन 2010 में जाकर इसे रजिस्टर्ड किया गया।

फोटो साभार, फेसबुक

फोटो साभार, फेसबुक


अपनी शुरुआत के बारे में बताते हुए मित्तल ने कहा, 'जिंदगी में टर्निंग पॉइंट तब आया जब मैंने इनके लिए काम करने के बारे में सोचा। लेकिन मेरे दोस्त और बाकी लोग मुझे इनके पास जाने से भी मना कर रहे थे। क्योंकि उनका मानना था कि ये अपराधी हैं। सब लोगों के मन में इन्हें लेकर सिर्फ एक ही बात होती थी कि ये यहां के क्रिमिनल हैं।' मित्तल ने एक बार वहां की एक महिला को एक छोटे बच्चे के साथ देखा था। बच्चा रो रहा था। उन्होंने उस मां को बच्चे को दूध पिलाने को कहा, लेकिन उस महिला ने कहा कि वह ऐसा नहीं कर सकती क्योंकि वह खुद कई दिनों से भूखी है।

इतना सुनकर मित्तल की आंखों में आंसू आ गए। उन्हें लगा कि हमारे देश में लोग किस हालत में रहने को मजबूर हैं। आदिवासियों के पास न तो रोजगार था, न उनके पास आजीविका चलाने का कोई स्रोत था। मित्तल ने शुरू में इनके बारे में मीडिया में लिखना शुरू किया। लेकिन सरकार पर कोई असर न पड़ने के कारण उन्होंने धरना देना शुरू किया। वे इस दौरान एनजीओ और सरकारी अधिकारियों से भी मिलती रहीं। वह बताती हैं कि इस आदिवासी समुदाय की संख्या लाखों में है, लेकिन भारत में इन्हें किसी भी तरह के नागरिक अधिकार नहीं मिले थे।

मित्तल के संघर्ष की बदौलत ही इन्हें अधिकार मिल पाए। वे बताती हैं कि लगभग 60,000 लोगों को वोटर आईडी कार्ड उपलब्ध करवा दिए गए हैं। लेकिन वह कहती हैं कि ये तो अभी शुरुआत है और अभी काफी लड़ाई शेष है। अभी इन्हें जनसंख्या के आंकड़ों में भी दर्ज करवाना है। उनके संघर्ष की बदौलत है सरकार ने 1,000 आदिवासी परिवारों को घर बनाने के लिए प्लॉट वितरित करवाए हैं। इनके पास अब राशन कार्ड भी हो गया जिससे उन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली का भी लाभ मिल सकेगा। मित्तल के संगठन ने कई आदिवासी परिवारों को ब्याज मुक्त लोन भी दिलवाया है जिससे वे अपना बिजनेस भी कर रहे हैं।

यह भी पढ़ें: IAS अधिकारी की मुहिम, लद्दाख की महिलाओं को मिल रहा पश्मीने का असली दाम

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