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एक IIT इंजीनियर ने निकाला 'उपाय' गरीब बच्चों को उनके पांव पर खड़ा करने का

Ashutosh khantwal
25th Oct 2015
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आईआईटी खड़कपुर से इंजीनियरिंग करने के दौरान वरुण श्रीवास्तव ने शुरू किया गरीब बच्चों को पढ़ाना...

सन 2010 में रखी एनजीओ उपाय की नीव...

'उपाय' का मकसद सड़को पर भीख मांगने वाले बच्चों और स्लम एरिया में रहने वाले गरीब बच्चों को शिक्षित करना है...

इनका एक ई-कॉमर्स पोर्टल है apnasaamaan.com उसके माध्यम से वे बच्चों द्वारा बनाई गई चीजों को बाहर बेचते हैं...


किसी भी देश की उन्नति के लिए जरूरी है कि उस देश में समानता हो, हर वर्ग जाति व समुदाय एक दूसरे की तरक्की की नीव रखे व उनका सहयोग करें। किसी भी वर्ग में इतना अंतर न हो कि वो समाज में असमानता की खाई का रूप ले ले। समाज की इसी असमानता को दूर करने के प्रयास में लगे हैं वरुण श्रीवास्तव। वे अपने एनजीओ ‘ उपाय ‘ के माध्यम से सड़कों पर भीख मांगने वाले बच्चों और स्लम एरिया में रहने वाले गरीब बच्चों को शिक्षित करके उनकी जिंदगी सुधारने के प्रयास में लगे हैं।

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'उपाय' का ख्याल

वरुण ने आईआईटी खड़कपुर से इंजीनियरिंग की उसके बाद वे रिसर्च करने मैड्रिड(यूरोप) गए और आज वे एनटीपीसी महाराष्ट्र में बतौर डिप्टी मैनेजर काम कर रहे हैं। इंजीनियरिंग के दौरान जब वे गरीब बच्चों को भीख मांगते व रेडलाइट पर सामान बेचते देखा करते थे तो उन्हें काफी गंदा लगता उन्होंने सोचा कि क्यों न वे गरीब बच्चों को शिक्षित करें और उनकी जिंदगी संवारने का प्रयास करें और फिर गरीब बच्चों को शिक्षा देने के उद्देश्य से उन्होंने सन 2010 में ’उपाय’’ नाम के एक एनजीओ की नीव रखी। धीरे-धीरे वरुण से उनके कुछ और मित्र भी जुड गए ये सभी बच्चों को स्लम एरिया में पढ़ाने जाने लगे। आज वरुण के साथ 120 वॉलंटियर्स की एक बड़ी टीम है जिसमें डॉक्टर्स, इंजीनियर्स, प्रोफेसर्स व कई और प्रोफेशन्स से जुडे लोग हैं और सबका मकसद एक है गरीब बच्चों को पढ़ाना व उन्हें उनके पैरों पर खड़ा करना।

वरुण श्रीवास्तव

वरुण श्रीवास्तव


'उपाय' की शुरुआत

वरुण का कहना है-

"शुरूआत में हमें काफी दिक्कतें आई हम जिन बच्चों को पढ़ा रहे थे वे कभी स्कूल नहीं गए थे और उन्हें पढ़ने में कोई दिलचस्पी नहीं थी इसलिए हम उनके साथ खेलते, उन्हें कुछ खाने को देते और ऐसा करके हम उनका पढ़ाई को लेकर इंट्रस्ट जनरेट करने की कोशिश करते। सबसे बड़ी दिक्कत थी कि उन बच्चों के माता पिता भी नहीं चाहते थे कि वे पढ़ें क्योंकि सड़कों पर सामान बेचकर व भीख मांग कर वे पैसा कमा लिया करते थे। लेकिन अब पढ़ाई के चक्कर में पैसा नहीं कमा पा रहे थे ऐसे में काफी दिक्कत होती थी। लेकिन हम अपने साथियों के साथ डटे रहे। हम लोग सुबह नौकरी करने जाते और शाम को बच्चों को पढ़ाते, छुट्टी वाले दिन ये लोग सुबह से बच्चों को पढ़ाते।"
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‘उपाय’ दो कार्यक्रम चलाता है पहला ‘ रीच एंड टीच ‘ इसमें वरुण और उनके साथी उन इलाकों में जाते हैं जो काफी पिछड़े हुए हैं जैसे स्लम एरिया, लेबर कालोनी या फिर किसी गांव देहात के इलाके में। यहां ये लोग सरकारी इमारतों जैसे स्कूल, आंगनबाड़ियों का प्रयोग करते हैं या अगर इन्हें कुछ नहीं मिलता तो ये लोग टेंट लगाकर ही बच्चों की क्लासिज लेने लगते हैं।

दूसरा कार्यक्रम है ‘ फुटपाथ शाला ’ जो विशेषकर स्ट्रीट के बच्चों के लिए है जो लोग सड़को पर रहते हैं वही खाते हैं वहीं सोते हैं वहीं भीख मांगते हैं उन बच्चों को ये लोग वहीं पर पढ़ाते हैं।

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'उपाय' का तरीका

रीच एंड टीच सेंटर्स में ये लोग क्लास वाइज पढ़ाते हैं इन्होंने पहली से आठवीं तक के बच्चों के लिए अपना एक पाठ्यक्रम डिजाइन किया है जिसमें विभिन्न विषयों के अलावा नैतिक शिक्षा जैसे विषयों को भी शामिल किया है वहीं नवीं, दसवी, ग्यारहवीं और बारहवीं के बच्चों को उनके बोड्स के हिसाब से पढ़ाया जाता है। वरुण बड़े गर्व से बताते हैं कि कई इलाकों के बच्चे जो पहले पास तक नहीं हो पाते थे रीच एंड चीट इनीश्येटिव के चलते आज बच्चे 90 प्रतीशत अंक तक ला रहे हैं।

वहीं फुटपाथ शाला का पाठ्यक्रम बिलकुल अलग है। यहां बच्चों को बिलकुल पढ़ना लिखना नहीं आता। इन लोगों ने उन बच्चों के लिए 3 लेवल बनाए हुए हैं और बच्चों को उनके अनुसार वे उस लेवल में डालते हैं जैसे किसी बच्चे को यदि कुछ भी नहीं आता तो उसे लेवल 1 में रखा जाता है थोड़ा बहुत जानने वालों के लिए लेवल 2 है और उनसे ज्यादा वालों के लिए लेवल 3 है।

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इन्होंने अपने पाठ्यक्रम में एक दिन बच्चों का स्पोर्ट्स का रखा है, एक दिन कल्चरल प्रोग्राम्स करवाए जाते हैं, इसके अलावा मॉरल स्टोरीज भी पढ़ाई जाती है इनका मकसद बच्चों का चौमुखी विकास करना है, बच्चों के अंदर पढ़ाई का इंट्रस्ट पैदा करना है और उसके ज्ञान के भंडार को बढ़ाना है।

वरुण बताते हैं - 

"शुरूआत में बच्चों को सेंटर्स तक लाने के लिए उन्हें लुभाना होता है उन्हें खाने के लिए देना होता है कुछ स्पोर्ट्स की चीजें देनी होती हैं, कपड़े देने होते हैं जिसमें पैसे लगते हैं। इसके अलावा भी छोटे मोटे खर्चे होते हैं इसके लिए सभी वॉलंटियर्स हर माह कुछ पैसा जमा करते हैं और उससे खर्च निकालते हैं इसके अलावा कभी-कभी कई लोग भी डोनेट कर देते हैं जिससे काफी मदद मिलती है। लेकिन ज्यादा कॉन्ट्रीब्यूशन हमारा सेल्फ फंडिड है। हमने अभी तक सरकार से किसी तरह के फंड की रिक्वेस्ट नहीं की है।"


वरुण बताते हैं कि अब वे माता पिता की जगह बच्चों को ही जागरुक कर रहे हैं वे बच्चों को बताते हैं कि पढ़ाई क्यों उनके लिए जरूरी है। साथ ही जो पढ़ने में अच्छे हैं उनका एडमीशन करवाते हैं। उनका रहने का खर्च, होस्टल का खर्च ये लोग खुद ही वहन कर रहे हैं। अभी तक ये लोग 25 बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलवा चुके हैं। इसके अलावा बाकी बच्चों को जो पढ़ाई में अच्छे नहीं हैं उनका ये लोग स्किल डेवलपमेंट कर रहे हैं उनको छोटा मोटा काम सिखा रहे हैं जिससे वे कुछ पैसा कमा सकें और अपने पैरों पर खड़े हो सकें।

स्किल डेवलपमेंट

कई बच्चे ऐसे आते हैं जो काफी गरीब हैं जो पढ़ाई के बाद फिर भीख मांगते हैं ऐसे में उपाय इन बच्चों को फूल-माला बनाना सिखाता है जिससे ये बच्चे कुछ काम कर के पैसा कमा सकें इससे इनका स्किल तो डेवलप होता ही है साथ ही उनकी कमाई भी अच्छी हो जाती है। इसके साथ ये बच्चों को मोमबत्ती बनाना, अगरबत्ती बनाना और इसी तरह के छोटी-छोटी चीजें बनाना सिखा रहे हैं और उनको मार्केट भी दे रहे हैं इनका एक ई-कॉमर्स पोर्टल है apnasaamaan.com उसके माध्यम से वे बच्चों द्वारा बनाई गई चीजों को बाहर बेचते हैं।

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'उपाय' की मेहनत अब रंग ला रही है। गलत संगत और बुरी आदतों में फंसे बच्चों को उपाय ने नई दिशा दी है। महाराष्ट्र उपाय के जहां-जहां सेंटर्स चल रहे हैं वहां पर बच्चों में बदलाव दिख भी रहा है। कुछ बच्चे स्कूल जाने लगे हैं उनमें नैतिक मूल्य आ रहे हैं। आज उपाय महाराष्ट्र के अलावा उत्तर प्रदेश में भी अपने सेंटर्स चला रहा है। वरुण आने वाले समय में इसका और विस्तार करना चाहते हैं वे मानते हैं कि अगर वे बेहद गरीब बच्चों को जो आज तक स्कूल नहीं गए उन्हें शिक्षित करने के अपने मिशन में सफल हो पाए तो इससे शहर और गांवो के बीच, अमीर- गरीब के बीच और विभिन्न जाति और धर्मों के बीच की दूरियां खुद ब खुद कम हो जाएंगी और हमारा देश और तरक्की करेगा।

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