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द गोल्डन वर्ड फाउंडेशन, गरीबों का मसीहा

Ashutosh khantwal
25th Jun 2015
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अपनी ही गरीबी से आया ख्याल गरीबों की मदद करने का...

परम और आर्य जैसे कई सफल कार्यक्रम आयोजित कर चुका है आकाश का एनजीओ...

गरीब बच्चों के सपने सच करने की है आकाश की तमन्ना...


हमारे देश में कई लोग अभावों से भरी जिंदगी जीते हैं। आर्थिक तंगी की वजह से उनके कई सपने टूट जाते हैं। कई इच्छाएं मन में दबी की दबी रह जाती हैं। लेकिन जैसे ही वे जिंदगी में दो कदम आगे बढ़ते हैं तो फिर पीछे रह जाने वाले लोगों को मुड़कर नहीं देखते। या यूं कहें कि उन लोगों के बारे में नहीं सोचते जो अब भी उसी दौर में जी रहे हैं जिस दौर से वे गुजर चुके हैं। बहुत ही कम लोग हैं जो यह सोचते हैं कि जैसा दिन मैंने देखा वे दिन मैं औरों को नहीं देखने दूंगा। ऐसे ही एक युवा हैं इंदौर के आकाश मिश्रा। जब आकाश 14 साल के थे तब वे कंप्यूटर कोर्स करना चाहते थे। लेकिन उनकी मां गरीबी के कारण उन्हें कंप्यूटर कोर्स नहीं करा पाई। इस बात ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि किसी भी बच्चे के पालन पोषण और शिक्षा में परिवार और पैसा कितना मायने रखता है। इसके अलावा जब आकाश ने स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी और शहीद भगत सिंह के विषय में पढ़ा तो जाना कि भारत में गरीब व जरूरतमंद लोगों के लिए काम करना कितना जरूरी है। लोगों की यह सोच ही हमारे देश को और मजबूत बना सकती है। इसके बाद आकाश के मन में गरीब लोगों के लिए काम करने की इच्छा बढ़ती चली गई। आकाश उन बच्चों के लिए काम करना चाहते थे जो पैसा की तंगी की वजह से आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। अपने सपनों को पूरा नहीं कर पा रहे थे। इसी के चलते आकाश ने 'द गोल्डन वर्ड फाउंडेशन' नाम से एक एनजीओ की शुरुआत की।

एनजीओ शुरु करने से पहले आकाश एक अनाथालय गए और उन्होंने देखा कि अनाथालय में जो बच्चे रहते हैं वो कितने अलग-थलग और गुमनामी भरा जीवन जीते हैं। उन्हें इस चीज़ ने बहुत झकजोर दिया। उन्होंने तय किया कि वे ऐसे बच्चों के लिए बहुत कुछ करेंगे। एनजीओ शुरु करने के अपने इस सपने को पूरा करने के लिए भी उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। कई चुनौतियों का सामना उन्होंने किया। आकाश की उम्र मात्र 15 साल थी। उन्हें पता था कि अगर वे किसी से इस बारे में बात करेंगे तो सब उन पर हंसेंगे और कोई उन्हें गंभीरता से नहीं लेगा। इसके अलावा कई लीगल काम थे जोकि एक 15 साल के बच्चे के लिए करना बहुत मुश्किल था।

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आकाश बताते हैं 

"जब मैंने अपने इस आइडिया को अपने कुछ साथियों को बताया तो कईयों ने इस आइडिया को पसंद नहीं किया। लेकिन मैं ठान चुका था कि मुझे यही करना है। एक और दिक्कत जो मेरे सामने थी वह थी पैसे की। न तो मेरे पास कोई जॉब थी न कोई निवेशक और न ही मेरा परिवार आर्थिक रूप से इतना मजबूत था कि मेरी मदद कर पाता। ऐसे में मेरे पास एक ही विकल्प था कि मैं खुद पैसे कमाउं और अपनी कमाई से एनजीओ की शुरुआत करूं।"

आकाश ने इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली एक कंपनी तिकोना ज्वाइंन किया और वहां एक सेल्स मैन के तौर पर काम करने लगे। यह काफी छोटी जॉब थी। उन्हें घर-घर जाना होता था। आकाश के लिए जरूरी था कि वे कई तरह के लोगों से संपर्क बनाए रखें। वे दिल्ली के एक वकील से संपर्क में आए। जिसने उन्हें एक एनजीओ के लिए जरूरी पेपर वर्क और रजिस्ट्रेशन का कार्य करने का भरोसा दिलाया। आकाश के लिए दिल्ली आना और यहां रहना काफी कठिन था। इसी बीच वकील ने अचानक आकाश का साथ देना बंद कर दिया। अब आकाश फिर वहीं खड़े थे जहां से उन्होंने शुरुआत की थी।

संघर्ष का रास्ता लंबा था। दो साल बाद उन्होंने अपने एनजीओ को पंजीकृत करावा लिया और अपनी पहली कैंपेन शुरु की। उन्होंने इंदौर से ही काम करने का निर्णय लिया। अबतक आकाश का एनजीओ समाज के हित में कई अच्छे काम कर चुका है। जैसे उन्होंने 'परम' नाम का एक प्रोजेक्ट चलाया इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत बच्चों को मुफ्त कंप्यूटर शिक्षा दी जाती है। इसके अलावा एक अन्य प्रोजेक्ट 'आर्य' भी आकाश ने चलाया यह प्रोजेक्ट महिलाओं के आर्थिक विकास के लिए था ताकि महिलाएं कपड़े बनाकर बेच सकें। इसके साथ ही उनके एनजीओ ने आईकेयर और रक्तदान शिविर का भी आयोजन किया। साथ ही पर्यावरण के मुद्दे पर भी इन्होंने काम किया।

भविष्य में आकाश अपने एनजीओ के लिए विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा फंड एकत्र करना चाहते हैं। ताकि समाज के लोगों की और मदद की जा सके। आकाश लोगों को उनकी बेसिक जरूरतें पूरा करने में उनकी मदद करना चाहते हैं।

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